15-03-2019

मध्यप्रदेश के बैगा और भील आदिवासियों का पुरखा साहित्य

डॉ. पुनीता जैन

.प्र. के आदिवासी समुदायों में बैगा भी एक महत्त्वपूर्ण समुदाय है जो स्वयं को ‘जंगल का राजा’ (संपदा पृष्ठ 81) कहते हैं। इनकी उत्पत्ति विषयक कई मिथक है ".......... बैगा लोग अपना संबंध धरती के प्रारंभ से जोड़ते आए हैं। मिथकों में नागा बैगा को मनु और आदम की तरह पहला मानव चित्रित किया गया है बाद में नागा बैगा की संतान से मानव जाति का विकास हुआ। बैगाओं की उत्पत्ति संबंधी कोई ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध नहीं है, रसेल एंड हीरालाल ने बैगाओं को भूमिया की शाखा माना है।"1 बैगा समुदाय की संस्कृति बाह्य प्रभाव व संपर्क के फलस्वरूप परिवर्तित हुई है। इनके वाचिक साहित्य पर हिन्दू मिथकों का प्रभाव है। शिव, पार्वती, राम, कृष्ण, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती को इस समुदाय में श्रद्धा से देखा जाता है। प्रकृति से इनका भी गहरा संबंध है। इनकी गीत परम्परा में भी दैनंदिन के घटनाक्रमों का उल्लेख है। किन्तु इनके गीतों में आवृत्तियाँ अधिक नहीं है तथा लय की जगह कथात्मकता की प्रधानता हैः-

जाय खेलय जमुना -जमुना ऽऽऽ
जाय खेलय जमुना ऽऽऽ
कौन खेलय अनासी, कौन खेलय बनासी
कौन खेलय ढीमर जाल बाई, जाय खेलय जमना रे।
कृष्णा खेलय आँख मिचौली।
राधा खेलय तैरानी जाय खेलय जमुना-जमुना ऽऽऽ।

(यमुना शांत रूप से बह रही है। उसमें जल-क्रीड़ा करने का मन हो रहा है। नदी किनारे जमुना के जल में मछली फँसाने के लिए बंसी डाले बैगा युवक कहता है- कौन जमुना जल में क्रीड़ा कर रहा है और कौन ढीमर मछली पकड़ने के लिए जाल डाले हुए है। अरे! यहाँ तो राधा कृष्ण आँख मिचौली खेल रहे हैं। जमुना के जल में राधा और कृष्ण ही जल क्रीड़ा कर रहे है।)2

"बैगा लोग जो बोली बोलते हैं, वह छत्तीसगढ़ी का विकृत रूप है। बैगाओं की बोली में गोंडी के शब्दों का मिलना स्वाभाविक है क्योंकि बैगा और गोंड युगों से साथ-साथ रहते आए है। रसेल और हीरालाल ने अपनी पुस्तक ट्राइब्स एंड कास्ट्स में बैगा बोली के बारे में लिखा है- " Most of the baigas speak a corrupt form of the chhattisgarahi dialect” यह बात निश्चित है कि छत्तीसगढ़ बोली के क्रियापद, कई शब्द, व्याकरणीय नियमों का पालन बैगा ज्यों का त्यों करते हैं फिर भी कई क्रियारूप बैगानी बोली के अपने है और यही बैगानी बोली को निजी पहचान देते हैं।"3

प्रकृति बैगा आदिवासी गीत परम्परा में भी सर्वत्र प्रधान है। उनके अनेक पर्व इसी से सम्बद्ध है। बीज बोने से लेकर कटाई तक के प्रत्येक चरण पर पर्व मनाए जाते हैं और तदनुसार गीत गाने की परम्परा है। ये वस्तुतः प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने का बहाना है। प्रकृति के प्रति अनुग्रह का भाव सामान्य गीतों में भी मिलता है। भाषा में ध्वन्यात्मकता गीत को लय देती है। बैगा गीतों में जीवन का यर्थाथ रूप चित्रित है। अमूर्तता भारतीय परम्परा का हिस्सा नहीं रही है। सम्पूर्ण आदिवासी पुरखा साहित्य में भी भौतिक जीवन उसके संस्कार, पर्व, त्योहार, जीवन व्यवहार ही मुखर हुआ है। बैगा गीत भी इसके उदाहरण हैं।

