अपने भीतर के ख़ालीपन को
भरने के लिए
आदमी रंग पोतता है
चेहरे पर
घर के दरो-दिवारों को
सजाता है, सँवारता है
लगा रहता है
सूनापन को भरने के लिए।


हर आदमी के भीतर
सूनापन है
भीतर से आदमी
निपट अकेला है
वह तरसता है
ममता के लिए
दौड़-धूप लगाए रहता है
हर पल. . .


मैं सोचते हुए
निकल पड़ता हूँ राह पर
क्या कभी भर पाएगा आदमी
अपने भीतर की
इस खाई को. . .
देखता हूँ कई गड्ढे हैं
अपने भीतर।


हर पल गिरता हूँ
अपने ही नज़र से
दूसरों से नज़र चुराकर
अपने को खड़ा दिखाने के लिए
कई तरक़ीबें करनी पड़ती हैं
मैं सोचता हूँ
और मुकर जाता हूँ।

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