कबीर का एकेश्वरवाद : हिन्दू -मुस्लिम से पृथक एक स्वतंत्र आध्यात्मिक /धार्मिक चिंतन

15-05-2020

कबीर का एकेश्वरवाद : हिन्दू -मुस्लिम से पृथक एक स्वतंत्र आध्यात्मिक /धार्मिक चिंतन

सुभाष चंद्र

कबीर की विश्व दृष्टि का आधार उन का एकेश्वरवाद है। आत्मसातीकरण की प्रक्रिया के तहत कबीर की जो चीज़ सब से अधिक प्रभावित हुई है वह है उन का दर्शन। कहने को तो कहा जाता है कि कबीर की आत्मसात करने में हिन्दू धर्म के साथ-साथ इस्लाम और ईसाई धर्म के लोग भी पीछे नहीं रहे। अब्दुलहक देहलवी, मोहसिन काज़ी, अली सरदार जाफ़री और इतिहासकार यूसुफ हुसैन खान ने कबीर पर इस्लाम के एकेश्वरवाद (तौहीद) का प्रभाव माना है। इसी तरह ईसाई विद्वानों में वेस्टकाट, फ़र्ककुहर, ग्रियर्सन, विल्सन ने कबीर पर ईसाइयत के प्रभाव के तहत देखा है। लेकिन इन दोनों धर्म कबीर को आत्मसात करने में सफल नहीं हो सके। इतिहासकार इरफ़ान हबीब कबीर पर इस्लाम के प्रभाव से इंकार किया है। कबीर को आत्मसात करने जो थोड़ी बहुत सफलता मिली है, वह हिन्दू धर्म के लोगों को मिली है। कबीर के वैष्णवीकरण के लिए अनेक मिथक गढ़े गए हैं, किंतु इस के बावजूद कबीर की दार्शनिक स्वायत्तता आज तक बरक़रार है। कबीर का निर्गुण राम हिंदुओं के सगुण राम यानी "दशरथ सुत राम" से ही भिन्न नहीं है बल्कि वह हिंदुओं के निर्गुण से भी भिन्न है। कबीर न ब्राह्मण की तरह के सगुणोपासक हैं और न ब्राह्मण की तरह के निर्गुणोपासक। कबीर बौद्धों की तरह के "शून्यवादी" भी नहीं हैं, क्योंकि वह ईश्वर में भी विश्वास रखते हैं। ब्राह्मण के सगुण और निर्गुण बाहर प्रकट हैं - उस के पास वैष्णव और वेदांती दोनों है। पर क्या कबीर के पास कुछ नहीं है..? कबीर वैष्णव और वेदांती नहीं हैं, क्योंकि उस की उन्हें अनुमति नहीं है। तब कबीर के पास क्या है..? कबीर के पास सगुण रूप में राम और कृष्ण से भी बड़ी चीज है। कबीर ने अपने निर्गुण की उपासना पति और पत्नी के लौकिक प्रेम के माध्यम से की है। इस तरह कबीर का निर्गुण राम वैष्णव और वेदांती दोनों से पृथक और भिन्न है। एक दूसरे आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर के दर्शन को हठयोगियों के "द्वैताद्वैत विलक्षण समतत्ववाद" से जोड़ते हुए भी स्पष्ट लिखते हैं कि "चाहे कबीर साहब हों अथवा पन्द्रहवीं सदी के दूसरे निर्गुणवादी, उन सब के मार्ग प्रदर्शक गुप्त रूप से पुराण ही हैं।" (कबीर) इतना ही नहीं वह कबीर को रामानन्द की परम्परा के अंतर्गत ही रखते हैं, क्योंकि उन के अनुसार, "सभी परम्पराएँ इस बात का समर्थन करती हैं कि कबीरदास का रामानन्द के साथ सम्बन्ध था.." (कबीर) डॉ. द्विवेदी ने यह नहीं सोचा कि एक दूसरी परम्परा यह भी है कि कबीर के गुरु रामानन्द नहीं थे। डॉ. द्विवेदी ने नाथयोगियों को भी सीधे ब्राह्मण परम्परा से जोड़ा है। इस तरह उन की नज़र में भी कबीर वैष्णव परम्परा के ही दार्शनिक ठहरते हैं। जब कि कबीर ने डंके की चोट पर कहा है कि "ब्राह्मण गुर जगत का, साधु का गुरु नाहिं।" इस के साथ अपने को "ना हिन्दू" भी कहा है। कबीर जब अपने को "ना हिन्दू" कहते हैं तब वह वैष्णव सहित सभी हिन्दू परम्पराओं का विरोध करते हैं। जब कबीर हिन्दू धर्म को नकारते हैं तो पूरे हिन्दू धर्म को नकारते हैं और हिन्दू धर्म को नकारते हुए सारे हिन्दू धर्मग्रंथों और धर्मगुरुओं को नकारते हैं। कबीर के अध्ययन की शुरुआत विदेशी विद्वानों के स्तर से हुई और सब से पहले रेवरेंड जी एच वेस्टकाट ने 1907 में "कबीर एंड द कबीर पंथ" नामक पुस्तक लिख कर की। आश्चर्य की बात है कि हिंदी वालों ने इस पुस्तक के बाद ही कबीर पर लिखना शुरू किया था। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अपने लेख "कबीर :पुनर्विचार का समय" में इस बात को माना है कि "बंगला तथा हिंदी लेखकों के अध्ययन ईसाई मिशनरियों के कबीर विषयक कार्य के गहरे दबाव में हुए थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कबीर पर वेस्टकाट ने पूरी और स्वतन्त्र पुस्तक लिखी थी, जब कि हिंदी के विद्वानों ने अपनी पुस्तकों की भूमिकाओं के रूप में ही आलोचनात्मक लिखा था। तीसरी विशेषता यह कि वेस्टकाट ने शुरुआती दौर में ही कबीर के साथ-साथ कबीर के पंथ की खोज करने में रुचि दिखाई थी, जब कि हिंदी के लगभग सारे विद्वान कबीर के हिन्दुकरण की प्रक्रिया में कबीर को अकेला करते गए हैं, जिस का चरमोत्कर्ष डॉ. रमेश चंद मिश्र द्वारा 1999 में लिखी पुस्तक "कबीर अकेला" में दिखता है। अपनी सीमित जानकारी के बावजूद विदेशी विद्वानों ने मूल कबीर तक पहुँचने की कोशिश की है, लेकिन हिन्दू विद्वानों ने कबीर के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया को ही मज़बूत किया है और इस प्रक्रिया की ऐतिहासिक आधार पर जाँच परख करने के बजाय उसे ऐतिहासिक प्रमाणिकता प्रदान करने की असफल कोशिश की है। कबीर का निर्गुण राम अवतार ग्रहण नहीं करता जब कि वैष्णवों का निर्गुण राम अवतार ग्रहण करता है। वेदांत और वैष्णव दर्शन में निर्गुण सगुण का विस्तार और सगुण निर्गुण का अवतार है, लेकिन कबीर के यहाँ ऐसी कोई बात नहीं है। कबीर का निर्गुण, सगुण को जानता तक नहीं जब कि वैष्णवों के निर्गुण राम का काम बिना सगुण बने नहीं चलता।

