तुम्हें याद है बचपन में कैसे तुम मुझे अपनी साइकिल पर बिठा कर, हमारे गाँव के आख़िरी छोर पर स्थित एक चाय की टपरी पर ले जाते थे।

मेरे हाथों में अपने हाथों की जकड़न और ज़्यादा करते हुए तुमने कहा था, जिस दिन मैं अच्छी चाय बनानी सीख गई। उस दिन तुम मेरे साथ, मेरे ही घर की छत, जो पूरे गाँव में सबसे ऊँची है। जहाँ शिमला जैसी ठंड महसूस होती है; वहाँ पर मेरे साथ चाय पियोगे। और शाबासी के तौर पर मेले में जो नए "झुमके" मैंने पसन्द किए थे,वो भी पक्का मुझे लाकर दोगे।

देखो ना, मैंने बहुत अच्छी चाय बनानी सीख लिया।

लेकिन तुम तो बादलों में लुकाछुपी करते चाँद निकले।

जो मौजूद होकर भी मेरे जीवन में अमावस करते रहे।

आज मेरे घर की छत, जहाँ शिमला जैसी ठंड गिरती है। 

वहाँ तुम्हारे इंतजार में गिरी ओस की बूँदे विलाप करते-करते जम कर बर्फ़ की शिला बन गई।

इंतज़ार इतना लंबा हो गया कि तुम्हारे इंतज़ार में मैंने एक सदी जितना लम्बा जीवन बीता दिया।

सुनो,अब तुम मत आना!!

क्योंकि मैंने चाय पीना छोड़ दिया है और रहा 'झुमकों' का सवाल? तो वो भी अब सिर्फ़ मेरी शृंगारदानी की शोभा बढ़ाते हैं।

ख़ैर तुम आ भी गए अगर इस जीवन में, तो उस जीवन का हिसाब बराबर नहीं कर पाओगे। जो मैंने तुम्हारे इंतज़ार में बीता दिया है।

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