तोरे होरे नाना हो तोरे नाना, भला तोरे होरे नाना रे आय।
तोहकी सुमिरौं रे माई धरती आय, तोरी के लागे भार॥
तोहकी सुमिरौं रे बाबा डोंगर दौहार, तो ही के लागे भार।
तोहकी सुमिरौ रे वनस्पति, तोही के लागे भार।
तुम के लागे रे हंसा उड़ास, तो ही के लागे भार॥

(गीत में गायक धरती, पहाड़ और प्रकृति की वंदना करता है। अपनी रक्षा का भार उन पर सौंप देता है। पहले पद में गायक धरती माता का स्मरण करता है और कहता है कि हे माता! मेरा यह बोझ तेरे ही ऊपर है। दूसरे पद में गायक दोहर नामक पर्वत से प्रार्थना करता है और कहता है कि मेरी रक्षा का भार तुम्हारे ऊपर है। गायक प्रकृति से कहता है कि हे प्रकृति देवी मैं तेरी वंदना करता हूँ मेरा ये बोझ तेरे ऊपर है। मेरी आत्मा का जो उल्लास है, वह तुम पर ही निर्भर है और इसको बनाए रखने का भार भी तुम्हारे ऊपर है)4

आदिवासी समुदाय में तुलनात्मक रूप से स्त्री को आत्मनिर्णय का अधिकार है। सहजीविता, समानता के जीवनदर्शन को मानने वाले इस समुदाय में लैंगिक समानता की बात की जाती है। यहाँ उदाहरण गीतों में ऐसे भी मिल जाते हैं जहाँ स्त्री स्वतंत्रतापूर्वक अन्याय के विरुद्ध निर्णय लेती है। गीतों में संवादशैली तथा कलात्मकता भी दर्शनीय है-

छानी ऊपर नायपथ गरैया
भगैया चौला कौन है रूकैया
कौन तोला गारी देवय, कौन तोला बोली।
कौन तोला धरेय ले निकायल, भगैया चोला कौन है रूकैया।
सास तोला गाली देवय ससुर तोला बोली
घर के धनी धरे यले निकालय, भगैया चोला कौन है रूकैया।

(एक परिवार में पत्नी घर से भाग रही थी। पुरुष दौड़कर लौटाने की कोशिश कर रहा था। तब पत्नी कहती है कि मुझे मत रोको। मुझे जाने दो। तब पुरुष पूछता है कि तुमको कौन भगा रहा है जो तुम जा रही हो। इसमें पत्नी उत्तर देती है कि मुझे सास हमेशा गाली देती है और ससुर भी खूब डाँटते हैं और तुम जब भी शराब के नशे में घर आते हो, तो घर से चले जाने के लिए कहते हो। इसी कारण मैं मायके जा रही हूँ। मुझे मत रोको, जाने दो और वह चली जाती है।)5

उमंग, उल्लास, नृत्य, गान और आनंद आदिवासी जीवन का अभिन्न अंग है। इसलिए अवसाद, आत्महत्या जैसे मानसिक विकार यहाँ न्यूनतम है। वस्तुतः आनंद और उत्सव प्रधान जीवनशैली आदिवासी समुदाय की स्वाभाविक मुद्रा है। इसी का उदाहरण इस गीत में देखने को मिलेगा-

आ ओ रे लरिका खेल कूद ले, जिंदगी है थोड़ी दिन के ऽऽऽ
लरिका है आन तान जवानी माँ करवं काम
सियानी मा हो बाई मन पचताये, जिंदगी है थोड़े दिना के॥
जीवन रहबो बाई खेलकूद लेबो।
मरी हरी जाबो बाई दुलुमे संसार रे, आ ओ रे लरिका -लरिका ऽऽऽ

(आओ लड़का-लड़की हिल-मिलकर करमा गीत गा-गाकर नाचो। कूद-कूद कर खेलो क्योंकि यह मनुष्य की ज़िंदगी दो दिन की है। सियाने लोग कहते हैं कि किशोरावस्था में आदमी कुछ भी अनाप-शनाप कार्य कर बैठते हैं, परंतु जैसे ही नौजवान होता है तो कार्य सही और सोच-समझकर ख़ूब करते हैं। परंतु जब प्रौढ़ावस्था आ जाती है तो आदमी लड़कपन और जवानी को मन ही मन ख़ूब ख़्याल करके पछताता है और कहता है कि यदि ज़िंदगी रहेगी तो ख़ूब नाच-कूद करके ख़ुशी मनाएँगे, परन्तु कहीं मर गए तो यह संसार फिर देखने को नहीं मिलेगा)6

