मानवीय भावों की सहज वाहिका-प्रांत-प्रांत की कहानियाँ : राजेश रघुवंशी

15-08-2020

मानवीय भावों की सहज वाहिका-प्रांत-प्रांत की कहानियाँ : राजेश रघुवंशी

देवी नागरानी

समीक्षक: राजेश रघुवंशी
कहानी-संग्रह: प्रांत-प्रांत की कहानियाँ
लेखिका: देवी नागरानी
प्रकाशक: भारतीश्री प्रकाशन,10/119, पटेल गली, सूरजमल पार्क साइड, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य: ₹400

अब तक मौलिक कथा-साहित्य के ही संपर्क में था। पहली बार वरिष्ठ रचनाकारा आदरणीया संध्या यादव जी के आग्रह पर लेखिका देवी नागरानी जी के अनूदित कहानी-संग्रह "प्रांत-प्रांत की कहानियाँ" पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। अब तक यही विचार था कि अनूदित रचनाओं में पाठकों को बाँधे रखने की शक्ति मौलिक रचनाओं की अपेक्षा कमतर होती है। पर यह विचार उस क्षण पूरी तरह बदल गया जब सम्माननीय देवी नागरानी जी का प्रस्तुत कहानी-संग्रह पढ़ना प्रारंभ किया। इस कहानी-संग्रह में समाहित अठारह कहानियाँ भिन्न-भिन्न परिवेश के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं की सहज वाहिका बन गयी है। इन्हीं और इन जैसी अनेकों विशेषताओं का विश्लेषण करने का प्रयास प्रस्तुत कहानी-संग्रह के माध्यम से किया है। 

इन अठारह कहानियों में सबसे पहले गर्शिया मारकुएज द्वारा लिखित"ओरेलियो एस्कोबार" कहानी में शक्ति-सम्पन्न मेयर की अहम भावना के साथ-साथ एस्कोबार की स्पष्टवादिता का सहज वर्णन किया है। नसीब अलशाद सीमाब की 'आबे-हयात’ कहानी एक माँ की वेदना और उसके बेटे की चिंता का जीवंत दस्तावेज़ बन गयी है। एकमात्र बेटे को छोड़कर सभी बच्चों के जन्म लेने के बाद मरने का सदमा माँ बर्दाश्त नहीं कर पाती है। अपने बेटे को मृत्यु से बचाने की वह जी-तोड़ कोशिश करती है। बेटे से कही गयी उसकी बातें उसकी आंतरिक पीड़ा को गहन रूप से अभिव्यक्त करती है, "बेटा तुम कहीं न जाना, अगर तुम भी बिछड़ गए तो मैं जिन्दा न रह सकूँगी।"अंत में बेटा फ़ौज में भर्ती होकर माँ के इस डर को हमेशा के लिए मिटा देता है। जब उसकी शहादत की ख़बर माँ तक पहुँचती है तो वह संतुष्ट हो जाती है, "....मेरा बेटा ज़िंदा है....। मेरा बेटा नहीं मरा...मेरे बेटे ने मौत को शिकस्त दे दी! मेरा बेटा ज़िंदा है।" पढ़कर मन संवेदना से भर उठता है। 

वाहिद ज़हीर जी की "आखिरी नज़र" कहानी एक पिता की अपने परिवार के प्रति विशेष रूप से अपनी बेटी की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को अभिव्यक्त करती है। 

आरिफ जिया जी की "बारिश की दुआ" कहानी में सूखे की स्थिति में शहर के लोगों द्वारा नमाज़ पढ़ बारिश की ख़्वाहिश करना और ठीक उसी समय झोपड़ी में रहने वाली नन्ही जेबू द्वारा बारिश ना करने के लिए सहज भाव से प्रार्थना करना दोनों ही स्थितियों का यथार्थ वर्णन किया गया है। दुआ उनकी ही क़ुबूल होती है, जिसके इरादे नेक होते हैं। इस दृष्टि से जेबू की प्रार्थना ईश्वर द्वारा स्वीकृत हो जाती है। जेबू का निवेदन पाठकों के मन को स्पर्श कर जाता है, "अल्ला मियाँ बारिश मत करना, मैं और मेरी माँ बारिश में भीग जाएँगे। आप जानते हैं कि अम्मी बहुत बीमार हैं। उनको सेहत दे दो। हम यहाँ से किसी महफ़ूज़ जगह चले जाएँगे और फिर सबके साथ बारिश की दुआ माँगेगे। अल्ला मियाँ अभी बारिश मत करना।" 

