क्या भूली??

डॉ. शैलजा सक्सेना

खाने की मेज से
रसोई तक,
रसोई से खाने की मेज तक
कितने ही फेरे ले चुकी वो,
याद नहीं.. 

चलते-चलते रुकती है बीच में
भूला सा कुछ याद दिलाने की 
कोशिश में स्वयं को.. 

क्या ढूँढ रही थी???
सब्जी काटने का चाकू
या
अपना कोई भूला सपना?? 

कहाँ रख कर भूल गई???
नमक की शीशी
या 
अपना अस्तित्त्व??

क्या लाने उठी थी??
पानी का गिलास 
या
अपनी बची -खुची ताकत?? 

भूली सी खड़ी रहती है कुछ क्षण,
फिर पुकार पर किसी की
चल पड़ती है
सोचना भूल कर। 

घूमती है उसी घेरे में,
ज़िंदगी के फेरे में..

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कहानी
कविता-मुक्तक
लघुकथा
स्मृति लेख
साहित्यिक
पुस्तक समीक्षा
कविता - हाइकु
कथा साहित्य
विडियो
ऑडियो