बैगा गीतों में आवृत्तियाँ और दोहराव कम है। इनके वाचिक साहित्य में पहेलियाँ भी मिलेंगी। जैसे -

  •  काँस का लोटा मा दो रंग का पानी -
     - अंडा
  • बत्तीस थांगा एक पान
     
    - जीभ और दाँत
  • पंडरा खेत करिया बीज, बीज बोवईया गावै गीत
     
    - कागज स्याही (अक्षर) आदमी
  • लाली बलावे - कोको डरहावे
     
    - बेर-बेई
  • सुक्खा तालाब मा बकली फटफटाय
    - लाई फुटा
  • चोटी कूद -कूद फेंटा बाँधे
    - मक्का की धानी

बैगा गीतों में प्रकृति के प्रति प्रार्थना का भाव है। उनके विवाह गीतों में वे धरती, चाँद, सूरज, जीवों, देवों सभी का आशीर्वाद माँगते हैं। गीतों की यह मौखिक परम्परा दीर्घकाल से जीवित है तथा आदिवासी मानस की आदिम स्मृतियों का संसार है। "बैगा विवाह में सारी सृष्टि को शामिल करना चाहते हैं। दूल्हे की माँ कहती है- दोसी! तुम धरती माता को आमंत्रण देना भूल मत जाना। धरती ने हम पर बहुत उपकार किए हैं। ठाकुर देव केा आमंत्रित करना। कोई छूट ना जाए। सारे ग्राम और जंगल के देवी-देवताओं को आमंत्रित करना। आज हमारे यहाँ बेटे या बेटी का विवाह है। भागवती गाती है -

 निवतो की निवतो दोसी धरती अर माता।
नितो की निवतो दोसी ठाकुर देवता।
निवतो की निवतों दोसी खेरो महरानी।
तरी नानार नानी, तरी नानार नानी
तरी नानार,नाना रे नान॥

सभी देवी-देवता, धरती माता ऐसा आशीर्वाद दें, जैसा दूल्हा और दुल्हन दो हंसों का जोड़ा हो, जैसे कबूतर और कबूतरी का जोड़ा हो। ऐसी जोड़ी सदा बनी रहे। आदिम समाजों में देवी-देवता उनके सह पड़ोसी होते हैं। गाँव की सीमा पर, गाँव के बाहर, जंगल के मुहाने पर, जंगल के भीतर, नदी-पहाड़, पेड़-पौधे, घर-आँगन, सब जगह देवी-देवता विराजमान होते हैं। देवों का आकार प्रकार नहीं, निराकार रूप में सारा आदिम देवकुल उनके आसपास ही उपस्थित रहता है।"7 विवाह गीत में संपूर्ण प्रकृति , सृष्टि का आह्वान करने की इस विशालता के अतिरिक्त वसंत निरगुणे बैगा आदिवासियों की प्रतिरोध की शक्ति को भी रेखांकित करते है। वर्तमान में उनके जल-जंगल, ज़मीन से उन्हें वंचित किया ही जा रहा है। वे भोले हैं किन्तु शोषण को समझने की शक्ति भी उनमें है। इस गीत में वे अप्रत्यक्ष रूप से राजा की हिंसात्मक प्रवृत्ति पर विरोध दर्ज कर रहे हैं-

चारों खूँट चौरासी फिरे
गीधन के सम्मान
जहाँ बैठे राजवारे
घोड़न के पहार देखे, ऊँटन की अटारी
हाथिन के तो पंजा देखे, मते है लराई।
सिंहासन बैठे राजवारे।

युद्ध के बाद चौरासी लाख भूत-पिशाच घूम रहे हैं। गिद्धों का सम्मान हो रहा है। लाशों के ढेर लगे हैं। उस पर राजा सिंहासन जमा कर बैठा है। मरे हुए घोड़ों के पहाड़ लगे हैं। ऊँटों की तो अटारियाँ बन गई हैं। हाथियों के हज़ारों कटे हुए पैर पड़े हैं।राजा सिंहासन पर बैठा है। जंगल में रहने वाले बैगा की यह तीखी आवाज़ है।"8 इन गीतों में गहरे अर्थ है और कथात्मकता है। यह केवल गायन हेतु बनाए गए गीत नहीं है बल्कि बैगा आदिवासियों के मनोभाव व चिंताओं को भी अभिव्यक्ति देते हैं। यहाँ जन्म, मृत्यु और विवाह के विविध गीतों के अतिरिक्त विभिन्न उत्सवों में भी गीत गाए जाते हैं। करमा ददरिया, गीत भी यहाँ मिलेंगे। कई गीतों की लम्बाई भी अधिक है। कई गीतों में सामान्य वार्तालाप भी है-

