मैं तो तेरे अंदर ही हूँ

15-10-2020

मैं तो तेरे अंदर ही हूँ

कविता झा

मुझे कहाँ खोज रहा,
मैं तो तेरे अंदर ही हूँ।
इधर-उधर कहाँ यूँ भटक रहा,
अंदर झाँक मैं वहीं हूँ।
  
ओम् की ध्वनि में, अज़ान की पुकार में,
मंदिर के गर्भ गृह में, मस्जिद की मीनारों में,
गीता के उपदेशों में, क़ुरान की आयतों में,
ईश्वर की मूरत में, ख़ुदा की सूरत में,
काशी विश्वनाथ में, मक्का मदीना में,
सृष्टि के कण कण में, जहान के हर ज़र्रे में,
मेरा अंग अंग मिला तुझमें, मैं कहाँ अलग तुझसे।
 
मुझे कहाँ खोज रहा,
मैं तो तेरे अंदर ही हूँ।
इधर-उधर कहाँ यूँ भटक रहा,
अंदर झाँक मैं वहीं हूँ।
 
दूसरों की ओर मदद करते बढ़ते उन हाथों में,
तेरे अंदर बसी सच्चाई, इंसानियत की चाहतों में,
गर ग़लत उठते क़दम को जला कर राख करते,
मन के दशमुँहे रावण को मिटाकर राम करते,
ख़ुद की तलब भुलाकर दूसरों की प्यास बुझाते,
जिस्म से रूह तक का सफ़र तय करती हर सोच में,
अपने अंदर के अँधेरे को रूहानियत सा नूर करते,
तेरे हर सफ़र में, दर्द में, तेरी मंज़िल तक,
तेरे साथ मिलकर तुझसे जो चला,
वो मैं ही तो हूँ।
 
मुझे कहाँ खोज रहा,
मैं तो तेरे अंदर ही हूँ।
इधर-उधर कहाँ यूँ भटक रहा,
अंदर झाँक मैं वहीं हूँ।
 
सही-ग़लत के जुस्तजू में, अच्छाई-बुराई के जिहाद में,
सच-झूठ के तेरे फ़ैसले में, काले-सफ़ेद के ज़द्दोजेहद में,
ज़मीर की ख़ुद से हो रही लड़ाई में, वफ़ा-बेवफ़ाई के मायने में,
सच्ची ताबनाक की खोज में, ख़ुद को जगाने के शोध में,
कर्मों के पाप-पुण्य के भेद में, मुक़द्दस तस्कीन में,
तेरा आधार, तेरा हमसफ़र, तेरे अंदर की आवाज़ बन,
तेरा हाथ थामे, तेरा अक़्स बन जो चला,
वो मैं ही तो हूँ।
 
मुझे कहाँ खोज रहा,
मैं तो तेरे अंदर ही हूँ।
इधर-उधर कहाँ यूँ भटक रहा,
अंदर झाँक मैं वहीं हूँ।

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