काला बुरका

डॉ. मो. इसरार

सलमा बहन, हाय अफ़सोस! मुवा क्या ज़माना आ गया? कुछ समझ ही नहीं आ रहा। बेशर्मी और बेहयाई की तो इन्तिहा हो गई। अगर आज हम अपने लड़कपन वाले, गुज़रे ज़माने से मिलान करें तो आजकल सब झूठ सा ही दिखाई देता है। हमारे ज़माने में बड़ों की कितनी इज़्ज़त होती थी। उनका कितना अहतराम करते थे, हम। उनके सामने आते ही चुप्पी साध जाते थे। बड़ों के सामने मझाल थी कि चूँ भी कर दें। अपने अब्बू को खाना देने जाते तो सहमे-सहमे से, कहीं घुड़क न दें। उन्हें देखते ही सर पर दुपट्टा रख लेते थे, हाँ। और अब, ...अब तो बेशर्मी की हद हो गई। बड़ों को देखकर उनका एहतराम करना तो दूर, सलाम तक नहीं करते आजकल के बच्चे-बच्चियाँ...।

कुछ इस तरह के शब्दों से बाज़ार से घूमकर लौट रही सईदा ने सलमा के घर पहुँच कर अपने दिल की भड़ास-सी निकालनी आरम्भ की। वह वाक्यों को कभी अधूरा छोड़ देती और कभी बीच में से ही आरम्भ कर देती। बात करने का लहज़ा बिलकुल तल्ख़ और बदला हुआ। कभी झल्लाकर अनाप-शनाप बकने लगती। तो कभी नौजवानों पर लाँछन लगाने लगती। जिसे देखकर यही अनुमान होता, ‘ज़रूर दो-चार दुकानदारों के साथ लड़-झगड़कर आई है।’

सुबह नाश्ते के समय गन्दे हुए बर्तनों को साफ़ करते हुए, नल और टंकी की चौकी पर बैठी सलमा, सईदा की बातों को अनसुना सा करती हुई, हूँ-हाँ करके हंगूरे देती रहती है। वह जानती है, सईदा ने आज ज़रूर कोई छोटा-मोटा क़िस्सा देख लिया होगा जिसे लम्बा-चौड़ा अफ़साना बनाकर पेश कर रही है। इसे तब तक चैन न मिलेगा जब तक अपने दिल की पूरी भड़ास किसी के सामने न निकाल देगी। किसी छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ा कर बताना इसकी आदत है। 

इस समय घर में सईदा और सलमा के सिवा कोई नहीं। सईदा, सलमा की मौसेरी बहन होने के कारण उसके घर वक़्त बे वक़्त आ ही जाया करती है। दोनों मुज़फ्फरनगर शहर में बिहाई हुई हैं। जिनकी ससुरालों में अधिक फ़ासला भी नहीं है। सलमा की छोटी बेटी अभी-अभी कॉलेज के लिए निकली है। बड़ा बेटा छ: महीने से सऊदी अरब में नौकरी कर रहा है। उसके शौहर नगरपालिका के ‘वाटर टेक्स विभाग’ में क्लर्क हैं, जो ऑफ़िस जा चुके हैं।
...सईदा पहले से ही शुरू है। अपना वाक्य फिर से पकड़ती है... “ये लड़कियाँ तो कुछ ज़्यादा ही बेहया हो गई हैं। बड़ों का अदब-क़ायदा जानती ही नहीं। सर पर दुपट्टा तक रखना छोड़ दिया, इन बेग़ैरतों ने। परदा करना बिलकुल भूल गई। नाज़-नखरे इतने, बस ख़ुदा ही रहम करे। फ़ैशन इतना कि कार्टून बनी फिरती हैं। अब बताओ बाज़ार में इन्हें लड़के ना छेड़ें तो क्या? रही-सही कसर इस टीवी, मोबाइल ने पूरी कर दी। मुवा ज़माना ही बिगाड़ के रख दिया इन्होने तो। रोज़ अजीब क़िस्से सुनने को मिलते हैं, हाँ...। लो, मैं तो अपनी ही गाए जा रही हूँ। अरे, तुम भी तो कुछ बोलो, बहन।”

“ऐसा क्या देख लिया तुमने आज, जो सुबह से ही इतना जलने-भुनने लगी। किसी से लड़ाई-झगड़ा तो नहीं हो गया?”