कबीर का निर्गुण किसी एक "दशरथ सुत राम" में या दूसरे "यशोदा नन्दन कृष्ण" में अवतार नहीं लेता बल्कि संसार के कण कण में विद्यमान है। तब वह हर मनुष्य में पूरा हुआ और मौजूद है। उसे किसी एक अवतार या चौबीस अवतारों तक सीमित नहीं किया जा सकता। कबीर ने कहा भी है "दस अवतार निरंजन कहिए, सो अपना न कोई।" इस तरह कबीर का निर्गुण सगुण नहीं है बल्कि हर चीज़ में पुर कर और विलीन हो कर भी हमेशा निर्गुण है।

जब कबीर के राम "दशरथ सुत राम" नहीं हैं तो कबीर का निर्गुण भी वेदांत का निर्गुण नहीं है। कबीर का निर्गुण वेदांत से इसलिए मेल नहीं खाता क्योंकि कबीर परमार्थिक सत्ता और व्यावहारिक सत्ता के भेद को नहीं मानते। उन का निर्गुण वेदांत का अनिर्वचनीय नहीं है। वह अभेद है तो पूरा अभेद है और वह अद्वैत है तो पूरा अद्वैत है। उस के अनुसार, ब्राह्मण और चांडाल में वर्णव्यवस्था के आधार पर कोई सामाजिक भेद नहीं है। वहाँ मनुष्य की संभावनाओं में कोई अधिकारी - भेद भी नहीं। इस के विपरीत वैष्णवों का सगुण वर्णव्यवस्था को रचने और उस के आधार पर अधिकारी - भेद को स्थापित करने वाला है। कबीर का निर्गुण हर तरह के मानवीय विभाजन के ख़िलाफ़ मानवीय या मानव मात्र की एकता का विधायक हो जाता है।