फरीदा राजी जी की "बिल्ली का खून" कहानी में बिल्ली के माध्यम से प्रेम को प्राणी मात्र का आधार बताया है। प्रेम की परिभाषा को न केवल मनुष्य वरन जानवर भी समझते हैं, उनके जीवन में भी प्रेम का अपना महत्व होता है। "खून" कहानी (भगवान अटलाणी) का युवक डॉक्टर बन देहात में इलाज के द्वारा अपने ग़रीब परिवार का भरण-पोषण करने का प्रयास करता है। इसी मजबूरी के कारण जब वह गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को अपने पास की दवाइयाँ नहीं दे पाता और समय पर दवाइयाँ ना मिलने से उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो ऐसे में वह अपने आप को दोषी मानता है और सोचता है, "....मेरी इमरजेंसी बैग में रखे ग्लूकोज़ के इंजेक्शन की क़ीमत क्या इतनी ज़्यादा है? एक ज़िंदगी?"वह आत्मिक ग्लानि से भर उठता है। 

खुशवंत सिंह जी की "दोषी" कहानी शत्रुता और प्रेम के ताने-बाने से बुनी कहानी है। आपसी सहमति से जुड़े संबंधों की एक नयी व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। 

"घर जलाकर" कहानी में इब्ने कंवल जी ने झोपड़-पट्टियों में रहने वाले लोगों के जीवन का मार्मिक चित्रण किया है। आग लगने पर अपनों को बचाने की जद्दोजेहद करने और मरनेवालों के घरवालों को मिलने वाले मुआवज़े पर अपनों के बच जाने का अफ़सोस व्यक्त करते लोगों की मानसिकता का यथार्थ वर्णन किया गया है। 

जगदीश जी की "गोश्त का टुकड़ा" कहानी में निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की ख़राब आर्थिक स्थिति का वर्णन किया गया है। पिता की मृत्यु के बाद शंकर शहर में आकर एक मिल में कार्य कर अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। सप्ताह के अंत में वह घर आया करता। पर बढ़ते कर्ज़ और परिवार की आर्थिक दयनीय हालत को देख वह छुट्टियों में भी काम करने लग जाता है। घर जाना भी बंद कर देता है। अंत में केवल पैसे कमाने की मशीन बनकर रह जाता है। "अब माँ की ममता, बीवी के आँसू और बच्चे का प्यार उस दिल की हरकत को तेज़ नहीं कर सकते थे। व्यवसाय और नौकरी के अन्तर को भी गहराई से स्पष्ट किया गया है।" 

"कर्नल सिंह" कहानी में पंजाबी परिवेश का जीवंत वर्णन किया है। साहस को प्रेम का परिचायक सिद्ध किया गया है। 

अरुणा जेठवाणी जी की "कोख" कहानी मातृत्व भाव के महत्व को दर्शाती है। सोनिया अपनी माँ से इसलिए बेहद नफ़रत किया करती थी कि उन्होंने सोनिया के पिता को छोड़कर अपने पहले प्रेमी से विवाह कर लिया था। माँ के बार-बार मिलने के आग्रह को भी वह ठुकरा देती है। पर जब सोनिया का विवाह अरविंद से होता है जिसे वह बेइंतिहा प्यार करती है और जब वह गर्भवती होती है, तब वह सच्चे प्रेम और माँ की परिस्थिति को समझ पाती है। उसका यह कहना मन को छू जाता है, "मैं तुम्हें समझ रही हूँ.....बिल्कुल समझ रही हूँ।" 

