कसौटी रिश्ते की

23-02-2019

कसौटी रिश्ते की

निर्मला कपिला

उनकी आँखों से आँसुओं का सैलाब थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। मैं उनको रोकना भी नहीं चाहती थी... आज उनके दर्द को बह जाने देना चाहती थी। मैंने तो एक दर्द के लिये भी सैंकड़ों आँसू बहाये हैं, पर इस कर्मनिष्ठ इन्सान ने सैंकड़ों दर्द सह कर भी कभी एक आँसू नहीं बहाया.....। दर्द का एक-एक टुकड़ा परत दर परत दिल में दबाते रहे...। पर आज एक टुकड़ा नहीं पूरा दिल ही जैसे पिघल कर बाहर आने को था... और जब तक दर्द बाहर न आये उसकी टीस सालती रहती है। इनका दर्द उन अपनों के कारण था जिनके सर पर इन्होंने अपने वज़ूद का आस्मां ताने रखा..। जिस घर की मिट्टी से लेकर इन्सानों तक को इन्होंने प्यार और क़ुर्बानी के तकाज़ों से सँवारा था। अपने अरमान, अपनी ज़िन्दगी के सुनहरी पल, जवानी के सपने सब उन्हें सौंप दिये थे। आज उन्हीं भाइयों ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। जिन भाइयों पर अपना सब कुछ लुटाया उन्हींने इन्हें लूट लिया था। ज़मीन के एक टुकड़े के लिये कोई इतना ख़ुद गर्ज़ हो सकता है, सोचा नहीं था। हमें घर ज़मीन में से हिस्सा देना उन्हें गवारा नहीं था।

मैंने उनकी ज़िम्मेदारियों को कभी दिल से और कभी मजबूरी में बाँटा था। दिल से इसलिये कि परिवार के लिये हमारा जो फ़र्ज़ होता है उसे करना ही चाहिये। मजबूरी में इसलिये कि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें करने से अगर अपने सभी सपने जल कर खाक़ हो जायें और वो काम फिर भी करना पड़े, तो वो मजबूरी में होता है। जब हम घर के रिश्तों में संतुलन नहीं रख पाते तो ये स्थिति आ ही जाती है। आख़िर मैं भी इन्सान ही थी।

मगर आज अपनी ज़िम्मेदारी दिल से निभाना चाहती थी उन्हें रुला कर...। क्योंकि मैं जानती थी इन आँसुओं के साथ बहुत कुछ बह जायेगा... टीस कुछ कम हो जायेगी...। आँसू कहीं थम न जायें... मैंने बात शुरू की,

"आपको याद है अपनी ज़िन्दगी में पहली तीन रातें ही अपनी थीं। उसके बाद जो तूफ़ान आये उसी में सब कुछ बह गया। और जो बचा, वो आपके भाई साहिब के पाँच बच्चे... जो हमारे साथ बँध गये...। कोई कैसे सोच सकता है कि नई दुलहन के साथ तीन-तीन बच्चे सोयें और दूसरे दो साथ ही दूसरी चारपाई पर? और उन तीन दिन के बाद ही मेरे सपने जो न जाने कितनी कुँवारी रातों ने हसरत से सँजोये थे, टूट गये। उस दिन मैं भी ऐसे ही रोयी थी...। आपके और बच्चों के सो जाने के बाद खिड़की में खड़ी हो कर चाँद को देखती... अपने सपने ढूँढ़ती मगर न उनको आना था और न आये...।" और दोनों की आँखें निरन्तर बरस रही थीं।

शादी के तीन दिन बाद ये टूर पर चले गये फिर इनके एग्ज़ाम थे और मैं मायके चली गयी थी। अभी मैं दोबारा ससुराल आने ही वाली थी कि अचानक मेरी जेठानी की मौत हो गयी। और उसकी चिता के साथ ही जल गये मेरे सारे सपने। उनके पाँच बच्चे थे। घर में सास-ससुर, जेठ जी और एक देवर.. सब इकट्ठे रहते थे। माँ जी अस्थमा की मरीज़ थीं। घर का सारा बोझ एकदम मेरे ऊपर आ गया। जिस लड़की ने मायके में कभी रसोई में क़दम नहीं रखा था, उसके लिये ये कितनी बड़ी परीक्षा थी? मायके में भाभियाँ बहुत अच्छी थीं। हमें अपने बच्चों की तरह प्यार करतीं थीं.. काम को हाथ नहीं लगाने देतीं। बस शादी से पहले थोड़ा-बहुत सीखा था।

