जग रहा जुगनू – जगमगा रहे हाइकु

15-06-2019

जग रहा जुगनू – जगमगा रहे हाइकु

डॉ. पूर्वा शर्मा 

कृति : जग रहा जुगनू (हाइकु संग्रह)
लेखक : डॉ. कुँवर दिनेश सिंह
संस्करण : 2018
मूल्य : 200 /-
पृष्ठ : 84
प्रकाशक : साइबरविट.नेट, HIG 45 कौसम्बी कुंज, कालिंदीपुरम्, इलाहाबाद -211011 

प्रकृति के चितेरे कवि डॉ. कुँवर दिनेश सिंह का पाँचवाँ हाइकु संग्रह ‘जग रहा जुगनू’ उनके पूर्व प्रकाशित हाइकु संग्रहों की ही भाँति प्रकृति एवं भावानुभूति के मनोरम चित्रण का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत करता है। अठारह आकर्षक शीर्षकों को लेकर प्रस्तुत किए गए हाइकु संग्रह के अधिकांश भाग में प्रकृति से संबंधित हाइकु हैं। 

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण शिमला का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भूत है। शिमला के इस असीम सौन्दर्य का चित्रण दिनेश जी के हाइकु में दृष्टिगत होता है। शिमला और इसके आसपास के इलाक़ों में पाये जाने वाले अनेक पेड़-पौधे जैसे - बुराँश, सिडार, चीड़ आदि का सहजता से चित्रण हाइकु में हुआ है, यथा - 

कहीं बुराँश / वसंत वह्नि लिए / कहीं पलाश। पृ. 10 
करी तलाश / चीड़ों की कॉलोनी में / मिला बुराँश। पृ. 10

सिडार के वृक्ष को एक सख्त संतरी की अनोखी उपमा देते हुए दिनेश जी कहते हैं - 

सिडार खड़े / शिमला की सीमा पे / संतरी कड़े। पृ. 14 

पहाड़ी क्षेत्र के मौसम में एक अलग ही जादू होता है। अपनी भोगौलिक स्थिति के कारण यहाँ की हवा, बारिश, धूप आदि की बात ही अलग होती है, जो आपको मंत्र-मुग्ध कर देती है। कई स्थान पर तो ऐसा अनुभव होता है कि चंचल मेघ आपको स्पर्श करते हुए विचरण कर रहे हैं। जब मेघ संध्याकालीन सुहाने नभ में दिखाई देते हैं तो कवि हृदय प्रसन्न हो उठता है –   

साँझ सावनी / शिमला क्षितिज पे / बदली घनी। पृ. 15 

पहाड़ों को बेदर्दी से काट-काटकर मनुष्य अपनी आवाश्यकताओं को पूरी करने में जुटा हुआ है। यही कारण है कि आजकल इन क्षेत्रों में भी आबादी तेज़ी बढ़ रही है और यहाँ पर भी ट्रैफ़िक समस्या से जूझना पड़ रहा है –

ज़रूरी काम / ठहर जा शहर ! / ट्रैफिक जाम। पृ. 15

‘कल कल कल्लोल’ शीर्षक के अंतर्गत नदी के माध्यम से आज के युग की वास्तविकता का सफल चित्रण हुआ है। कहीं-कहीं पर व्यंग्य तो कहीं पर काव्य के माध्यम से भी कवि ने अपनी बात को पुष्ट किया है। 

कहती नदी / कलयुग की कथा / कल्मष लदी। पृ. 17 
नदी में बाढ़ / नेता अधिकारी की / मैत्री प्रगाढ़। पृ. 19 
हमने देखा / रहती काग़ज़ों में / ग़रीबी रेखा। पृ. 24

माना कि मानव का जीवन समस्याओं से घिरा हुआ है लेकिन आशावादी मनुष्य कभी भी हार नहीं मनाता है और उसका यही सकारात्मक दृष्टिकोण उसे जीवन जीने की प्रेरणा देता रहता है -

नया है साल / बदलेगा कुछ तो / मेरा भी हाल। पृ. 22 
भोर की भाषा / हर निशा के बाद / नई है आशा। पृ. 43 
पृथिवी माता / संतति हो कैसी भी / सबकी त्राता। पृ. 24 

‘शब्दों के तुमुल में’ शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत किये गए सभी हाइकु उत्कृष्ट है। शब्द हमारे मन पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं। शब्दों के अर्थ और भावार्थ को पहचानना बहुत आवश्यक है। कभी-कभी शब्द आपको आघात पहुँचाते हैं तो कभी शब्द आपको राहत भी प्रदान करते हैं। शब्दों की महत्ता को प्रस्तुत करते हुए सभी हाइकु बहुत ही अर्थपूर्ण एवं मनभावन बन पड़े हैं, यथा - 

