कुलानंद भारतीय और ’अपना घर’

01-04-2020

कुलानंद भारतीय और ’अपना घर’

डॉ. पवनेश ठकुराठी

28 अप्रैल, जयंती पर- 

 

साहित्यकार कुलानंद भारतीय का जन्म 28 अप्रैल, 1924 को पौड़ी गढ़वाल के जामणी नामक ग्राम में हुआ था। आपने एम.ए. तक की शिक्षा हासिल की और बाद में सीनियर कैम्ब्रिज स्कूल में नियुक्त हुए। सन् 1952 में आपने सीनियर कैम्ब्रिज से त्याग-पत्र देकर शक्ति नगर में भारतीय विद्यालय की स्थापना की। इसके अलावा एक शिक्षक के रूप में कुलानंद भारतीय ने प्रभाकर बी.ए. की कक्षाओं में 10-12 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। आप भारतीय शिक्षण संस्थान के अंतर्गत दो सीनियर सेकेंडरी स्कूल और दो माध्यमिक विद्यालयों के संरक्षण एवं अध्यक्ष रहे।

कुलानंद भारतीय राजनीति में भी निरंतर सक्रिय रहे। आप सन् 1969 में दिल्ली युवा कांग्रेस राष्ट्रीय एवं सन् 1971 से 1980 तक जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय युवा केंद्र के अध्यक्ष रहे। इसके अलावा आप दिल्ली विश्वविद्यालय में सन् 1972 से 1975 तक विद्वत् परिषद् के सदस्य रहे। आपने दिल्ली नगर निगम में भी अपनी सेवाएँ दीं। आप सन् 1962 से 1975 तक नगर निगम के सदस्य रहे और कई समितियों के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पदों को सुशोभित किया। सन् 1972-73 में कुलानंद भारतीय ने यूरोप के 8-10 देशों की यात्रा की। सन् 1983 से 1990 तक आप दिल्ली प्रशासन शिक्षा विभाग के कार्यकारी पार्षद अर्थात् शिक्षा मंत्री रहे। इसी दौरान सन् 1988 में आपको शैक्षिक शिष्टमंडल के नेता के रूप में जापान की यात्रा करने का अवसर मिला। शिक्षा विभाग के अलावा भारतीय जी ने तकनीकी शिक्षा, बिक्रीकर, पुरातत्व विभाग एवं आबकारी विभाग का भी सफलतापूर्वक कार्यभार सँभाला। आपके अथाह परिश्रम के फलस्वरूप देश में शिक्षा की उन्नति हुई। सैकड़ों स्कूल भवनों का सुधार हुआ और स्कूलों का परीक्षा परिणाम 83-84 प्रतिशत तक जा पहुँचा। इस प्रकार एक शिक्षाविद् एवं शिक्षा मंत्री के रूप में आपने भारत की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन किए और शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रभारी शिक्षा मंत्री के अलावा कुलानंद भारतीय दिल्ली प्रशासन में हिंदी, उर्दू, पंजाबी एवं संस्कृत अकादमियों के कार्यकारी अध्यक्ष रहे। आपने पहली बार दिल्ली में संस्कृत अकादमी की स्थापना की। अपने राजनीतिक कैरियर के दौरान ही कुलानंद भारतीय के कृतित्व एवं व्यक्तित्व में काफ़ी समानता दिखाई देती है। वे स्वयं भी राष्ट्रीय एकता एवं राष्ट्रप्रेम के उपासक थे। उनका यही राष्ट्रप्रेम उनकी रचनाओं में दिखाई देता है। कुलानंद भारतीय मधुर, मिलनसार, ईमानदार एवं कर्मठ व्यक्तितव के धनी थे। वे एक ईमानदार राजनेता, ज्ञानी, शिक्षाविद्, कुशल प्रशासक, उत्कृष्ट साहित्यकार होने के साथा-साथ एक दार्शनिक एवं समाजसेवी भी थे। एक राजनेता के रूप में उनके द्वारा किए गए कार्यों को और उनके सरल व्यक्तित्व को लोग आज भी याद करते हैं। एक साहित्यकार के रूप में कुलानंद भारतीय ने कविता, लेख, उपन्यास, संस्मरण आदि विधाओं में अपनी लेखनी चलाई। इन्होंने डौल्या; खंड काव्य, सल्ट क्रांति; कविता, नवा-खाली कांड; कविता, राहे मंजिल; उपन्यास, नगरपिता; उपन्यास, अपना घर; उपन्यास, पूजा के फूल; आध्यात्मिक पुस्तक, विदेश यात्रा; संस्मरण, बीते दिन; आपबीती, अस्सी बसंत; जीवन के विविध रूप आदि पुस्तकें लिखीं। मुरारीलाल त्यागी के संपादन में कल्पान्त प्रकाशन, से वर्ष, 2003 में प्रकाशित ‘त्रिवेणी संगम’ में इनके तीन उपन्यास अपना घर, मंजिल और राही, नगरपिता और दो प्रारंभिक काव्य कृतियाँ डौल्या और नवाखाली कांड संकलित हैं।