बैगा काहिन काट नागर दाऊ
काहिन काट डाँडी रे।
काहिन काट जुवाड़ी बनाये,
एहो राम कहिन काट जुवाड़ी बनाये।
हर्रा काट नागर बाई,
बीजा काट डाँडी रे।
ऐहो राम दौहन काट जुवाड़ी बनाए।

(बैगिन ने बैगा से पूछा - यह कौन सी लकड़ी को काटकर तुम हल बनाते हो। बैगा कहता है - हर्रा पेड़ की लकड़ी काटकर हल बनाता हूँ। कौन सी लकड़ी से तुम हल की डाँडी बनाते हो। बीजा पेड़ की लकड़ी काटकर हल की डाँडी बनाता हूँ। कौन सी लकड़ी से तुम हल का जुआ बनाते हो। देहमन (सागौन से मिलता जुलता) पेड़ की लकड़ी से जुआ या जुवारी बनाता हूँ। हल के लिये ये तीनों प्रकार की लकड़ी बहुत उपयुक्त होती है। हमारे बाप-दादा परम्परा से इसी लकड़ी का उपयोग करते आए हैं। बैगिन को यह सुनकर अच्छा लगा)9 बैगा आदिवासी अपनी पुरानी स्मृतियाँ को भी गीत में सँजोते है। पहले बैगा आदिवासी शहरी व्यक्तियों को देखकर जंगल में भाग जाते थे तथा डर के मारे वहीं कंदमूल खाकर समय बिताते थे। उसी की स्मृति का यह करमा गीत है -

धन रे तैं बैगा भुछ डोंगर देख
कैसे घुस काँदा खूसा
खाके बिझाये सारी भूख रे।
कनिहा काँदा खवावय नहीं खाये मा मिठावय,
बैचांदी काँदा मा माहूर डाले सुघर दिखय भाई,
ओखर रूप काँटा खूसा खाय के बिझाये सारी भूख रे।
कडू गीट कडू लागय मूडय मा कन्दावय,
रौवी काँदा करच कूरच महूँ मा मिठावय भई,
काँदा खूसा खाय के बिझाये सारी भूख रे।

(धन्य है बैगा! जो किसी बाहरी व्यक्ति को देखकर जंगल में भाग जाता है। वहीं जंगली कंदमूल खाकर रह जाता है। कनिहा काँदा ऐसा है, जिसे कमर-कमर तक खोदकर निकाला जाता है। जो खाने में बहुत मीठा होता है। बैचाँदी काँदा देखने में सुंदर और खाने में मधुर होता है। कडू काँदा मुँह में ही घुल जाता है और रौंवी काँदा मुँह में कचर-कचर लगता है। बैगा जंगल में ही कंदमूल खाकर अपनी भूख मिटा रहा है।)10

बैगा आदिवासी भी कहावतें गढ़ने में कुशल है। ये उनकी कल्पना का जीवंत उदाहरण है।

  • ऽ हरियल डांडी लाल कमान, तौबा-तौबा करे पठान
    -मिर्ची
  • ऽ कहाँ से आये रे जोगी, कूला ठोक बजाय पोंगी
    - मुरगा