इस कथन ने सईदा के लिए जैसे आग में घी का काम किया। और वह लाल-पीली होकर फिर झल्लाने लगी… “इस, इस मुवे फ़ैशन ने तो सब कुछ बिगाड़कर रख दिया। अल्लाह रहम करे बस। वारी, मैं तो भूल ही गई, एक ज़रूरी काम से आई थी, इधर। बाज़ार से पाखाने के लिए बधना (प्लास्टिक का लौटा) ख़रीदने आई थी, सोचा इधर भी मिलती चलूँ। यहाँ बैठ गई हाय-तौबा करने। अभी-अभी जब मैं बाज़ार में इधर-उधर बधने ढूँढ़ती फिर रही थी, तो वह तुम्हारी लाड़ली... अरे वही ‘उज़मा’ किसी लड़के से हँस-हँस कर बातें करती जा रही थी। कभी-कभी तो ख़ूब सट जाती थी, उससे। बहन, शहर की गलियों में किसी गैर से इस तरह बातें करते, राह में चलना ठीक नहीं लगता। मुज़फ्फरनगर की फ़िज़ा तो वैसे ही बहुत ख़राब है। कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो बस फिर मत कहना, हाँ। मुवा, घर का कौन सा ऐसा बन्दा है, जिसे मैं नहीं जानती। पर वो छोरा कुछ अन्जाना सा था। लड़की का मामला न होता तो मैं चुप रह जाती…।” 

सलमा एक बार फिर सोचती है, दूसरे के चरित्र पर लाँछन लगाना सईदा की नियति है। बात से बात, कुरेद-कुरेद कर निकालती है। लगातार बक-बक करते रहना उसका स्वभाव है। इसलिए वह उसकी बातों पर गहराई से विचार किए बिन हँसी-मज़ाक में टालना चाहती है।

“गली-मुहल्ले का ऐसा कौन सा लड़का है, जो तुम्हारी नज़र से बचा हो? फिर तुम कैसे नहीं जानती उस छोरे को?”

“बस मुवा पहचान ही नहीं पड़ा। नज़र भी तो कुछ कमज़ोर हो गई। कितनी बार कहा नवेद के अब्बू को, ‘मुझे चश्मा बनवा दें।’ लेकिन उन्हें अपने कामों से फ़ुर्सत मिले तब ना। देखो बहन तुम मेरी मौसेरी बहन न होती तो कोई बात न थी। पर मामला लड़की का है। लड़की सयानी है; दूसरे के घर जानी है। कहीं कुछ ऊक-चूक हो गई तो बस। फिर हमारी उज़मा सोलहवें में लग रही है। नवेद से दो साल ही तो छोटी है। ये उम्र वैसे ही बहुत नाज़ुक होती है। इसलिए आगाह कर रही हूँ।”
 
सलमा ने इसी बीच बर्तनों को धो-माँझकर पलड़े में रखा और उठाकर किचन की ओर चली। और सईदा को थोड़ी सांत्वना देते हुए कहने लगी, “ठीक है मैं आज उसकी ख़बर लूँगी, टाईंट करूँगी उसे।”
 
“अच्छा तो मैं चलती हूँ। मुझे भी कपड़े-लत्ते धोने हैं।”

“अरे, बैठो भी, जब तुम आई हो तो, एक कप चाय पीकर तो जाना। घर में इस वक़्त है ही कौन, सिवाए तुम्हारे और मेरे? आधा कप मैं भी पी लूँगी।”
 
सलमा किचन में चाय बनाती हुई फिर ख़्याल करती है, “ये सईदा पागल है, बड़बोली और बतोरी है। दूसरे की चुगली करने और सुनने में इसे शहद का सा मज़ा आता है। इसके सामने दूसरों की चुगली करने बैठ जाओ सारा दिन वहीं काट देगी। छोटी सी बात को अफ़लातून बना देती है। शहर के किसी भी मुहल्ले में कितनी भी छोटी घटना घट जाए, ये उसी की टोह लगा लेती है।” 

सईदा ने चाय बनाती हुई सलमा की ओर देखकर एक बार फिर मिमयाना शुरू किया। “देखो बहन, उज़मा अब बड़ी हो गई है, तुम उसे बुरका सिलवा दो। बुरका पहनकर कॉलेज जाया करेगी तो कोई पहचान भी न पाएगा- कौन है? किसकी बेटी है? कुँवारी है या शादीशुदा। फिर इस्लाम में परदा औरत के लिए फ़र्ज़ है, और अहम भी।”
 
“उज़मा तो अभी बच्ची है। इसी साल तो उसने ग्यारहवीं पास की है। फिर कॉलेज है ही कितनी दूर... चार फर्लांग। घर से मुश्किल से पाँच मिनट लगते हैं, कॉलेज जाने में। अगर ऐसा है तो उसके अब्बू छोड़ आया करेंगे,” सलमा के कथन में सईदा ने अपने वाक्य जोड़े।

“फिर भी बहन, लड़की का मामला है, एहतियात ज़रूरी है।”...

