कर्म महान है

रचना गौड़ 'भारती'

सुबह-सुबह अति प्रसन्नता से मयंक का दिल नाच उठा जब कम्प्यूटर की सूखी कार्टरेज जिसे उसने रात भर पानी में डुबोए रखा था इसी उम्मीद से कि शायद चल जाए। वही कार्टरेज धकाधक सुन्दर शब्दों को काग़ज़ पर फर्राटे से छाप रही थी। यकायक उसकी निगाह उसकी पत्नी पर पड़ी जो बड़ी लगन से टेबल पर बैठी कुछ लिख रही थी। 

मयंक ने आवाज़ दी- “रजनी ! देखो वो बेकार व सूखी कार्टरेज चल पड़ी। फिर चुटकी काटते हुए बोला- “मेरी कार्टरेज व पत्नी दोनों एक समान है दोनों के एक से रिज़ल्ट हैं।”

“हाँ भई! मुझे भी लिखने में प्रेरित कर तुमने किसी मुकाम पर पहुँचाने के लिए धक्का लगाया। लेकिन जनाब हीरा तो पहले खान में ही दबा होता है। दुनिया उसकी चमक देखती है, तराशने वाले की मेहनत कोई नहीं देखता।”

“आख़िर जौहरी तो मैं ही हूँ। हीरा न पहचानता तो चमकता कैसे और दुनियां तक पहुँचता कैसे?”

“मेरा लिखने का काम तो लगभग रुक गया था जरा प्रोत्साहन न मिलता और मेहनत व लगन की तपस्या के लिए प्रेरित न किया जाता तो मेरी किताब कभी पूरी नहीं होती।”

“अब समझ जाओ मंज़िल तक पहुँचने के लिए क़दमों की गति कभी नहीं रोकनी चाहिए सतत गतिशील रहने से मंजिल कभी न कभी अवश्य मिलती है।

इतने में ही कम्प्यूटर से खर्र खर्र करता पन्ना निकला जिसपर गहरी स्याही से लिखा था-  “कर्म महान है, लगातार चलते रहो समय को मत देखो, मंज़िल मिलेगी ज़रूर।” 
 

0 Comments

Leave a Comment