जेठ जी ने जीते जी कभी पत्नी की परवाह नहीं की... उसे मारते पीटते भी थे और वो इसी ग़म में पागल हो गयी। लेकिन उसके मरने के बाद उसके ग़म में डूबे रहते या शायद उसका ग़म नहीं, बच्चों को पालने की चिन्ता थी। मगर राम सरीखा भाई हो तो क्या मुश्किल है? घर के बाहर के बाक़ी सब कामों की ज़िम्मेदारी इन्होंने अपने कन्धों पर ले ली। घर में एक मुर्गीखाना जिसमें 100 से अधिक मुर्गियाँ थीं। अपना इन्कुबेटर था घर में, दो भैंसें, एक गाय भी थी। कोई सोच सकता है कि कितना काम होता होगा? फिर साथ में नौकरी भी करनी। जबकि माँजी अस्थमा के कारण अधिक काम नहीं कर पाती थीं।

एक 20-22 वर्ष की दुबली-पतली लड़की, माँ-बाप की राजकुमारी, शाही ज़िन्दगी से निकल कर एक छोटे से गाँव के अस्त-व्यस्त घर में जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती। उस समय तो पिता जी ने सिर्फ़ लड़के की नौकरी, उनका भविष्य और ज़मीन-जायदाद देख कर रिश्ता किया था; मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था।

मुझे आज भी याद है वो रात जब मुझे डोली से निकाल कर एक कमरे में बिठाया गया। उस कमरे के एक कोने में बाण की चारपाई पड़ी हुई थी..। जिसमें से बाण की रस्सियाँ टूट-टूट कर लटक रही थीं...। देखते ही मुझे लगा जैसे ये साँप लटक रहे हैं जो मुझे डस जायेंगे...। ज़िन्दगी भर उनका भय मेरे मानस पट पर छाया रहा। दूसरे कोने में एक चक्की पड़ी हुई थी... मुझे आभास हो गया कि मेरी ज़िन्दगी इस चक्की के दोनों पाटों में पिसने वाली है। उस चक्की के पास चप्पलों के चार-पाँच जोड़े पड़े थे, उन्हें इतनी बेरहमी से रौंदा गया था कि उनमे छेद हो गये थे.... और ऐसे ही छेद मेरे दिल में भी हो गये थे। कुछ दृश्य पहले ही ज़िन्दगी का आईना बन जाते हैं... मेरा भी यही ह्श्र होने वाला था। सब ने इन जूतों की तरह मेरे दिल में छेद किये, ख़ुशियों को डसा और मेरे अधिकारों और कर्तव्यों के बीच ज़िन्दगी पिस कर रह गयी। भाई साहिब को दूसरी शादी इसलिये नहीं करने दी ताकि इन बच्चों का भविष्य सौतेली माँ के हाथों ख़राब न हो। मुझे ही सौतेली बना दिया। क्या पाँच बच्चों का बोझ एक 22-23 साल की कुँवारी लड़की उठा सकेगी? ये क्यों नहीं सोचा?

ख़यालों को झटका लगा... शायद इनके आँसू थमने लगे थे। शायद उन्हें मेरे अन्दर चल रहे चलचित्र का आभास हो गया था। फिर भी मर्द अपने ऊपर इल्ज़ाम कब लेता है; अपनी सफ़ाई के लिये कुछ शब्द ढूँढ़ रहे थे। मगर आज मुझे कोई सफ़ाई नहीं चाहिये थी मैं सिर्फ़ उन्हें रुलाना चाहती थी। इसलिये नहीं कि मैं उनसे बदला लेना चाहती थी बल्कि इसलिये कि दोबारा रोने के लिये आँसू न बचें और उनका दर्द, नामोशी, पश्चाताप सब कुछ बह जाये।...