सईदा के घर से निकल जाने पर, सलमा ने एक क्षण के लिए फिर सोचा, “हो सकता है सईदा अपनी ज़गह दुरुस्त हो। किसी के माथे पर थोड़े ही लिखा होता है- वो शरीफ़ है या बदमाश। लड़की सयानी तो हो ही चुकी है, मन मचलते देर थोड़े ही लगती है।”

कई तरह के सवाल सलमा के मन में उठे। फिर तीन दिन के मैले-कुचैले, इकट्ठा हुए कपड़ों को नल की चौकी पर डालकर धोना आरम्भ कर दिया। कपड़ों पर साबुन मलते, ब्रश रगड़ते बीच-बीच में वह रुक-रुक कर उज़मा के विषय में सोचती भी रही। उज़मा तो अभी नादान है, उम्र ही क्या है- पन्द्रह-सोलह साल। उसे पढ़ाई से फ़ुर्सत ही कहाँ जो किसी से इधर-उधर की बातें करे? और अगर बात कर भी ली तो कौन सा पहाड़ टूट गया? कॉलेज में तो और भी लड़के-लड़कियाँ पढ़ते हैं। कोई मिल गया होगा, कॉलेज जाते समय। कॉलेज से लौटने पर तो वह कमरे में घुसी अकेली ही पढ़ती रहती है। कोई सहेली घर आ भी जाती है, तो उससे भी वह ज़्यादा बातें नहीं करती। अकेली अपनी किताबों में खोई रहती है। उसने आर्ट साईड ली है तो क्या हुआ? विषय तो बहुत भारी ले रखे हैं। 
उज़मा की साफ़गोई के विषय में अनेक वाक्य सलमा के हृदय से निकले। क्योंकि माँ जो ठहरी। धोने वाले कपड़ों को देखकर माँ की ममता बार-बार उमड़ती रही। फिर भी एक सन्देह उसके मन में बना रह गया। 

इसलिए कॉलेज से लौटते ही, उज़मा के लिए सलमा का पहला सवाल यही था, “आज तुम रास्ते में किससे बातें करती जा रही थी, कौन था वो लड़का?”
 
“अम्मी ... वो ... मैं सलीम से पढ़ाई के सिलसिले में बात कर रही थी। तबीयत नासाज़ होने की वज़ह से कल मैं कॉलेज जो न गई थी। अपना छूटा हुआ काम पूरा करने के लिए उससे कॉपी देने की गुज़ारिश कर रही थी। ज़बरन रज़ामन्द हुआ। वो क्लास का सबसे होशियार लड़का है। हर क्लास में अव्वल आता है। कल दो पोयम के सेंट्रल आइडियाज़ लिखाए गए थे, ये देखो उसने अपनी कॉपी दे दी।”
 
“अच्छा ठीक है, जाओ।”
 
एक मीठा लालीपॉप उज़मा ने अपनी अम्मी को दिया और कमरे में जाकर राहत की साँस ली। उज़मा समझ चुकी थी, “सईदा खाला कॉलेज जाते समय रास्ते में मिली थी, उसी ने मुझे सलीम के साथ देखा था। ये सब उसी की करतूत है। कान भर दिए होंगे अम्मी के। पक्की चुगलदूती है। बात का बतंगड़ बनाकर रख दिया होगा। एक की चार लगाई होंगी।”
 
उज़मा और सलीम सहपाठी होने के साथ ही पड़ोसी भी थे। किसी न किसी बहाने मुलाक़ातें हो ही जाया करतीं थीं। परेशानी तब अधिक होती, जब कॉलेज की छुट्टियाँ पड़तीं। एक दिन की छुट्टी काटनी मुश्किल हो जाती घर पर। देखम-देख में नज़रें नज़रों से क्या मिलीं थीं कि दोनों का टाँका भिड़ गया। कक्षा ग्यारह से उनकी मुलाक़ातों का जो सिलसिला चला, अब कक्षा बारह तक परवान चढ़ गया था। जब कभी गुपचुप मिलन का मौक़ा मिलता उसका पूरा लाभ उठाते। बात सीधी यही थी कि एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे। एक-दूसरे पर जान देने वाला, मर मिटने वाला प्यार कर बैठे थे। इसलिए कॉलेज में उनकी जोड़ी लैला-मजनू के नाम से मशहूर हो गई थी। कुछ लड़के-लड़कियाँ उनसे चिढ़ते थे तो कुछ उनके क़रीबी दोस्त भी बन गए थे। जिनकी उन्होंने सेटिंग कराई थी, वे उनके अच्छे दोस्त थे। और जिनका सिक्का नहीं जम पाया था वे उनसे चिढ़ते थे।