 मध्यप्रदेश में गोंड, कोरकू, बैगा की भाँति भील आदिवासी समुदाय की भी अपनी वाचिक परम्परा है। स्वाभाविक रूप से इनमें भी गीत और कथा की प्रधानता है, पहेलियाँ और कहावतें भी इनमें मिलते हैं। अन्य समुदायों की भाँति भील गीतों में भी सामूहिक अभिव्यक्ति की प्रधानता है। वैयक्तिक अनुभूतियाँ या मनोविज्ञान यहाँ न्यूनतम है। समष्टि भाव, पर्व, विविध संस्कार गीत भील परंपरा का अभिन्न अंग है। भीली भाषा में समृद्ध गीत परम्परा के अतिरिक्त प्रभूत मात्रा में लोकोक्तियाँ व पहेलियाँ मिलेंगी। ‘मंगला गरवाल’ लिखित आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, .प्र. संस्कृति परिषद, भोपाल द्वारा प्रकाशित ‘भीली गीत और लोकोक्तियाँ’ नामक पुस्तक में गीतों के अतिरिक्त लगभग 727 लोकोक्तियाँ व 96 पहेलियाँ संकलित हैं, जो उनकी भाषा के समृद्ध अनुभव संसार का द्योतक हैं। "भील नाम द्रविड़ भाषा परिवार के अन्तर्गत कन्नड़ के ‘बील’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘धनुष’। यह सच है कि आदिम विश्वासों में जीने वाली इस सरल स्वभाव जाति के लोग अपने धनुष कौशल में कोई सानी नहीं रखते, इसलिए इनका नामकरण भी इनके गुण के आधार पर हुआ। रसेल और हीरालाल के अनुसार सन् 600 ईसवी से ही यह शब्द प्रयोग में आया, जिसके पूर्व यह जनजाति संभवतः पुलिन्द तथा वन-पुत्रादि नामों से विख्यात थी। कुछ विद्वानों का यह मत है कि यह शब्द संस्कृत भाषा के भिल्ल शब्द का तद्भव रूप है जिसका तात्पर्य भेदने की प्रक्रिया से है।"11 इस आदिवासी समुदाय के नामकरण के ये सभी प्राचीन मत हैं। नवीन मतानुसार, "भीलों की भाषा के लिए भीली शब्द का प्रयोग सन् 1935 में पादरी थामसन ने किया, इसके पश्चात् जार्ज ग्रियर्सन ने भाषा सर्वेक्षण में किया। ग्रियर्सन ने विकल्प में भिलोड़ी शब्द का प्रयेाग भी किया है।"12

भीली भाषा पर हिन्दी की बोलियों मालवी, निमाड़ी, का प्रभाव बताया जाता है। इसका कारण इसके सीमांतवर्ती क्षेत्र है। "भाषाई दृष्टि से भीली के उत्तर-पश्चिम में पश्चिमी हिन्दी तथा राजस्थानी, पूर्व में राजस्थानी, दक्षिण में मराठी, खानादेशी और निमाड़ी तथा दक्षिण पश्चिम में गुजराती भाषाएँ बोली जाती हैं। भीली को राजस्थानी ने अपने दक्षिण पश्चिम और गुजराती ने उत्तरपूर्व में प्रभावित किया है। म.प्र. के धार, रतलाम और झाबुआ (अलीराजपुर के निकटवर्ती भागों में) ज़िलों में प्रयुक्त भीली पर मालवी का प्रभाव है। खरगौन जिले में रहने वाले भील अपनी भाषा में निमाड़ी उपयोग करते हैं।"13

भीली गीतों के कथ्य पर बाह्य प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। निश्चित ही बाह्य भाषाओं के साथ उस भाषा की संस्कृति का असर होना स्वाभाविक है। भील गीत परम्परा में आल्हा, जवारे बोने, होली, माता पावागढ़, गणेश, शीतला माता, राम, लक्ष्मण, अर्जुन, भीम का उल्लेख मिलता है। बैगा, गोंड, कोरकू, भीली आदि गीतों की भाषा में भिन्नता है किन्तु सभी में गायन-वादन-नर्तन की परम्परा समान है। कथ्य की दृष्टि से भी दैनंदिन जीवन कर्म की प्रमुखता है। स्त्रियों के गीत में घरू जीवन का उल्लेख है। साथ ही नाते-रिश्तों, परस्पर छेड़छाड़, हास्य, पर्व-त्यौहार का उल्लेख भी यहाँ सामान्यतः मिलता है। इनके विवाह गीतों से स्पष्ट होता है कि इनकें रीति-रिवाजों पर शहरी, कस्बाई समाज के परंपरा व विश्वासों का प्रभाव है। विवाह के प्रत्येक अवसर के गीत यहाँ मिलेंगे। भीली भाषा में राजस्थानी बोलियाँ की भाँति ‘ण’ वर्ण का प्रयोग मिलता है। विदाई के अवसर का एक गीत है -