"द्रोपदी जाग उठी" कहानी की लेखिका रेणु बहल जी ने कन्या भ्रूण हत्या की समस्या को बडी गहराई से अभिव्यक्त किया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों का रेशो बहुत कम है। देश के कई हिस्से इस समस्या से ग्रस्त हैं, जहाँ विवाह के लिए लड़कियाँ ही नहीं मिल पातीं। कहानी की प्रमुख पात्रा केसरो और उसके परिवार से जुड़ी समस्या इसी ओर संकेत करती है। बेटों की चाह रखने वाले परिवार को बहू तो चाहिए पर बेटी को जन्म देने से बचना चाहते हैं। टूटते परिवार को बचाने के लिए बहू पम्पो द्वारा अपने बड़े जेठ निहालसिंह के प्रति समर्पण की भावना रखना ही इस कहानी के शीर्षक को स्पष्टीकरण प्रदान करती है। महिलाओं की ख़रीद-फ़रोख़्त की बात भी पाठकों के मन में गहन विषाद भर देती है। 

डॉ. नइमत गुलची की "क्या यही ज़िन्दगी है" कहानी आम आदमी की जिजीविषा को स्पष्ट करती है। इशरक और उसकी बूढ़ी माँ की भयंकर जाड़ा सहन न कर सकने के कारण मृत्यु हो जाती है। भरपेट भोजन जिस परिवार को नहीं मिल पाता है, वह भला जाड़े से बचने के लिए किसी साधन का इंतज़ार कैसे करेगा? मौत ही उनका कफ़न बन जाती है। बरबस 'कफन' कहानी की पृष्ठभूमि याद आ जाती है। 

मैक्सिम गोर्की की "महबूब" कहानी फैंटेसी रूप में सामने आती है,जहाँ टेरेसा लेखक से अपने काल्पनिक प्रेमी को पत्र लिखवाती है और ख़ुद ही काल्पनिक प्रेमी बन स्वयं को ही उत्तर भी देती है। "मुझपर कहानी लिखो" कहानी नारी-जीवन में आने वाली विविध समस्याओं से शुरू होकर मातृत्व-भाव में विलीन हो जाती है। 

"सराबो का सफ़र" कहानी के लेखक दीपक बुड़की ने सुभद्रा के माध्यम से आज की स्वार्थी राजनीति पर करारा व्यंग्य किया है, जहाँ राजनेता, गाँधी जी के आदर्शों की बातें कहकर केवल आम आदमी को मूर्ख बना अपनी चुनावी जीत हासिल करते हैं, "गाँधी और उसके उसूल उस नस्ल के लिए सिर्फ़ खिलौने हैं, जिनसे वो आम आदमी को बेवकूफ़ बना सकते हैं।"  

अली दोस्त बलूच की "तारीक राहें" कहानी आज की ओछी राजनीति और मतदातों द्वारा ग़लत नेता चुने जाने के बाद समाज की दयनीय हालत का घिनौना सच हमारे सामने लाती है। 'शाहू' बचपन से ही ग़लत रास्ते पर आगे बढ़ता है। पिता के समझाने का भी उसपर कोई असर नहीं होता है। अपनी इन्हीं समस्त बुराइयों के बल पर वह नेता बन जाता है। उसका यह कथन लोकतंत्र पर एक गहरा तमाचा है, जहाँ किसी व्यक्ति का नेता के रूप में चुनाव उसकी योग्यता के आधार पर नहीं वरन आपसी स्वार्थ और ताक़त के ज़ोर पर किया जाता है।" सियासत से बढ़कर कोई कारोबार नहीं, मैं भी कारोबार करना चाहता हूँ। यही मेरा मक़सद और मेरी मंज़िल है।" 