अर्थ हैं गुप्त / शब्दों के तुमुल में / कविता लुप्त। पृ. 26 
शब्द भी थके / मन को मनाने में / जीत न सके। पृ. 27 
शब्दों की फाट / संबंधों के खेत में / मन उचाट। पृ. 27 

जैसा कि हम जानते हैं कि हाइकु अल्पतम शब्दों में क्षणिक भावों की पूर्ण अभिव्यक्ति है। शब्दों के सार्थक प्रयोग से एक सफल हाइकु की रचना होती है। उचित शब्दों का सही, सहज एवं सटीक प्रयोग दिनेश जी की हाइकु साधना (बारहमासा, जापान के चार हाइकु सिद्ध आदि ) में पहले भी हम देख चुके हैं। रचनात्मक सौन्दर्य के साथ भावार्थ का तालमेल करते हुए अनेक तत्सम-तद्भव-देशज आदि शब्दों (पौन, आकुलता, निकष, रूँधी, संदेसा, मरुत आदि) के साथ अंग्रेजी के शब्द का सहज प्रभावी प्रयोग देखिए - 

भोर की धुँध / हैंगओवर छाया / है अँधाधुँध। पृ. 30
पौ फटते ही / बंजारा गीत गाता / आया वो पक्षी। पृ. 30 
उषा काल में / खगों की आकुलता / डाल डाल पे। पृ. 30 
पौन उमड़े / पीपल के पत्ते हैं / व्याकुल बड़े। पृ. 31 
छाई उमस / हवा रूँधी रूँधी-सी / मेघा बरस! पृ. 32 

उपमा का एक और सुंदर प्रयोग -

मेघ निकष / देवव्रत-सा सूर्य / हुआ विवश। पृ. 32

प्रेम के बिना जीवन अपूर्ण है। प्रकृति के प्रति प्रेम हो या रागात्मक प्रेम दोनों की ही अनुभूति अद्भूत होती है।  प्रेम रस में डूबे कुछ हाइकु देखिए -

वासंती रुत / माधवी की गंध में / खोया मरुत। पृ. 34 
देख लूँ तुझे / अपने होने का भी / भान हो मुझे। पृ. 35
गहरा भेद / प्रणय का संवेद / वेदों का वेद। पृ. 36 

बरखा रानी के आने से मनुष्य मन के साथ सभी पेड़-पौधे एवं प्राणी भी हरे-भरे एवं प्रसन्न हो उठते हैं। बिजली की कौंध से उम्मीद जगती हैं और सावन के आने से सभी जल स्त्रोत संपन्न हो जाते हैं। सावन के आने से चहुँ ओर हरियाली छा जाती है लेकिन प्रकृति के कुछ रहस्य बने ही रहते हैं -  

आया सावन / रहस्यों में उलझा / बीहड़ वन। पृ. 39 
घास है घना / कानन कहे यहाँ / आना है मना। पृ. 40

काव्य में बिम्ब का स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण है। कई बिम्ब चित्ताकर्षक बन पड़े हैं। धुँध के सुंदर चित्रण के साथ एक मोहक बिम्ब देखिए -  

धुँध है छाई / सूरज की आँखों में / नमी सी आई। पृ. 40 

कहीं पर पौष में बारिश नहीं हो रही तो मन में बारिश की लालसा जग रही है और कहीं कार्तिक में बिन बदली के कारण ही पूर्णिमा का चाँद बहुत ही मनोहारी लग रहा है।  

निरभ्र नभ / कार्तिक की पूर्णिमा / चन्द्र सुप्रभ। पृ. 44 
मन तरसे / पौष निकल गया / बिन बरसे। पृ. 45

पुस्तक के शीर्षक ‘जग रहा जुगनू’ में प्रस्तुत जुगनू पर केन्द्रित हाइकु अच्छे हैं। झींगुर की आवाज़ में करुणा एवं आरती का स्वर दोनों ही वास्तविकता के साथ कल्पना के समन्वय को  अभिवक्त करने में सफल हुआ है। 

रोते झींगुर / धुँधलके में फँसे / करुण सुर।  पृ. 47 
वेला संध्या की / झींगुर मिलकर / करें आरती। पृ. 47
अँधेरा घिरे / व्याकुल-सा जुगनू / भटका फिरे। पृ. 48 
सोए हैं सब / जग रहा जुगनू / जगती शब। पृ. 48
रात है नम / जुगनू की गश्त में / सहमा तन। पृ. 49 

हवा के थपेड़ों से कँपाते हुए पीपल के पत्ते हो या झाड़ियों में छिपता हुआ तीतर या सूर्य एवं तारा आदि, इन सभी को लेकर एक से बढ़कर एक सुंदर हाइकु प्रस्तुत हुए हैं -  