कुलानंद भारतीय अधिकांशतया राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहे, किंतु राजनीति के दुष्चक्रों से वे सदैव दूर ही रहे। वे स्वयं लिखते हैं: "मेरा अधिकांश जीवन राजनीति में व्यतीत हुआ, जबकि मैं संस्कारों से, विचारों से, भावनाओं से, स्वभाव से मूल रूप में साहित्य, शिक्षा, अध्यात्म का व्यक्ति रहा हूँ।...........लेकिन पचास वर्षों तक राजनीति में रहकर भी मैं राजनीतिक व्यक्ति के इन गुणों को न पा सका, निभ गया, कैसे निभ गया, यह सब भगवान की कृपा थी। भगवान ने मुझे मानवता का कवच दिया, सहनशीलता की शक्ति दी और अपने चरणों की भावभक्ति दी, इसीलिए इस दमघोंटू राजनीति में रहकर भी मेरा साहित्य जीवित रहा, समय-समय पर कविता कहानी, उपन्यास के रूप में मेरी भावनाओं की अभिव्यक्ति होती रही।”1 

राष्ट्रप्रेम कुलानंद भारतीय के रचनाओं की मुख्य वस्तु रही है। इनके उपन्यास भी राष्ट्रप्रेम और शिक्षा जगत के उच्च मूल्यों का निरूपण करते हैं। त्रिवेणी संगम की भूमिका में लेखक ने लिखा है: "प्रस्तुत प्रस्तक ‘त्रिवेणी संगम’ मेरे तीन उपन्यासों का संगम है- ‘अपना घर’, ‘मंजिल और राही’, ‘नगरपिता’। ये तीनों उपन्यास मेरे त्रिकाल के युगांतर के परिचायक हैं। अपने समय की समाज की प्रतिबिंबित, परिलक्षित रचनाएँ हैं।"2

कुलानंद भारतीय का ‘अपना घर’ उपन्यास उनके देशप्रेम तथा शिक्षा जगत के आदर्शों को व्यक्त करता है। उच्च वर्ग पर आधृत इस उपन्यास की संपूर्ण कथा ‘दयाराम कालेज’ के आस-पास घूमती है। इस उपन्यास का नायक मनमोहन है, जो अपने विद्यार्थी जीवन में रजनी से प्रेम करता है, किंतु किन्हीं कारणों से उसका विवाह मीनाक्षी से हो जाता है। उधर रजनी भी राय घसीटाराम के बेटे बालकृष्ण से विवाह कर लेती है, किंतु बाद में बालकृष्ण इंग्लैंड चला जाता है और वहीं अपना दूसरा विवाह कर लेता है। उपन्यास में नया मोड़ तब आता है, जब मनमोहन और रजनी दोनों एक ही कॉलेज में प्रोफ़ेसर बन जाते हैं। वस्तुतः इन दोनों चरित्रों के माध्यम से कथाकार ने उपन्यास में अपने शिक्षा संबंधी आदर्शों की स्थापना की है। उपन्यास का अंत कथासम्राट प्रेमचंद की उस उपन्यास कला की याद ताज़ा कर देता है, जिसमें वे उपन्यास के नायक को समाज सुधार हेतु सेवासदन और प्रेमाश्रम जैसी संस्थाओं की स्थापना करते हुए दिखाते हैं। इस उपन्यास का नायक भी अपने विराट उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ‘अपना घर’ की स्थापना करता चित्रित हुआ है: "दिल्ली से कुछ दूरी पर गाँवों की ओर। भव्य सुंदर विशाल भवन बना है। बहुत संघर्षों के पश्चात् और और कठिनाइयों के बाद मनमोहन ने इस संस्था का निर्माण किया। इस संस्था से सब लोगों को प्यार है। इसलिए इसका नाम ‘अपना घर’ है। मनमोहन इस संस्था का प्राण है।"3 इसी ‘अपना घर’ संस्था के नाम पर उपन्यासकार ने उपन्यास का शीर्षक रखा है, जो पूर्णतया उचित है।