अक्सर ज़िन्दगी वैसे नहीं चलती,जैसा हम चाहते या सोचते हैं। हेनरी ग्राहम ग्रीन की "उल्लाहना" कहानी इसी सत्य से हमें रु-ब-रु करवाती है। इस कहानी का मर्द और स्त्री अपने-अपने पारिवारिक जीवन की विसंगतियों के साथ विवशतापूर्ण तरीक़े से जीने को अभिशप्त हैं। कुछ देर के लिए मिला एक-दूसरे का साथ उन्हें एक सुकूँ दे जाता है, जिसकी उन्हें जीवन-भर तलाश थी और मन- ही- मन वे सोचने लगते हैं कि "ज़िन्दगी कुछ और तरह की होती अगर..।" इस 'अगर' पर आकर ही ज़िन्दगी थम जाती है। हमरा खलीक की "उम्दा नसीहत" कहानी के साधु महाराज द्वारा राजा को दी जाने वाली सलाह वर्तमान समय की परिस्थितियों की ओर संकेत करती हैं। 'यकीन केवल उनपर ही जो हमारी परेशानियों में हमारे साथ खड़े रहते हैं' -जीवन की सबसे बड़ी सीख दे जाती है। 

यदि कहानी के शिल्प पक्ष की बात करें तो भाषा सहज और सशक्त है। अनूदित होने पर भी भाषा भाव की सहचरी बन पाठकों को प्रभावित करती है, जो अनुवादक की अद्भुत प्रतिभा का सर्वोत्तम उदाहरण है। 

प्रसिद्ध उक्तियों, कहावतों और मुहावरों का सुंदर प्रयोग इस कहानी संग्रह की अन्यतम विशेषता है। कहानियों का अनुवाद करते समय कहीं भी भावों की उत्कृष्टता में कोई कमी नहीं आयी है। कुछ उदाहरण दर्शनीय हैं:

"किसी मकसद की चाह में ईमान की सच्चाई की चाशनी शामिल हो तो आदमी अपनी मंज़िल ज़रूर पा सकता है।"  (आबे-हयात,पृ.२५)

"वक़्त कायनात का सबसे बड़ा चौकीदार है।" (आख़िरी नज़र,पृ.२८)

"मरा हाथी सवा लाख"(घर जलाकर,पृ.५६)

"एक अकेला चना पहाड़ का क्या बिगाड़ लेगा।" (गोश्त का टुकड़ा,पृ.५९)

"साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।" 

"आम के आम और गुटठलियों के दाम" (कर्नल सिंह,पृ.७३)

"बिकी हुई औरत की कोई इज्ज़त नहीं होती। न घर में न समाज में,न ही लोग उसकी इज्ज़त करेंगे,...।" (द्रोपदी जाग उठी,९३)

"गुलाबी जाड़ा भूखे-नंगे लोगों की रजाई है।" (क्या यही ज़िन्दगी है,पृ.९९)

"अच्छा इन्सान बनने के लिए लगातार कड़ी मेहनत के साथ-साथ अच्छे तमीज़ भरे तौर-तरीकों का होना बुनियादी जरूरत हैं।" 

"सियासत से बढ़कर कोई कारोबार नहीं,...।" (तारिक राहें,पृ.१२४,१२८)

"बुरे वक्त में रिश्तेदार भी अपने नहीं होते।" (उम्दा नसीहत,पृ.१३९)

समग्र रूप से कहा जा सकता है कि भाषा और भाव दोनों ही दृष्टियों से प्रस्तुत अनूदित कहानी-संग्रह अपनी श्रेष्ठता स्वयंसिद्ध करता है। अगर इस संग्रह की कहानियों की विशेषताओं को सारगर्भित शब्दों में कहना हो तो आदरणीय रमेश जोशी के ही शब्दों में कहना चाहूँगा, "...सरल मानवीय जीवन, संबंधों, आशाओं और आकांक्षाओं,उसकी कमज़ोरियों और ताक़तों की सजीव कहानियाँ है।" 

समीक्षक: राजेश रघुवंशी: mobile:9763564359

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