काश (राजीव डोगरा ’विमल’)

15-11-2020

काश (राजीव डोगरा ’विमल’)

राजीव डोगरा ’विमल’

काश! मेरी ज़ुबान की
कड़वाहट के पीछे
तुम मेरे हृदय की मिठास को
समझ पाते ।
 
काश! मेरे मुस्काते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे हृदय में दहकती
पीड़ा को समझ पाते।
 
काश ! मेरे बहते हुए
अश्कों के पीछे
तुम मेरे हृदय में बसी
मेरी कोमल भावनाओं को
समझ पाते।
 
काश! मेरे खिलखिलाते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे अंतर्मन की
चीख़ती चिल्लाहट को
समझ पाते।
 

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