समय ठीक से व्यतीत होता गया तो बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाएँ समीप आ गईं, जिनमें कड़ी मेहनत की आवश्यकता थी। उज़मा और सलीम परीक्षा की तैयारी में जुटे थे, इसलिए उनका मिलना नहीं हो पाता था। क्योंकि कॉलेज की ओर से बीस दिन की छुट्टी एग्ज़ाम तैयारी के लिए दी गई थी। अब सभी हाई स्कूल और इंटर के शिक्षार्थियों को घर रहकर ही तैयारी करनी थी। कॉलेज में अन्य कक्षाओं की गृह परीक्षाएँ ली जा रहीं थीं। 

जब दस दिन तक उज़मा और सलीम एक-दूसरे से न मिल पाए तो बेचैन हो उठे। इसलिए मिलने या बात करने का कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही था। अत: एक रात उज़मा का गुप्त सन्देश पाकर सलीम उससे मिलने छत पर जा पहुँचा। रात अधिक न हुई थी। इसलिए किसी महिला पड़ोसन ने स्थिति को भाँप लिया, “ये गफूर का छोरा इत्ती रात को सलमा की छत पर क्या कर रहा है?” कुछ देर छुप कर देखा तो मामला पूर्णत: समझ में आ गया। “ओ, ये बात है। सलमा की छोरी के साथ लगा हुआ है।”
 
मौक़ा पाकर वह सुबह के समय उज़मा के घर आई और ख़ूब बढ़ा-चढ़ा कर, नमक-मिर्च लगाकर पूरा वाक़या सलमा को कह सुनाया। उसके उतावलेपन और कथा कहने के अंदाज़ से लग रहा था, पूरी रात सोई नहीं। 

सलमा को यह सब सुनते ही धक्का सा लगा। सईदा की बातें तुरन्त याद हो आईं। सलमा के दिल से हाय! निकली। अगर उज़मा के अब्बू को पता चल गया तो, घर में क़यामत आ जाएगी। उनके तो सारे अरमान ही मर जाएँगे। कितने अरमानों से पढ़ा-लिखा रहे हैं। घर का एक काम तक नहीं करने देते। बेटी को टीचर बनाने का सपना कब से सँजोए हुए हैं। कहते हैं, ‘टीचर की नौकरी शाही नौकरी है, नो टेंशन, नो झंझट वाली।’       
       
‘इश्क़ और मुश्क छिपाए नहीं छिपते’, कितने भी गुप्त स्थान पर मुश्क लगाओ सुगन्ध दूर तक फैलती ही है। इश्क़ में कितने भी फूँक-फूँक कर क़दम रखो आहट दूर तक जाती है। प्रेमी-प्रेमिका पर इश्क़ का ऐसा ख़ुमार चढ़ता है कि उसके होने का एहसास दूसरों को करा ही देते हैं। संयोग से उसी समय उज़मा की करतूतों के दो-चार क़िस्से उसके अब्बू को भी ज्ञात हो गए। उन्होंने सलमा के सामने ज़िक्र किया तो उसने बात को गोलमोल करने की बहुत कोशिश की, लेकिन अन्त में उसे स्वीकारना पड़ा, “हाँ ऐसा कुछ है।”

माँ को लड़की के चरित्र के विषय में बाप की अपेक्षा अधिक जानकारी रहती है, अत: वे सलमा पर बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने उज़मा की पढ़ाई छुड़ाकर घर बैठाने का निश्चय कर लिया। आख़िर लड़की का मामला था। बिरादरी में इज़्ज़त बचाकर रखनी थी। डर था कि किसी अच्छे घर में रिश्ता भी नहीं हो पायेगा।

जब्बार (उज़मा के अब्बू) के इस प्रकार के निर्णय से सलमा को बहुत दुःख हुआ। लेकिन दो-तीन दिन बाद मामला कुछ शान्त हो जाने के पश्चात उसने उन्हें समझाया, ‘देखो जी, बेटी का सेल्फ़ सेंटर है, कहीं दूर तो पेपर देने जाना नहीं, उज़मा को। केवल पन्द्रह दिन की ही तो बात है। आप उसे स्कूल छोड़ने और लेने साथ चले जाया कीजिए। उसके पेपर का समय आपके ऑफ़िस टाइम से बिलकुल अलग है। कम से कम बेटी इंटर तो पास हो जाएगी। आगे की फिर सोचेंगे।’


