कविता लिखती है एक औरत 

15-10-2019

कविता लिखती है एक औरत 

अंजना वर्मा

आ गई है कविता
पतली धानी पत्तियों से झाँकते 
अनार के चटकीले फूल की तरह
वह उसकी खिड़की पर बैठकर
उसे बुला रही है संकतों से


कविता को देखते ही वह औरत 
हुलसकर पकड़ लेती है
उसके कोमल हाथ
पर फिर अचानक छोड़कर 
वापस भाग जाती है
जैसे किसी ने डोर खींच ली हो
गैस पर चढ़ी सब्ज़ी जल रही है
वह दौड़कर हिलोरने लगती है उसे


कविता वहाँ बैठी मुस्कुरा रही है
कहती है, "आओ ना! बातें करें"
"हाँ!" वह  छोटा-सा जवाब देती है
और सब्ज़ी हिलोरती हुई
मसालों से सुगंध निकलने का
इंतज़ार करती है


वह कविता की ओर देखकर
मुस्कुराती है ख़ुशामद में
इस उम्मीद से
कि ऐसा करने से
कविता थोड़ी देर इंतज़ार कर लेगी


सब्ज़ी में पानी डालकर 
वह फिर भागती है कविता के पास
कविता का हाथ
अपने हाथ में लेकर
दूसरे हाथ से पकड़ लेती है उसका हाथ
हाथों को लेकर अपने हाथों में
विभोर होकर 
आँखें मूँद लेती है
झर रहे हैं शब्द
हरसिंगार की तरह


कि अचानक उसे दिखायी पड़ता है
दूध उफनकर पतीले के ऊपर
किनारे तक पहुँच गया है
अब गिरा तब गिरा


वह फिर हाथ छुड़ाकर 
माफ़ी -सी माँगती हुई 
भागती है
दौड़कर गैस बंद करती है


कुछ शब्द खिड़की पर छूटे
कुछ कपड़ों में चिपके
कुछ साथ चले आये
कुछ चूल्हे पर गिरे
कुछ फ़र्श पर


उधर कविता 
अब उठकर खड़ी हो चुकी है
टोस्टर से ब्रेड 
निकल चुका है
मेज़ पर बैठे हैं पतिदेव
वह अंडे के लिए पैन चढ़ाती है
और कविता को
रुकने का संकेत करती है


जल्दी-जल्दी अंडा फ़्राइ कर
प्लेट पतिदेव तक पहुँचा देती है
और घबराकर देखती है 
खिड़की की ओर


कविता पीठ घुमा चुकी है
वह दौड़कर पहुँचती है कविता के पास
और कहती है
"रुको! ओ कविता! रुको!
अब फ़ुर्सत मिल गयी है मुझे
अब तुमसे बातें करूँगी
तुम शब्दों का पिटारा 
खोल दो मेरे लिए"
लेकिन उसकी बात पूरी होती
इसके पहले ही
कविता ग़ायब हो जाती है
ऐसे जैसे कभी आयी ही न हो
वहाँ गिरे थे कुछ शब्द


औरत
खुली खिड़की के बाहर झाँकती है
कि शायद वहाँ वह खड़ी हो
पर वहाँ वही दृश्य था
जो रोज़ रहता है


तब क्षुब्ध  होकर वह 
कुछ शब्द खिड़की से बटोरती है
कुछ चूल्हे पर से
कुछ खाने की मेज़ से
कुछ रसोई की फ़र्श से
कुछ अपने कपड़ों से
वह गूँथने लगती है
बटोरे गये शब्दों की माला
गहरे अफ़सोस के साथ

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