वस्तुतः ‘अपना घर’ किसी व्यक्ति विशेष का घर न होकर संपूर्ण देशवासियों का घर है। यह देश के समस्त मानवों का घर है। वस्तुतः ‘अपना घर’ एक आदर्श और समतामूलक राष्ट्र का प्रतीक है: "अपना घर एक निजी घर नहीं है, जहाँ हम सब लोग रहते हैं, अपितु हमारा असली घर हमारा देश है। हमने आज अपने छोटे-छोटे घर बनाए हैं। जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, प्रांत के नाम पर और पार्टियों के नाम पर हमारे कई घर हो सकते हैं, लेकिन हमारा सही घर हमारा देश है, और हमारा सही मंदिर हमारा राष्ट्र है। हमारा सही धर्म हमारी देशभक्ति है, और हमारी वास्तविक जाति मानवजाति है।"4 इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने न सिर्फ़ राष्ट्रीय एकता को बल दिया है, बल्कि देश की शिक्षा-व्यवस्था और युवाओं की स्थिति का भी यथार्थ अंकन किया है: "आज मनमोहन तीसरी बार इण्टरव्यू देने गया था, लेकिन उसका दिल बिल्कुल टूट गया था। मनमोहन को नहीं लिया गया, किसी सेकिंड डिविज़न वाले को लिया गया। मनमोहन वहाँ अकेला ही प्रथम श्रेणी एम.ए. पास था, लेकिन फिर भी रह गया। उसने इंटरव्यू अच्छा दिया, उसको पढ़ाने का अच्छा चाव था। उसका विषय ज्ञान भी अच्छा था। लेकिन वहाँ कोई परखने वाला नहीं था, काँच और हीरे में अंतर बताने वाला नहीं था।"5

कुलानंद भारतीय के उपन्यासों की एक विशेषता यह भी है कि लेखक द्वारा उपन्यासों में समय-समय पर ऐतिहासिक उदाहरण देकर विषयवस्तु को स्पष्ट और कथानक का गतिशील बनाने का प्रयास किया गया है। राय घसीटामल के रायबहादुर बनने का प्रसंग दृष्टव्य है: "दिल्ली पर जब अँग्रेज़ों ने धावा किया था, तब घसीटाराम ने उनको कई गुप्त भेद बताए थे। इसीलिए अँग्रेज़ सरकार ने उनको रायबहादुर की उपाधि दी थी, बहुत बड़ी जायदाद पुरस्कार में दी थी। तभी से घसीटाराम रायबहादुर बन गए और सभी की नज़रों में चढ़ गए थे।"6 इस उपन्यास में लेखक का नारी विमर्श भी उजागर हुआ है। कथा नायम के माध्यम से व्यक्त लेखक का नारी आदर्श दृष्टव्य है: "नारी आँसुओं का घड़ा नहीं, जो केवल आँसू बहाती रहे। नारी पानी की कमज़ोर धारा नहीं, जो लोगों के मोड़ने पर मनमाने ढंग से इधर-उधर भागती रहे। वह घास का असहाय तिनका भी नहीं, जो तूफ़ानों में इधर-उधर भटकता रहे। नारी ख़रीदी हुई गुलाम नहीं, जो दूसरों के इशारे पर नाचती रहे। अपितु नारी का अपना अस्तित्व है, अपना व्यक्तित्व है। नारी प्रलय की जलनिधि है, जो विश्व को कंपा सकती है, वह तुफ़ानों की जननी है, जो विश्व वटवृक्षों को भी उखाड़ सकती है। नारी सिंहनी है, जो दूसरों पर शासन करना जानती है। नारी लक्ष्मी है, सरस्वती है, रिद्धि, सिद्धि और नवनिधि भी नारी है।..................."7

इस उपन्यास में लेखक ने मनुष्य की प्रवृत्ति और आधुनिक मनुष्य की सच्चाई का उद्घाटन करते हुए लिखा है: "मानव आगे अवश्य बढ़ चुका है, लेकिन उसकी आत्मा हज़ारों वर्षों पीछे छूट चुकी है। वह चंद्रलोक में अवश्य पहुँच गया लेकिन अभी अपनी धरती पर चलना वह नहीं सीख पाया।"8 अतः स्पष्ट है कि कथाकार मनुष्य की आत्मिक उन्नति को ही वास्तविक उन्नति मानता है। इस उपन्यास में लेखक ने आधुनिक मनुष्य ही संवेदनशून्यता को जंगलीसिंह के गीत के माध्यम से व्यक्त किया है-