कबीर दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में हिंदुओं से बहुत दूर के दार्शनिक हैं। उन का निर्गुण, सगुण के विरोध में ही खड़ा हुआ था, क्योंकि उसे ब्राह्मण की वर्णव्यवस्था से इतर मानव मात्र की समानता के सामाजिक आदर्श को हासिल करना है। इस तरह ब्राह्मण का निर्गुण और सगुण मिल कर भी वर्णव्यवस्था के भेद को नहीं मिटा पाते हैं जब कबीर का निर्गुण मानव मात्र की समानता का विराट दर्शन (मानवता का सार्वभौम दर्शन) बन जाता है। मध्यकाल के जातिवादी समाज की संरचना में कबीर के "निर्गुण" दर्शन की बड़ी क्रांतिकारी और ऐतिहासिक महत्व की भूमिका है। दलित और द्विज समेत किसी भी धर्म या दर्शन को आज तक यह पता नहीं चला है कि सृष्टि का निर्माण या विकास किस प्रकार हुआ है। इस्लाम का दर्शन इसे ग़ैब कहता है, शंकर का अद्वैत इसे अनिर्वचनीय कहता है तो बुद्ध इस पर मौन हो कर बैठ जाते हैं। लेकिन कबीर इस बारे में क्या कहते हैं..? वह दार्शनिकों और तत्ववादियों की दुनिया में बेहद ईमानदारी का परिचय देते हैं कि "मैं का जानौं राम को, नैनां कबहुँ न दीठ।" लेकिन कबीर को द्विजों के उस मोर्चे पर भी सांसारिक लड़ाई भी लड़नी पड़ती है, जहाँ द्विज दर्शन ने घोषित कर रखा है कि उस ने सृष्टि के परम तत्व को सगुण राम और सगुण कृष्ण के रूप में पा लिया है। उसी सन्दर्भ में कबीर निर्गुण की बात सामने लाते हैं। लेकिन जब द्विज दर्शन निर्गुण को समेटते हुए निर्गुण पर धावा बोलता है तब कबीर सगुण और निर्गुण दोनों से परे चले जाते हैं....."निरगुन सरगुन मन की छाया, बड़े सयाने भटके।" कबीर ने ईश्वर के बाँट की इस सारी पहेली को ही ध्वस्त कर दिया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने "इतिहास" में निर्गुण पंथ के अंतर्गत कोई दार्शनिक व्यवस्था नहीं पाते। उन के मुताबिक निर्गुण पंथ में जो थोड़ा~-बहुत ज्ञान पक्ष है, वह वेदांत, वैष्णव, बौद्ध और सूफ़ियों से लिया गया है। फलतः शुक्ल जी निर्गुण पंथ में ज्ञान या दर्शन की कोई व्यवस्था या मौलिकता नहीं देख पाते। यही कारण है कि कबीर आदि निर्गुणियों में वह विदेशी प्रभाव देखते हैं। इसी विदेशी प्रभाव के कारण शुक्ल जी भक्ति को "भारतीय" और "अभारतीय" दो हिस्सों में बाँट कर देखने लगते हैं। उन की दृष्टि में सगुण भक्ति भारतीय है तो निर्गुण अभारतीय (विजातीय) है। लेकिन कबीर की चुनौती यहीं समाप्त नहीं हुई। कबीर को सगुण और निर्गुण की पहेली को सुलझाने के बाद अब धर्म और अध्यात्म की बाँट की एक नई पहेली का भी सामना करना पड़ रहा है। कहा यह जा रहा है कि "कबीर का तौहीद (एकेश्वरवाद) हर धर्म, हर मज़हब की सीमाओं से बाहर था।" (इतिहासकार हरबंस मुखिया, कबीर और तौहीद की पुनर्व्याख्या, तद्भव) ‘पुरुषोत्तम अग्रवाल’ ने कबीर को धर्म से जोड़ने के बजाय "धर्मेतर अध्यात्म" से जोड़ते हैं। इस तरह कबीर का दार्शनिक परमार्थिक सत्य और व्यावहारिक सत्य, सगुण राम और निर्गुण राम को सुलझाते हुए अब धर्म और धर्मेतर की पहेली के दौर में पहुँचे हैं। धर्म पाखण्ड है तो धर्मेतर अध्यात्म सच्ची चेतना। कबीर का दर्शन इस द्वैत को भी स्वीकार नहीं करता। कबीर के यहाँ पाखंड के लिए कोई जगह नहीं, इसलिए वह धर्म और अध्यात्म को अद्वैत रूप में स्वीकार करता है।

इस तरह कबीर का एकेश्वरवाद हिन्दू और इस्लाम से सर्वथा पृथक एक लेकिन कबीर की चुनौती यहीं ख़त्म नहीं हुई। जब कबीर ने निर्गुण चिंतन की खोज की तब ब्राह्मण चिंतन ने निर्गुण और सगुण दोनों की खोज कर डाली। वह बहस के लिए परमार्थिक स्तर पर निर्गुण की बात करता है तो व्यावहारिक स्तर पर केवल सगुण की बात करता है। सूरदास ने निर्गुण को ले कर सीधे पूछा..."निर्गुण कौन देश को बासी?" वहीं कबीर का निर्गुण केवल निर्गुण रहता है, उस में सगुण की मिलावट नहीं होती। इस के उलट, ब्राह्मण चिंतन के निर्गुण में सगुण की आधी मिलावट होती है। वैष्णव तुलसी का राम कभी सगुण होता है तो कभी निर्गुण बन जाता है। लेकिन कबीर का राम कभी सगुण का रूप अख़्तयार (ग्रहण) नहीं करता। ब्राह्मण चिंतन सुविधानुसार सगुण और निर्गुण दोनों को मानता है लेकिन कबीर के लिए तुलसी के सगुण भगवान "दशरथ सुत राम" कबीर के लिए एक आदमी भर है, भगवान नहीं। स्वतन्त्र धार्मिक -आध्यात्मिक चिंतन है। 

सुभाष चन्द्र 
शोध छात्र हिंदी विभाग 
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद 
संपर्क : 6392798774, 9532188761

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