सलमा ने आग्रह और विनतियों से तीन-चार बार जब्बार को मीठी घूँटी पिलाई तो वे उज़मा के बोर्ड परीक्षा में एप्पियर होने के लिए मान गए। 

तुरत-फुरत में उज़मा को एक बुरका सिलाकर दिया गया। लेकिन बुरका काला न होकर ज़रदई रंग का था। क्योंकि उस समय इसी प्रकार के बुरके का फ़ैशन चल रहा था। अब बिन बुरके के उज़मा के घर से निकलने पर प्रतिबन्ध था। परीक्षा के बीच उज़मा की प्रत्येक गतिविधि पर ध्यान रखा गया। उसके अब्बू उसे अपने साथ कॉलेज ले जाते और लाते रहे।

परीक्षाएँ समाप्त होते ही उज़मा को चुपके से उसके मामू के यहाँ देवबंद भेज दिया गया। सलमा अच्छी तरह जानती थी, देवबंद में एक मुस्लिम डिग्री कॉलेज है। जिसमे माहौल एकदम मुस्लिम है। मुस्लिम लड़कियाँ ही अधिकांश मात्रा में उसमे पढ़ती हैं। डिग्री कॉलेज होने पर भी लड़के-लड़कियों के लिए ड्रेस अनिवार्य है। यहाँ के नियम, क़ायदे-क़ानून सख़्त हैं। कॉलेज के बाहर लड़कियाँ चाहे जितना भी फ़ैशन करें लेकिन कॉलेज में क़ायदे से आती हैं। बुरका सबके लिए अनिवार्य न होने पर भी अधिकांश मुस्लिम लड़कियाँ बुरका पहन कर आती हैं। कुछ ही लड़कियाँ होंगी जो ग़ैर मुस्लिम लड़कियों की तरह बुरका न पहनकर आती हों। इसे चाहे सोहबत का असर कहें या उनके घरों का माहौल। ...सईदा ठीक कहती थी नए ज़माने का रंग बच्चों पर चढ़ रहा है। उनका ध्यान रखना लाज़िमी है, ज़रूरी है। 

अगर उज़मा पास हो गई तो उसी कॉलेज में उसका दाख़िला कराऊँगी। घर से दूर रहेगी तो मामला दबा रहेगा। लोग देखकर ही अधिक बातें बनाते हैं। कुत्ता देखेगा ही नहीं, तो भौंकेगा किसे। उज़मा के अब्बू से आग्रह करूँगी, हाथ जोड़कर विनती करूँगी। उन्हें किसी भी प्रकार मनाऊँगी। लेकिन उज़मा को ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई कराकर रहूँगी। फिर बेटी को टीचर बनाने का उनका भी तो सपना है। 

इंटर का रिज़ल्ट निकला तो उज़मा पास हो गई, नंबर भी ठीक-ठाक ही आए। प्लान के मुताबिक़ उज़मा का प्रवेश मुस्लिम डिग्री कॉलेज में करा दिया गया। कॉलेज सेल्फ़-फ़ाइनेंस था इसलिए प्रवेश में किसी प्रकार की बाधा नहीं आयी। और समयानुसार वह कॉलेज जाने लगी।

दूसरी ओर परीक्षा में नक़ल पकड़ी जाने के कारण सलीम फ़ेल हो गया। उस पर तीन वर्ष तक बोर्ड परीक्षा में न बैठने का प्रतिबन्ध लगा। इसलिए उसने पढ़ाई छोड़कर खल व चोकर सप्लाई का काम आरम्भ कर दिया। 

पहले प्यार को भुला पाना थोड़ा मुश्किल होता है। जब तक कोई नया पंछी जीवन में न आए तब तक पहले प्यार की यादें कचोटती ही रहती हैं। सलीम और उज़मा के दिलों में प्यार की चिंगारी अभी बुझी नहीं थी। सलीम ने बड़ी सफ़ाई से उज़मा का पता लगा लिया और वह अवसर निकाल कर कॉलेज आने लगा। वह व्यापार के सिलसिले में मुज़फ्फरनगर से देवबंद तो आया ही करता था, इसलिए उज़मा से मिलने कॉलेज भी पहुँच जाता था। कॉलेज स्टूडेंट्स में स्वयं को सम्मिलित करने के कारण ही उसने कॉलेज ड्रेस भी सिलवाई। कॉलेज में कई गुंडानुमा लड़कों को अपना दोस्त भी बनाया। वह कॉलेज के माहौल से पूर्णत: वाकिफ़ हो गया। उज़मा से मिलने के लिए सलीम ने बहुत सी क्लासें भी अटेंड की। दो बार ऐसा भी हुआ जब उज़मा को कॉलेज टाइम में सलीम ने रेस्तरां में पार्टी दी और उज़मा कॉलेज पहुँची ही नहीं। मामू के घर यही भ्रम बना रहा, ‘उज़मा कॉलेज गई हुई है।’ कॉलेज के अन्दर तो उनकी अक्सर मुलाक़ातें होती ही रहती थी, इसके अतिरिक्त कॉलेज कैन्टीन में, खाली क्लास रूमों व कॉलेज की सूनी छत पर भी दोनों अपना समय व्यतीत किया करते थे। 