"आपको याद है आप और आपके घर वाले अपना बच्चा ही नहीं चाहते थे... और माँ जी भी कहतीं ये बच्चे भी तो अब आपके ही हैं....। पालने वाले भी तो माँ-बाप ही होते हैं। अगर चाहो तो यशोदा जैसा प्यार मिल सकता है...। मगर एक औरत के अन्दर की माँ को किसी ने नहीं देखा। जब ग़लती से प्रेगनेंसी हुई तो आप बच्चा गिराने पर ज़ोर देने लगे। आपका तर्क था कि जिस माह बच्चे का जन्म होगा उस माह इन बच्चों के पेपर होंगे...। घर कौन सँभालेगा? माँ जी बीमार रहती हैं।

“और आपने अपने परिवार के प्रति निष्ठा निभाने के लिये मेरे ममत्व का ख़ून करवा दिया....! दूसरों के बच्चों की ख़ातिर मेरे बच्चे की बलि...? ओह! आप इतने कठोर हो सकते हैं? मैं विश्वास नहीं कर पाई मगर सच मेरे सामने था और उस दिन के बाद मैं पत्थर बन गयी। औरत सब कुछ सह सकती है मगर किसी की ख़ातिर अपने बच्चे की बलि... ये नहीं सह सकती और उस दिन से मैं पत्थर बन गयी। माँ-बाप के संस्कार थे। सब कुछ सहन करने की शिक्षा मिली थी...। उनको लाज लगवाना नहीं चाहती थी मगर उस दिन के बाद ज़िन्दगी को एक लाश की तरह ढोया...। उस दिन के बाद मेरा दिल आपके लिये नहीं धड़का..... बस अन्दर ही अन्दर जीने के लिये साँस लेता रहा.... नारी और क्या कर सकती है? समाज में रहने के लिये उसे अपनी इच्छाओं का बलिदान देना ही पड़ता है। लेकिन आज कोई आपका भतीजा-भतीजी किसी का एक ही बच्चा पाल कर दिखा दे तो समझूँगी कि मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया।" मैं बोले जा रही थी....

“मुझे नहीं याद कि कभी हम एक दूसरे से कभी दिल की कोई बात भी कर पाये कभी इकट्ठे एक जगह अकेले में बैठ पाये। सिवा इसके कि आप अपना पति का हक़ नहीं भूले.... मगर फ़र्ज़ ज़रूर भूल गये थे। आपके साथ लिपटे बच्चों को सोये देख कर न जाने कितने ख़ून के आँसू पीती रही हूँ... कई बार मन करता आप और मैं सिर्फ़ दोनों हो मगर कहाँ....। बच्चों को आपसे लिपटे देख कर टीस उठती... ग़ुस्सा आता मगर बेबस थी आपसे कुछ कहती भी तो किस समय? मेरे लिये तो आपके पास वक़्त ही नहीं था।

“फिर तीन साल बाद अपनी बेटी हुई। शायद उसकी भी बलि दे दी जाती मगर मैंने बताया बहुत देर से। नौकरी और घर परिवार के कामों में मेरे लिये उसे पालना मुश्किल हो गया। मैं उसके साथ ये ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकती थी इस लिये उसे मायके में छोड दिया। किसी ने भी तीन साल में उसकी सुध नहीं ली। छुट्टी वाले दिन उसे साईकिल की टोकरी में आगे बिठा कर गाँव ले आती; मगर आपने कभी उसे गोद में उठा कर नहीं देखा होगा। हैरान हूँ कभी किसी ने उसके लिये एक खिलौना तक ला कर नहीं दिया। बस हफ़्ते में एक दिन मेरा उसके लिये नसीब होता था। कौन माँ अपने बच्चों को छोड़ कर दूसरों के बच्चे पालती है? आपको खेतों से, नौकरी से, मुर्गीखाने से और उन बच्चों की पढ़ाई से समय मिलता तो कभी देखते कि मैं कैसे तिल-तिल कर मर रही हूँ, बेमौत...! मैं भी अपने अधिकार चाहती थी। मानती हूँ कि हमें संयुक्त परिवार में बहुत कुछ दूसरों के लिये करना पड़ता है... अपने सुख छोड़ने पड़ते हैं मगर उनकी भी कोई तो हद होती होगी? लेकिन मेरे लिये कोई नहीं। जिस हद तक मुझे सहन करना पड़ा उसे शायद ही कोई कर पाये।

“आज मैं जब उन दिनों के बारे में सोचती हूँ तो सिहर जाती हूँ। बीमार हूँ या ठीक, काम करना ही होता था...। इतनी दुबली-पतली लड़की पर कभी किसी ने रहम नहीं किया। सुबह चार बजे उठना, पूरे परिवार का नाश्ता और दोपहर का खाना भी बना कर रखना पड़ता था। मेरे पड़ोसी मेरे बरतनों की खनखनाहट सुन कर जान जाते कि चार बज गये हैं। साईकिल चला कर नौकरी पर जाना। दोपहर को वहाँ से बच्चे को देखने जाना और फिर शाम को ड्यूटी के बाद साईकिल चला कर गाँव आना। दिन भर के बर्तन माँजने फिर रात के खाने के लिये जुट जाना। 11 बजे तक काम निपटा कर थकान से बुरा हाल होता, लेकिन इस बात की किसे परवाह थी। बदन दुखा तो अपने आप दर्द की गोली खा कर सो जाना।