औ सास दुःखड़ला मती दीजे।
औ सासू दुःखड़ला मती दीजे।
औ दूध पायी ने मोटी करी है
ओ सासू दूध पावी ने मोटी करी है
औ सासू दुःखड़ला मत दीजे।
औ सासू सुगो दईने मोटी करी
औ सासू दुःखड़ला मत दीजे।

(जब दुलहन को विदाई के लिये घर से बाहर निकाला जाता है, तब दुल्हन पक्ष की औरते गाती हैं। ओ सासू जी! दुःख (बहुत से) मत देना। बड़ी मुश्किल से बड़ा किया है। जिस प्रकार चिड़िया को चुगा देकर उसकी माँ बड़ी करती है, वैसे हमने भी इसे पाला पोसा है।)14

यह गीत आदिवासी गीतों की सहज अभिव्यंजना का सुंदर उदाहरण है। जीवन का यथार्थ स्वरूप सहज रूप से यहाँ अभिव्यक्त हुआ है। आदिवासी जीवन में दुःख का यथार्थ जीवन से इतर कोई दर्शन नहीं है। सहजता ही उनकी कला है जो लगभग प्रत्येक गीत का वैशिष्टय है।

 ससुराल में स्त्री के लिए कई तरह के दुख हैं। अपने कष्टों को गीत में वह इस तरह अभिव्यक्त करती है -

झींसा बावलियाँ ने झींसा खेझड़िया।
ऐवा दखा में मने दे दी हो राज।
बापो म्हारो रूपया जो लोभी, माता म्हारी।
ऐवा दखा में मने दे दी हो राज।
ओढ़वा सितरी नी भले पैरवा घाघरी नी मले।
ऐवा दखा का मने दे दी हो राज।
खुड करवा कुकड़ी नथी थीर करवा बोकडु नथी
औखा डगरा नथी वावा कोदरा नथी ऐवा दखा के
मने दे दी हो राज।
झींझा बावलिया ने झींझा खेझड़िया।
ऐवा दखा में मने दे दी हो राज।
नत ‘नो दारूणो’ पिवे नत नो मारूड़ो करें।
ऐवा दःखा में मने दे दी हो राज।

(घने बबूल है, घरे खैर है, ऐसे दुःखों वाले घर में मुझे दे दिया है। मेरा पिता रुपयों का लालची है, माँ भी मेरी लालची है। ऐसे दुःखों में मुझे दे दिया है। ओढ़ने के लिए, कपड़ा नहीं है। पहनने के लिए घाघरा नहीं है। ऐसे दुखों में मुझे दे दिया है। खुड़ करवा मुर्गी नहीं, थीर करवा बकरी नहीं। ऐसे दुखों में मुझे दे दिया है। बोने के लिए बैल नहीं हैं, बुआई के लिए कोदों नहीं है। ऐसे दुखों में मुझे दे दिया है। रोज़ रोज़ का दारू पीना, रोज़ मारना-कूटना, ऐेसे दुखों में मुझे दे दिया है)15 इस गीत मैं स्त्री के दुःख की सरल व सघन अभिव्यक्ति है। परिवार के भीतर भी स्त्री को अनेक दुःखों का सामना करना होता है। स्त्री और स्त्री के बीच असहयोग का उदाहरण आदिवासी जनजीवन में भी दिखाई दे जाता है। साथ ही आर्थिक सहारे का अभाव भी यहाँ देखा जा सकता है।

खेंझड़िया नी खेती रे
मन आड़ो पुलो देती रे।
हूँ सासरे नी जाती
सासरे सासुड़ी रे,
म्हार पियर में भोजाई रे।
हूँ सासरे नी जाती।
घटी नी वलाँ होती रे
मन भर-भर घुघरा देती वो
हूँ सासरे नी जाती।
वाहीदा नी वलाँ थाती -रे
मन भर टोपला देती रे
हूँ सासरे नी जाती
पाणी पलाँ होती मन भर-भर
बेडुला देती रे,
हूँ सासरे नी जाती
खेंझड़िया नी खेती रे,
मन आड़ो पुलो देती रे
हूँ सासरे नी जाती।

