ख़ाली दीवार

आशुतोष कुमार


कुछ लोगो के पास मैडल नहीं मेडल्स होते हैं और वह भी इतने कि कभी-कभार सोचता हूँ कि भई एक-आध अपने पास भी रहे तो कमरे की शोभा बढ़े। जिस मित्र के घर जाता हूँ वहाँ उसके कमरे या दीवाल पर कहीं न कहीं कोई ट्रॉफी या मैडल लटककर दीवार की शोभा का केंद्र बना रहा होता है। यदि अगला मेहमान उसे न भी देखना चाहे तो मेज़बान किसी न किसी बहाने मैडल को दिखाएँगे ज़रूर। मसलन उस दिन प्रमोद चाची के यहाँ गया हुआ था। वैसे तो चाची काफी कम सफ़ाई करती थी मगर जिस दिन मैं आता, मुझे उस कमरे में बैठा देतीं। फिर किसी बहाने से झाड़ू लगाते हुए मैडल गिरा देंगी और आप ही आप बताना शुरू कि यह मैडल रोहन का है; स्कूल से मिला है। एक दिन मुझसे भी न रहा गया, मैंने भी पूछ लिया, "ऐसा कौन सा बड़ा मैडल है यह भला?"

चाची ने बताया कि उसे तैराकी में प्रथम आने पर मिला।

मैंने कहा, "यह हो ही नहीं सकता, रोहन को तैराकी नहीं आती।"

चाची का मुँह साँप की केंचुली की तरह लटक गया। अगले दिन से दीवार पर से मैडल उतरा हुआ था।

एक मेरे गाँव में डॉक्टर थे ब्रजकिशोर नाम के। वह बहुत अच्छे डॉक्टर थे; इतने अच्छे कि हर बीमारी का इलाज पैरासिटामोल देकर ही करते। बीमारी चाहे कैंसर की हो या मामूली ज़ुकाम मगर अपने मरीज़ को पहले वह पैरासिटामोल ही देकर विदा करते। गणतंत्र भारत में शायद वह पहले डॉक्टर रहे जिन्होंने बीमारी के साथ भी कोई भेद नहीं करते हुए सभी को एक-समान ही माना। उनके क्लीनिक पर भी डॉक्टर की एमबीबीएस की डिग्री लटकी रहती है; मगर जब भी उनसे इस बारे में कोई पूछता कि कैसे और कहाँ से पढ़ाई की तो वह बात काट दिया करते हैं। 

ऐसे ही एक दूसरा क़िस्सा और स्मरण आता है, गणेश चतुर्थी का। गली वालों ने मिलकर आयोजन रखा था नृत्य का जिसमें आस-पास के अलावा कुछ बाहर से भी दूसरे मोहल्ले के लोग भी शामिल हुए। बाद में पुरस्कार और ट्रॉफियां बटी मगर बाटने के बाद भी जिन्होंने आयोजन किया था उन्होंने कमेटी बैठा दी भला इन बचे हुए मैडल का क्या किया जाए फिर सबकी सम्मति से सभी ने वही मैडल अपने पास रख लिया अब भी वह उनके घर में इस बात का सबूत है की उन्होंने अपने चतुर्थी पर डांस प्रतियोगिता में भाग भी लिया और जीतकर मैडल भी हासिल किया बस नाचने की उन्हें फुर्सत न हुई मगर मैडल लिए गए। मगर मैडल सबकी सहमति से लिए गए और लिए भी क्यों न जाए यह लोकतंत्र जो ठैरा यहां पर सबकुछ बहुमत से होता है फिर वह सरकार बनना बानाना हो या भृष्टाचार करना।
मगर मेरी दीवार अभी तक सुनी है और मुझ जैसे कितनो ही मूर्खो की दीवार सुनी पड़ी हुई है, जो दिन रात मेहनत करते हुए देश के आकार,संचार और अविष्कार को अपने हुनर से बढ़ाने की कोशिश में कितनी प्रतियोगिताओं में अपनी चप्पल घिस चुके है मगर फिर भी दीवार ख़ाली है....!

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