"ये तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें थीं। हमें तो एक छोटी सी ख़ुशी भी नसीब नहीं होती थी। याद है रिश्तेदारी में एक शादी पर जब मुझे भी सब के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। अपनी शादी के कुछ दिनों बाद ही मैं सजना सँवरना भूल गयी थी। उस दिन मुझे अवसर मिला था। जब तैयार हो कर आपके सामने आयी तो आपने शायद पहली बार इतने ग़ौर से देखा था...। न जाने कहाँ से एक अवारा सा अरमान आपके दिल में उठा था। अवारा इसलिये कि ऐसे अरमान आपके दिल में उठते ही नहीं थे। अगर उठते थे तो आप छिपा लेते थे...। तभी आप बोले, "आज हम सब से पहले घर आ जायेंगे। कुछ पल अकेले में बितायेंगे।"

"क्या सच...?" मेरी आवाज़ में छिपा व्यंग्य इन्हें अन्दर तक कचोट गया था.. चाहे बोले कुछ नहीं मगर आँखों में बेबसी के भाव मैंने पढ़ लिये थे। एक दर्द की परछाई इनके चेहरे पर सिमट आयी थी। और ऐसी कितनी परछाइयाँ साथ रहती थीं, अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है।

मुझे पता था कि मुश्किल है हमें माँजी अकेले में भेजें। वो नहीं चाहती थीं कि हम दोनों कभी अकेले में बैठें। मुझे पता नहीं क्यों उन पर कभी ग़ुस्सा नहीं आता था। उन्होंने बचपन में सौतेली माँ के हाथों इतने दुख झेले थे। मेरे ससुर जी की पकिस्तान में अच्छी नौकरी थी। वो पटवारी थे मगर आज़ादी के बाद दंगों में उन्हें सब कुछ वहीं छोड़ कर भारत आना पड़ा। कुछ अपनी ज़मीन यहाँ थी तो नौकरी भी फिर से यहीं मिल गयी। यहाँ भी संयुक्त परिवार था सात भाइयों का तो मेरी सासू जी सब से छोटी थीं, इस लिये यहाँ भी उन्हें बहुत दुख झेलने पड़े। शायद अब भी उनके मन में एक असुरक्षा की भावना थी। मुझे कभी कुछ कहती भी नहीं थीं। अपनी बीमारी से भी दुखी थीं। इसलिये मुझे उन पर ग़ुस्सा नहीं आता। उन्हें डर था कि अगर हम में प्यार बढ़ गया तो मैं इन्हें शहर न ले जाऊँ। और उस दिन भी यही हुआ जैसे ही हम खाना खाने के बाद चलने को हुए तो इन्होंने कहा कि आपने तो रात को आना है, हम लोग घर चलते हैं पशुओं को चारा भी डालना है..। तो माँजी एकदम से बोल पड़ी..."बच्चों को भी साथ ले जाओ।" और मैं एक अनजान पीड़ा से तिलमिला गयी। फिर अकेले कुछ समय साथ बिताने का सपना चूर-चूर हो चुका था।

इनका रोना रुकने की बजाये बढ़ गया था। यही तो मैं चाहती थी....

"आपको याद है मुझे अपने मायके के सुख-दुख में भी शामिल होना नसीब नहीं था। मेरे जवान भाई की मौत आपकी भाभी के बाद 6-8 माह में ही हो गयी थी... तो संस्कार के तुरन्त बाद ही आप मुझे घर ले आये थे। मुझे अपनी माँ के आँसू भी पोंछने नहीं दिये थे... आप मुझे रोने भी नहीं देते झट से डाँट देते..."रो कर क्या भाई वापिस आ जायेगा?".... ओह! किस तरह टुकड़े-टुकड़े मेरे दिल को पत्थर बनाया था... आज तक न कभी हँस पाई न रो पाई। लड़की को ही क्यों हक़ नहीं होता कि वो अपने माँ-बाप के सुख-दुख में काम आये जैसे कि आप अपने माँ-बाप के काम आ रहे थे।