(खैरों की खेती में थोड़ा भी सहारा दे देती तो मैं सासरे नहीं जाती। ससुराल में मेरी सास, पीहर में भाभी जी, पर मैं ससुराल नहीं जाती। छठी का समय होता तो भर-भर टोपला दे देती मैं ससुराल नहीं जाती। पानी भरने का समय होता, मुझे भर-भर मटके देती, मैं ससुराल नहीं जाती । गोबर का वक़्त होता, तो मुझे भर-भर टोपले देती, मैं ससुराल नहीं जाती। खेरों की खेती में यदि थोड़ा भी सहारा मिलता, तो मैं ससुराल नहीं जाती)16 भील गीत भी अमिधायुक्त है। इस गीत में दुःख है किन्तु नाटकीयता नहीं। वस्तुतः कृत्रिमता आदिवासी जीवनशैली में ही नहीं है फलस्वरूप उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति में भी सहजता की प्रधानता है।

भील आदिवासी समुदाय में विवाह के प्रत्येक अवसर के गीत मिल जाएँगे। विवाह के निमंत्रण में वे प्रकृति को भी सम्मिलित कर उसे बुलाते है। प्रकृति से अपनत्व का ये अनुपम उदाहरण है-

आजे-आजे मैं कईना देव न्योतेरिया।
आजे-आजे मैं गोतराजा न्योतेरिया।
राजा विवा करवा नो तारो फरज रे
कुल देवताने नोतेरिया।
आजे-आजे मैं गिर माता नोतरिई।
माता विवा करवा नो तारो हक रे।
वाड़िया नो भमर नोतरिया।
आजे में पास पिपल नोतरिया
देव विवा करवा नो थारों हक रे।
वाड़िया का भमर नोतरिया।
आजे-आजे मैं केकड़ियों देव नोतरियो
देव विवा करवा नो तमारो हक रे
वाड़िया ना भमर नोतरिया।

(आज कौन से देव को न्यौता दिया। आज मैंने कुल देवता को आमंत्रित किया है। विवाह कराने का फ़र्ज़ कुल देवता का है। बगिया के भँवरे को न्यौता दिया हैं। आज मैंने गिरमाता को न्यौता किया है। माताजी विवाह सम्पन्न कराने में आपका स्थान है। आज मैंने पाँच पीपल को न्यौता दिया है। देवों, विवाह कराना आपकी जिम्मेदारी है। बगिया के देवों को न्यौता दिया है। आज मैंने केकड़ों को न्यौता है। केकड़े देव विवाह करवाने का आपका नेग है। बगिया के भँवरे को न्यौता दिया है17

वैविध्यपूर्ण गीत परम्परा के अतिरिक्त "भीलों के मौखिक साहित्य में पहेलियों का अक्षय भंडार है। गाँव की किसी चौपाल या किसी भील के आँगन में भोजन आदि से निपट कर जब दो चार युवक, वृद्ध एकत्रित हुए कि कहानी-क़िस्से और पहेलियों का दौर शुरू हो जाता है। इनके अर्थ खोज निकालने में बुद्धि की थोड़ी कसरत करनी पड़ती है और अर्थ ज्ञात को जाने पर कौतुक पूर्ण चमत्कार का आनंद मिलता है। भीलों में अनुभवी व वृद्ध व्यक्ति नयी नयी भुझावल गढ़ने में बहुत माहिर होते है। यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि इस बुद्ध-विलास भर कौतुक के प्रेमी भील अन्य आदिवासियों से बहुत आगे है।"18

  • एक राणी घर माती बार नी निकले
     
    काई काम पड़े ती निकले - तलवार
  • माय बाकड़ी न बेटी डाकणी - कमान व तीर
  • धवल्या बुकड़ा न बारेह खाल - प्याज
  • हरग नु मासलु (आसमान की मछली) - हवाई जहाज
  • श्यार बायणां वेली माँ - चार दरवाजे वाली माँ
  • वे जाये वे आवे (वो गई वो आई ) - नजर
  • सल्को पाड़े हरगे सिंगलू पाडे पेताले
    (चमक गिराती आसमान पर और छेद गिराती पाताल में) - बिजली
  • डाहा ना वार नु बी (बूढ़ों के समय का बीज) - आग
  • मारे - मारे न पैदा थाये (मार दो फिर मारो फिर भी पैदा हो जाती है)- घास
  • उंदा वाट के दइ लटके (उलटे कटोरे में दही लटकता) - कपास

भील वाचिकता मे लोकोक्तियों का भी समृद्ध योगदान है। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैः-