पीपल पात / कँपकँपाते हुए / कहें क्या बात ? पृ. 52 
वन तीतर / आहट से जा छिपा / कुंज भीतर। पृ. 53 
सूर्य से मिला / वह तारा आखिरी / फिर न मिला। पृ. 58

जापानी हाइकु के चार हाइकु गुरुओं - बाशो, बुसोन, इस्सा और शिकी के हाइकु में जापानी ऋतुओं का वर्णन प्राप्त हुआ है। जापान के चार आधार स्तंभ कहे जाने वाले गुरुओं ने चेरी, प्लम आदि फलों को लेकर अनेक जापानी हाइकु ने रचे हैं। ‘छूना मत प्लमों को’ शीर्षक के अंतर्गत चेरी, प्लम, काफल को लेकर लिखे गए हाइकु इन जापानी गुरुओं का स्मरण कराती है। फलों की ऋतु का मनमोहक चित्रण करते निम्नलिखित हाइकु   देखिए -  

काफल लाल / मधुपों ने चल दी / व्यूह की चाल। पृ. 62 
खिली है चेरी / शुकसेना पहुँची / लगी न देरी। पृ. 63 
फूली चेरियाँ / बजी हैं भँवरों की / रणभेरियाँ। पृ. 63

पहाड़ी प्रदेश में सुंदर पहाड़ियों के बीच रहना बड़े ही सौभाग्य की बात है। हिमाचल प्रदेश की अनेक सुंदर पर्वत शृंखलाएँ सदा ही पर्यटकों के आकर्षण का कारण रही है। ऐसी ही एक मनमोहक पर्वत शृंखला धर्मशाला में है, जिसकी सुन्दरता से प्रभावित होकर कवि ने उसका वर्णन किया है। ऐसा लगता है कि ‘धर्मशाला’ में स्थित धौलाधार (धवल धार) पर्वत शृंखला को उसका अनुपम सौन्दर्य किसी तपस्या से ही प्राप्त हुआ है। ठग शब्द को बड़ी ही सुन्दरता से ‘ठगड़ा’ कहते हए कवि ने काव्य-सौन्दर्य में चार चाँद लगा दिए –

धर्मशाला में / धौलाधार डटा है / तपश्चर्या में। पृ. 68
मौन को धारे / ठगड़ा शहर का / धौलाधार ये।  पृ. 69

प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण अनेक हाइकु में दिखाई देता है, यथा -  

जीभ निकाले / मेंढक मच्छरों के / खाए निवाले। पृ. 74 
ऊँचे चीड़ पे / उल्लू का ज़ेन लगा / बिना नीड़ के। पृ. 75 

अनेक पर्वतीय पेड़ों में से एक पेड़ मजनूँ का पेड़ भी है। इस पेड़ ने कवि को आकर्षित किया है। इस पेड़ की सभी टहनियाँ झुकी रहती है। इसे कवि ने अलग-अलग रूप में प्रस्तुत किया है। अधेड़ होने कमर झुकने लगती है लेकिन फिर भी अपनी उम्मीदों को नहीं छोड़ता है, यह बात बड़ी ही सहजता से कही है। टहनियाँ झुकी होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि कोई दीवाना अपने केश फैलाए खड़ा है, कवि हृदय कह उठता है कि - 

हुआ अधेड़ / उम्मीदों से हरा है / मजनूँ पेड़। पृ. 77 
है दरवेश / मजनूँ पेड़ खड़ा / फैलाए केश।  पृ. 78 

कुल मिलाकर पुस्तक में प्रस्तुत सभी हाइकु प्राकृतिक सुन्दरता और मानवीय संवेदना का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करते हुए पाठक का ध्यानाकर्षित करते हैं। प्रत्येक हाइकु संवेदना के साथ क्षण की अनुभूति को भी अभिव्यक्त करने में सफल है। तुकांतता हाइकु का अनिवार्य गुण नहीं है, तुकांत हाइकु रचने पर भी कोई आपत्ति नहीं   है। हाइकु प्रायः अतुकांत लिखे जाते हैं लेकिन दिनेश जी के सभी हाइकु सदा प्रथम एवं तृतीय पंक्ति में अन्त्यानुप्रास की छटा लिये सहज ही सुसज्जित होते हैं। पूर्व संग्रहों की भाँति यह संग्रह भी बिम्ब, अन्त्यानुप्रास, लय, अनुभूति, कल्पना आदि की सुंदर अभिव्यक्ति करता हुआ पाठकों के बीच अपना स्थान बनाने में सफल   है। इस सुन्दर सृजन के लिए दिनेश जी को साधुवाद एवं अनेकों शुभकानाएँ। 
 

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