मैं तुम्हारा हृदय, तुम मेरे स्पंदन कहलाओगे

15-02-2021

मैं तुम्हारा हृदय, तुम मेरे स्पंदन कहलाओगे

संजय कवि ’श्री श्री’

हृदय
बोल रहा था
करुण क्रंदन से;
डूबते
मद्धिम पड़ते
स्पंदन से।
तुम मेरे ही
आश्रय में रहते हो;
कंपित होते प्रतिपल
अनवरत चलते हो।
आदि से
मेरे लिए,
तुम चल रहे हो;
पुलकित हो
इतनें से,
मुझमें पल रहे हो।
किन्तु मित्र!
आज भाग्य हमें
छल रहा है;
कदाचित
काल अंतिम
चल रहा है।
धीरे धीरे
कंपन तुम्हारे थम जायेंगे;
रक्त मेरे
शिराओं में जम जायेंगे।
तुम स्थिर हो जाओगे,
मैं भी नहीं रहूँगा शेष;
किन्तु एक सत्य,
रहेगा विशेष।
मेरी हर बात में,
तुम,
याद किये जाओगे;
सदैव
मैं तुम्हारा हृदय,
तुम
मेरे स्पंदन कहलाओगे।
मेरे स्पंदन कहलाओगे।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
नज़्म
कविता - क्षणिका
खण्डकाव्य
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में