कॉलेज प्रशासन को इस मामले की गहरी जानकारी हुई तो उसने सख़्त क़दम उठाए। अपने रवैयों में सुधार किया। अपनी ख़ामियों को तलाशा। प्रत्येक विद्यार्थी का बिन परिचय-पत्र के कॉलेज में प्रवेश निषेध किया गया। सबके लिए ड्रेस तो निर्धारित थी ही, ‘विदाउट ड्रेस’ वालों पर प्रतिदिन पचास रूपये फ़ाइन किया गया। आउटर का विशेष ध्यान रखा गया। किसी भी शिक्षार्थी के गड़बड़ करने पर, बिन पूर्व सूचना के कॉलेज से रेस्टिकेट किए जाने का नियम बना। जिसकी सूचना मोटे अक्षरों में नोटिस बोर्ड पर चस्पा की गई। एक बार एन्टर होने पर, बिन परमिशन किसी भी शिक्षार्थी के बाहर जाने पर रोक लगा दी गई। इस कार्य के लिए मुख्य गेट पर दो गार्ड की नियुक्ति की गई। जिन स्टूडेंट्स की गतिविधियाँ ख़राब पाई गई उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही भी की गई। उज़मा के मामू के घर फ़ोन कर परिवार वालों को चेताया गया, क्योंकि ब्लैक लिस्ट में उज़मा का नाम भी था। कॉलेज में उज़मा के चाल-चलन पर विशेष ध्यान रखा गया, क्योंकि इसका सबसे विपरीत प्रभाव यह था कि दूसरे लड़के-लड़कियों में इस मामले का ग़लत मैंसेज पहुँचा था।

उज़मा के मामू के घर अब उज़मा चर्चा का विषय बन गई। लम्बी-लम्बी बहसें उसके विषय में हुई। उसके मामू ने कॉलेज पहुँचकर समस्त मामले की छानबीन की। उज़मा को तो मेहमान समझकर अधिक कुछ नहीं कहा गया, लेकिन घर के सदस्यों में बेइज़्ज़ती की आग सुलगने लगी। कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया तो समस्त इल्ज़ाम उन लोगों पर ही आएगा। परायी लड़की का मामला है, चुप भी नहीं बैठा जा सकता। गहरे सोच-विचार और तहक़ीक़ात के पश्चात उज़मा के मामू उसे वापस मुज़फ्फरनगर भेजना चाहते थे। पर नानी अम्मा ने समझाया, ‘उज़मा का बाप कूढ़ दिमाग है, कहेगा बेटी का ख़र्च न उठ पाया होगा, आफ़त और बोझ समझी होगी, तभी तो वापस भेज दिया। अत: घर के सभी सदस्यों ने आपसी विचार-विमर्श के पश्चात युक्ति निकाली, ‘अम्मा घर पर खाली रहती है, उज़मा के साथ कॉलेज जाया करेगी। थोड़ा मन भी बहल जाया करेगा और, घूमना भी हो जाया करेगा। उज़मा बिन बुरके (ज़रदई रंग का जो उसकी अम्मी ने सिलवाकर दिया था।) के कॉलेज नहीं जाया करेगी।’ उज़मा को सलीम से न मिलने की सख़्त हिदायत दी गई।

इसके बाद उज़मा अपनी नानी के साथ कॉलेज जाते हुए दिखाई दी जाने लगी। नानी ग्राउंड फ़्लोर पर बैठ जाती और उज़मा फर्स्ट फ़्लोर पर कक्षाएँ अटेंड करने चली जाती। कक्षाएँ समाप्त होने तक नानी कॉलेज के चपरासी मुस्ताक अहमद से बातें करती। मुस्ताक एक ख़ुशमिजाज़ और सबको अपने रंग में रँगने वाला इन्सान था। कॉलेज के अधिकांश लड़के-लड़कियाँ उसे सलाम करना अपना फ़र्ज़ समझते थे। कक्षाएँ समाप्त होने पर उज़मा और नानी घर लौट आते। 

