मैंने पत्र लिखा था

15-01-2021

मैंने पत्र लिखा था

महेश रौतेला

मैंने पत्र लिखा था
तुम्हें मिला या नहीं
पता नहीं,
थोड़ा जिगर की थी
प्यार की,
दुनिया जिसे उलट-पुलट कर देखती है।
 
लिखा था बीज के बारे में
जो वृक्ष बन कर
कट चुका है।
उसकी लकड़ियाँ अभी जल रही हैं
अँगीठी में आग है,
धुआँ है, अँगारे हैं
पक्षियों के बैठने का इतिहास है।
 
लिखते-लिखते 
बीते समय पर आया था,
बादलों की लटों से
बाँध दिया था मन को।
पहाड़ को बना दिया था घर
नदियों में भर दी थी शक्ति,
तीर्थों पर हो गया था शुद्ध।
 
सूरज निकलने की बात
नहीं लिखी थी,
क्योंकि वह सामान्य बात हो चुकी है
दिन-रात की जिगर नहीं की थी
हवा के बारे में भी नहीं लिखा था,
इतनी बड़ी घटनाओं के बीच
लिखा था अपनी खाँसी के बारे में
राजनैतिक सच-झूठ के विषय में,
टूटे दरवाज़ों और खिड़कियों पर
ठोकी गयी कीलों के बारे में।
 
कोरी कल्पनाओं से
उगा दिये थे पुष्प,
अप्सराओं को उतार दिया था
हरी-भरी धरती पर।
नहीं भूला था
पत्र समाप्ति पर लिखना
"स्नेह के साथ तुम्हारा",
पता नहीं पत्र तुम तक
पहुँचा या नहीं,
बताने के लिये विशुद्ध आत्मीयता।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
स्मृति लेख
कहानी
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में