अगर एक-एक दिन और रात का आपको हिसाब दूँ तो शायद आज आप भी सकते में आ जायेंगे। आपने केवल अपनी नज़र से ज़िन्दगी को देखा है; आज मेरी नज़रों से देखोगे तो आपका दर्द बह जायेगा और मुझे भी शायद कुछ सकून मिलेगा।

“इसीलिये मैं आपको रो लेने देना चाहती हूँ। आपको रोने से नहीं रोकूँगी... आपको पत्थर नहीं बनने दूँगी... भुक्तभोगी हूँ... जानती हूँ पत्थर बना हुया दिल ज़िन्दगी पर बोझ बन जाता है...। दुनिया के लिये, अपने लिये निर्दयी हो जाता है।

“राम सीता के लिये कठोर हो सकते हैं मगर दुनिया के लिये तो भगवान ही हैं। क्या राम के बिना दुनिया की कल्पना की जा सकती है? मैं सीता कि तरह उदार तो नहीं हो सकती कि आपको माफ़ कर दूँ मगर फिर भी चाहती हूँ कि आप दुनिया के लिये ही जीयें। मैं दुनिया को एक कर्तव्यनिष्ठ इन्सान से वंचित नहीं करना चाहती। काश भगवान मुझे भी आप जैसा बनाता, कामनाओं से मुक्त..., स्वार्थ से परे...! मेरा अपने सुख के लिये शायद स्वार्थ ही था जो आपको कभी माफ़ नहीं कर पाई। हाँ लेकिन एक बात का सुकून ज़िन्दगी भर रहा कि मैंने वो किया है जो शायद आज तक किसी ने नहीं किया। अपना दर्द तब भूल जाती हूँ जब गाँव के लोग कहते हैं कि ऐसी बहू न कभी आयी थी न शायद आयेगी। बस इसी एक बात ने मुझे विद्रोह करने से रोके रखा। हाँ, ज़मीन बाँटे जाने तक सब के लिये मैं महान थी मगर जब अपना घर बनाने की बारी आयी तो मैं बुरी हो गयी। जो औरत शादी के पच्चीस साल तक घर में सब के लिये वरदान थी, वो बाद में कैसे बुरी हो गयी? शायद मतलब निकल जाने के बाद ऐसे ही होता है। मुझे हमेशा बहला-फुसला कर ही सब ने अपना मतलब निकाला और मैं अपने सभी दुख इसीलिये भूल जाती थी।

“मेरे वो पल जब मैं अपने पंखों से दूर आकाश तक उड़ना चाहती थी आपके संग हवाओं, फूलों,पत्तियों से ओस की बूँदों, तितली के पँखों से रिमझिम कणियों से आपके संग भीगना चाहती थी। लेकिन भीगने के लिये क्या मिला उम्र भर आँसू!... आपके दिल की धुन से मधुर संगीत सुनना चाहती थी... आपकी आँखों में डूब जाना चाहती थी, आपकी छाती पर सिर रख कर सपने बुनना चाहती थी.. पता नहीं कितने अरमान पाल रखे थे दिल में। क्या मेरे वो सपने कोई लौटा सकता है? आप? आपके भाई? या फिर वो बच्चे जिन्हें अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया। 2 साल का था सब से छोटा... 9 साल का सब से बड़ा। क्या कभी उन्होंने आकर पूछा है आपका हाल बल्कि सारी उम्र मेरे पास रहे और जब नौकरियाँ लग गयीं, शादियाँ हो गयीं तो अपने बाप के पास चले गये। अब रास्ते में देख कर मुँह फेर लेते हैं।

“ख़ैर हम दिल का रिश्ता तो कभी बना नहीं पाये। सपने जो दिल के रिश्तों के साक्षी थे कब के टूट गये हैं। रिश्ता केवल आपने रखा अपने पति होने का। बिस्तर तक सिमटे रिश्ते की उम्र दूध के उफान की तरह होती है, बिस्तर छोड़ा और रिश्ता ख़त्म। एक अभिशाप की तरह था मेरे लिये वो रिश्ता। मगर आज सब कुछ भूल कर हम एक नया रिश्ता तो क़ायम कर सकते हैं... एक-दूसरे के आँसू पोंछने का रिश्ता... सुख के साथी तो सभी बन जाते हैं मगर सच्चा रिश्ता तो वही है जो दुख में काम आये... निभे..।”

और मैंने उनका आख़िरी आँसू अपनी हथेली पर समेट लिया एक नये अटूट रिश्ते को सींचने के लिये।

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