कॉलेज में आउटर का प्रवेश निषेध था। इसलिए सलीम का उज़मा से मिलना बन्द हो गया। बुरका पहन कर आने वाली उज़मा को वह पहचान भी नहीं पाता था। वह अपनी नानी के साथ कभी पैदल तो कभी रिक्शे में आती थी। सलीम ने खोजी कुत्ते के समान बड़ी मेहनत और मशक़्क़त से उज़मा की जानकारी आरम्भ की। इसी कॉलेज में पढ़ने वाली अपनी दूर की ममेरी बहन शबाना के माध्यम से उसे उज़मा के विषय में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली। ‘उज़मा अपनी नानी के साथ ज़रदई रंग के बुरके में आती है। कॉलेज में उसका बुरका ही सबसे अलग है। पहचानने में मशक़्क़त न होगी, क्योंकि ज़्यादातर लड़कियों के बुरके काले हैं। ग्यारह बजे से उसकी कक्षाएँ होती हैं, वह साढ़े दस और ग्यारह बजे के बीच कॉलेज आती है। 

उज़मा से मिलने की चाह में सलीम कई दिनों तक कॉलेज के रास्ते पर खड़ा हुआ। एक दिन उसे ज़रदई रंग के बुरके में उज़मा दिखाई दी, जिसे उसने तुरन्त पहचान लिया। बुरका उसकी नागिन सी चाल को छिपाने में सक्षम नहीं हुआ था। लचकती कमर अब भी साफ़ दिखाई देती थी। नानी की उपस्थिति में दोनों ने एक-दूसरे को देखा, परन्तु अंजान बनकर। जिसका परिणाम पानी को मुट्ठी में पकड़ने के समान निकला। सलीम एक स्थान पर खड़ा-खड़ा और उज़मा घूम-घूमकर एक-दूसरे को तब तक ताकते रहे जब तक आँखों से ओझल न हो गए। प्यार के जल में गोते लगाकर आँखें तो प्यासी रह ही गईं, दिल भी लालटेन के समान भभक-भभक कर बुझता सा प्रतीत हुआ। दोनों की ‘बिन पानी मीन’ की सी हालत हो गई। मन मसौज कर रह गए।

मुहब्बत फड़फड़ाई तो उसने मिलने के ढेरों रास्ते सुझाए। सलीम ने पाँच पेज का एक लम्बा सा ख़त तैयार किया और अपनी ममेरी बहन शबाना के माध्यम से उज़मा तक पहुँचा दिया। ख़त में मिलने के तरीक़े, वक़्त, जगह आदि को बख़ूबी समझाया गया था।

एक दिन कॉलेज आते वक़्त उज़मा ने नानी को हिदायत दी, “नानी मुझे काले रंग का बुरका चाहिए, ये ज़रदई रंग का बिलकुल अच्छा नहीं। इस बुरके में मैं कव्वों के बीच लाल कबूतरी जैसी दिखाई देती हूँ। सब लड़कियाँ काले बुरके में आती हैं, ज़रदई का तो किसी के भी पास नहीं। सब मुझे ‘लाल कबूतरी’ कहकर चिढ़ाते हैं। या फिर ‘ज़रदा’ कहकर बुलाते हैं। मुझे बहुत गन्दा लगता है।” 

“अच्छा तो तुम कैसा बुरका चाहती हो,” नानी ने दोहती के मन की बात जाननी चाही। 

“बुरका ऐसा होना चाहिए, जिसमे सारा बदन छुप जाए। सर के लिए दुपट्टा अलग से होना चाहिए। सर के ऊपर से पीछे पड़े नक़ाब से मुँह तो ढक जाएगा, लेकिन मुझे क्लास में पढ़ने में बहुत दिक्क़त होगी। इसलिए बुरका ऐसा होना चाहिए जिसमे आँखें हमेशा खुली रहें।”

“जो आँखें परदे के लिए सबसे अहम हैं, वे ही खुली रहनी चाहिएँ। जिन आँखों में शर्म और हया बसती है वे ही खुली रहनी चाहिएँ। जिन आँखों से सब गड़बड़ होती है, वे ही .... । जो आँखे, आँखों से मिलते ही दिल में वासना का तूफ़ान और गन्दे ख़्याल पैदा कर देती हैं, वे ही ... ।” इस तरह के बहुत से ख़्याल तजुर्बेकार बुढ़िया के ज़हन में घूमे। फिर भी उसने पैतरा बदला। बच्ची को दिलासा दिया। “जब भी तुम्हारे मामू को तनखा मिल जाएगी, तुम्हे तभी नया बुरका सिला दूँगी।”
 