"जब मानव षड्यंत्र रचता है
तब किसी का दिल दुखता है-
और किसी का दिल हँसता है,
मानव भी कितना निष्ठुर होता है।"9

कुलानंद भारतीय स्वयं शिक्षा एवं शिक्षण संस्थानों से जुड़े व्यक्ति थे, यही कारण है कि उनके इस उपन्यास में विश्वविद्यालय के स्वरूप का सम्यक् उद्घाटन हुआ है। लेखक का मानना है कि विश्वविद्यालयों का अस्तित्व पूर्णतया शिक्षकों और छात्रों पर निर्भर है: "ये बड़े-बड़े भवन विश्वविद्यालय नहीं हैं। यह ख़ाली मैदान, यह कनवोकेशनल हॉल, पुस्तकालय, यहाँ के ईंट-पत्थर, दिवालें विश्वविद्यालय नहीं हैं। विश्वविद्यालय तो आपके और हमारे संबंधों से बनी हुई एक संस्था है। विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के अनुशासन से बनी हुई शक्ति ही विश्वविद्यालय की अपनी शक्ति है। उपकुलपति या शिक्षा आयोग के नियम-उपनियमों से बनी हुई संस्था विश्वविद्यालय है।यदि हम और आप जो यहाँ पढ़ते हैं या पढ़ाते हैं, इन नियमों का पालन नहीं करेंगे तो विश्वविद्यालय का अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता।"10 शैक्षिक चेतना के साथ-साथ इस उपन्यास में लेखक की भाषाई चेतना का भी उद्घाटन हुआ है। लेखक के अनुसार अपनी भाषा और शिक्षा ही राष्ट्र की उन्नति का आधार बन सकती है: "लार्ड मैकाले की भाषा नीति अब भी हमारी शिक्षा पर शासन कर रही है। हम स्वतंत्र पर शासन कर रही है। हम स्वतंत्र हो चुके है, लेकिन शिक्षा-पद्धति अभी वही चली आ रही है। इसमें सुधार करने की बड़ी आवश्यकता है। विश्व में कोई भी ऐसा महान देश नहीं कि इतने वर्षों की स्वतंत्रता के पश्चात् भी जिसकी भाषा अपने देश की भाषा न हो। अपनी भाषा और अपनी शिक्षा ही हमको राष्ट्रभक्त बना सकती है।"11

इस प्रकार ‘अपना घर’ उपन्यास राष्ट्र प्रेम, शिक्षा-व्यवस्था और भारतीय समाज के उच्च वर्ग के शैक्षिक, राजनीतिक संदर्भों को व्यक्त करने वाला उपन्यास है। लेखक के अनुसार, राष्ट्र ही ‘अपना घर’ है और एकता इस घर की प्राण है। देश के प्रत्येक वर्ग, जाति, समूह, धर्म के लोगों ने मिलकर इस घर को सजाया-सँवारा है: "देश हमारा अपना घर है, राष्ट्र हमारा धर्म है, मानवता हमारी जाति है। हम सब एक ही पथ के पथिक हैं, जो हमें एकता की मंज़िल तक पहुँचाती है। ‘अपना घर’ इसी एकता का प्रतीक है, देश के असंख्य युवक और युवतियों का प्रेरणास्रोत है। ‘अपना घर’ सबने अपने हाथों से बनाया है, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने और प्राध्यापकों ने बड़े परिश्रम से इसका निर्माण किया। इस घर में रहकर सब लोग अपने छोटे घरों को, वर्ग दायरों को भूल जाते हैं और राष्ट्र के हित की बात सोचते हैं।"12 अतः हम कह सकते हैं कि ‘अपना घर’ शिक्षण संस्थानों की भूमिका को निर्धारित करने वाला और राष्ट्रीय एकता को महत्व देने वाला एक सशक्त उपन्यास है।

संदर्भ:

1. त्रिवेणी संगम, कुलानंद भारतीय, सं. मुरारीलाल त्यागी, कल्पान्त, दिल्ली, प्र.सं. 2001
2. वही
3. वही, पृ. 172
4. वही, पृ. 174
5. वही, पृ. 21
6. वही, पृ. 27
7. वही, पृ. 60
8. वही, पृ. 94
9. वही, पृ. 109
10. वही, पृ. 118
11. वही, पृ. 145
12. वही, पृ. 17

- डॉ. पवनेश ठकुराठी 
अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) -263601
 मो. 9528557051


 

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