  • "अड़खाँ नी माला (हड्डी का ढाँचा) - अत्यधिक दुबला
  • अलूदरा आंगणे गंगा फेर बी अलूदरो (आलसी के आँगन में गंगा फिर भी गंदा)- स्नान का आलसी
  • आखड़ा खार (घूर घूर कर देखना)
  • आज थी काल ताजु थाहे (आज से कल अच्छा होगा)
  • आहलियों ने पाहलियों (अगला-पिछला सब एक जैसा)
  • आंधों ने आणजाण हरको (अंधा और अनजान एक जैसे होते हैं)
  • आंधा ना घेरे बेहरा नो पेरो (अंधे के घर बहरे का पहरा)
  • आगला ने पासला सब दोगला (अगले- पिछले सभी दगेबाज)
  • आखलियो हांड (अनियंत्रित सांड) - दादागिरी
  • सडी साल्यो (घोड़ी पर चढ़कर चलना) इतराना
  • हरी करे जो खरी (जैसा ईष्वर करें या रखे वही ठीक है)
  • हतर माटी (सत्रहपति) अधिक संबंध रखने वाली
  • हाथ माँ कोढी नथी बाई फरे दोड़ी (हाथ में एक पैसा नहीं और बाई दौड़ती फिरती)
  • ठप्पो लगाड़ियो (काला धब्बा लगाना) -कलंक लगाना
  • फार वाई (झंुड जनना) अधिक बच्चे
  • बाजी ना मोले (पत्तों के मोल लेना) सस्ता
  • भीलू ना बेटा आम्बा अने मोवड़ा (भील के दो ही बेटे आम व महुवे) -आजीवन के साथी
  • लीला लेहर (हरा-भरा होना) आनंद मंगल
  • लोई भूरियू मोह (खून से भरा मुँह ) क्रुद्ध
  • वांदरी वार सड़ी (बंदरी युद्ध के लिए तैयार हुई) कमज़ोर
  • दुध ग्यू ने दुणी ग्यी (दूध भी गया दोहनी भी फूट गई) - दोहरा नुकसान "19

पहेलियों, लोकोक्तियों के अतिरिक्त भीलों में लोक कथाएँ भी प्रचलित है जो मूल्यों की शिक्षा देती हैं। स्पष्ट है कि भील आदिवासी अपने अनुभवों को विविध तरह से अभिव्यक्त करते हैं। यह अभिव्यक्ति उनकी मौलिक अभिव्यक्ति है।

पुनीता जैन
प्राध्यापक -हिन्दी
शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
भेल, भोपाल
मो. 94250-10223
rajendraj823@gmail.com

 

संदर्भ ग्रंथ

  1. संपदा- बैगा- वसंत निरगुणे, महेशचंद्र शांडिल्य, नवलशुक्ल, पृष्ठ- 84
  2. बैगा गीत (2010) -अर्जुन सिंह धुर्वे,ख् आदिवासी लोक कला एवं तुलसी साहित्य अकादमी, .प्र. संस्कृति परिशद पृष्ठ 23-24
  3. संपदा- बैगा, पृष्ठ 155
  4. बैगा गीत - अर्जुन सिंह धुर्वे पृष्ठ 97
  5. वही, पृष्ठ 65
  6. वही, पृष्ठ 31
  7. बैगा गीत- (2013) - भागवती रसुड़िया वसंत निरगुणे, आदिवासी लोक कला परिशद एवं बोली विकास अकादमी, पृष्ठ 8/9
  8. वही, पृष्ठ 12/13
  9. वही, पृष्ठ 92-93
  10. वही, पृष्ठ 81-82
  11. सम्पदा (भील -महेशचन्द शांडिल्य, आदिवासी लोक कला परिशद एवं तुलसी अकादमी भोपाल
  12. वही, पृष्ठ 206
  13. वही, पृष्ठ 206
  14. भीली गीत एवं लोकोक्तियाँ- मंगला गरवाल, आदिवासी लोक कला और तुलसी साहित्य अकादमी, भोपाल, पृष्ठ - 76
  15. वही, पृष्ठ 13-14
  16. वही, पृष्ठ 15
  17. वही, पृष्ठ 58, 59
  18. संपदा -भील -महेशचन्द्र शांडिल्य, पृष्ठ 260
  19. संपदा - (2010) सम्पादक कपिल तिवारी आदिवासी लोककला एवं तुलसी अकादमी भोपाल

0 Comments

Leave a Comment