जीव तुझमें और जगत में, है फ़रक किस बात का,
ज्यों थोड़ा सा फ़र्क़ शामिल, मेघ और बरसात का।
 
वाटिका विस्तार सारा, फूल में बिखरा हुआ,
त्यों वीणा का सार सारा, राग में निखरा हुआ।
 
चाँदनी है क्या असल में, चाँद का प्रतिबिंब है,
जीव की वैसी प्रतीति, गर्भ धारित डिम्ब है।
 
या रहो तुम धुल बन कर, कालिमा कढ़ते रहो,
या जलो तुम मोम बनकर, धवलिमा गढ़ते रहो।
 
पर परिक्षण में लगो या, स्वयम्‌ के उत्थान में,
या निरीक्षण निज का हो चित, रत रहे निज त्राण में।
 
इस जगत में हर्ष भी है, दुःख भी है वैराग भी,
पर वरण तेरा हरण भी, क्षीर भी है आग भी।
 
क्या क्षरण हो क्या शरण हो, शीश की या कि चरण हो,
तेरा जग है तेरा ईक्षण, तुष्ट जीवन या कि रण हो।
 
माँग तेरी क्या परम से, अंतर क्या दिन का, रात का,
जीव तुझ में और जगत में, बस अंतर इस बात का।

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