अनेक प्रकार की बन्दिशें हो जाने के कारण सलीम और उज़मा का मिलन तो नहीं हो पाता था। लेकिन शबाना, सलीम का प्रत्येक सन्देश ज़बानी या ख़तों के ज़रिए उज़मा तक पहुँचा देती थी। 

आज मंगलवार का वादा और ख़तों के ज़रिए मिला पूरा प्लान उज़मा को ‘तोता रटंत’ के समान याद था। ‘शुभम रेस्टोरेन्ट’ में सलीम के जन्मदिन की पार्टी थी। जहाँ उसने दो कमरे बुक किए थे। एक अपने दोस्तों के लिए और दूसरा अपने ख़ुद के लिए। ठीक ग्यारह बजे का समय निश्चित था। साढ़े दस के आस-पास उज़मा कॉलेज आयी, नानी को प्रतिदिन के समान ग्राउंड फ़्लोर पर बैठाया और फ़स्ट फ्लोर पर कक्षाएँ अटेंड करने चली गई। वहाँ उसने शबाना के ‘काले बुरके’ से अपने ज़रदई रंग के बुरके की अदला-बदली की और गेट के गार्ड से पेट-दर्द के लिए दवाई लाने का बहाना बनाकर, चुपके से कॉलेज से निकली। कॉलेज से निकलते समय उसे नानी भी नहीं पहचान पाई और कर्मचारियों की तो बात ही क्या? सलीम के साथ बाइक पर बैठकर ये जा... वो जा ...। 

दो घंटे हुस्न और इश्क़ का खेल खेलकर, जिस्म और जवानी का मज़ा लूटकर साथ ही कुँवारा हनीमून मनाकर वापस कॉलेज आई। अपने बुरके की वापस अदला-बदली की और नीचे ग्राउंड फ़्लोर पर आकर नानी को बोली, “नानी, आज मैंने सभी पीरियड अटेंड कर लिए हैं, चलो अब घर चलें।”

नानी ने उसकी ओर कुछ विस्मित होकर देखा, क्या सारे पीरियड हो गए?”
 
“जी नानी।”
 
कुछ भौचक्की सी होकर बुढ़िया फिर बोली, “बेटी तुम्हें नहीं लगता, आज हम कुछ लेट आए थे और अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ जल्दी जा रहे हैं? ज़माने की रफ़्तार के साथ ही पीरियड भी शायद तेज़ी से चलने लगे हैं।”
 
कई महीनों तक काले और ज़रदई बुरकों की अदला-बदली की आड़ में गुप्त खेल चलता रहा। काले बुरके के नाजायज़ इस्तेमाल का पता तब चला जब उज़मा तीन माह का गर्भधारण कर गई। यह सनसनीखेज ख़बर फैली तो कॉलेज प्रशासन हिल गया। एक लड़की के बिगड़ने से दो परिवारों और सुन्दर छवि वाले कॉलेज की साख पर बट्टा लग गया था। उसके बाद उज़मा का कॉलेज आना स्वयं ही बन्द हो गया। बहुत ही गुप्त स्थान पर उसका गर्भपात कराकर, एक बच्चे के बाप से उसकी शादी कर दी गई। क्योंकि उसकी पत्नी मर चुकी थी।

यह कह पाना तो मुश्किल है, ये उज़मा के लिए सज़ा थी या नया जीवन। लेकिन काले बुरके की आड़ में हुए उन सभी गुनाहों का परिणाम उस नन्ही सी जान को भुगतना पड़ा, जो अभी कामवासना या कामपीड़ा का अंजाम, सुख-दुःख, पाप-पुण्य, अच्छाई-बुराई सभी से अंजान था/थी। जिसने अभी आँखें भी नहीं खोली थीं, संसार के विभिन्न रंग-रूप नहीं देखे थे। जो नहीं जनता था/थी, गुनाह छिपकर किए जाते हैं या सामने रहकर। गुप्त या प्रत्यक्ष रूप में किए गए गुनाहों की सज़ा का प्रावधान एक सा होता है या अलग-अलग। जो तोतली ज़बान से किसी को धिक्कार भी नहीं सकता था/थी, “सालो, आख़िर मेरा गुनाह क्या है, जो मुझे जन्म से पहले ही मौत दी जा रही है?” 

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