घाट-घाट पर खड़ी निराशा
करती रोज़ पुकार  प्रिय।
सूरत तेरी दिख जाए तो
जीवन हो गुलज़ार प्रिय।
मरुथल में प्यासे घूमे थे
मिला तनिक कब नीर प्रिय
तुमने ही तन-मन सींचा था
हरी तुम्हीं ने पीर प्रिय।
वैरी अपना यह जग सारा
साथ तुम्हारा  प्राण प्रिय
आँसू डूबी इस रजनी में
तुम हो केवल त्राण प्रिय।

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