15-07-2019

हिन्दी साहित्य में आत्मकथाएँ

आकांक्षा शर्मा

प्रेमचन्द्र द्वारा सम्पादित ‘हंस’ पत्रिका का आत्मकथा अंक जयशंकरप्रसाद की इन पंक्तियों के साथ प्रारम्भ होता है -

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथायें आज कहूँ
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा
अभी समय भी नहीं थकी सोई है मेरी मौन व्यथा 

जीवन के व्याकुल, थके, मौन, या अस्ताचल की ओर जाते क्षणों को समय के अनन्त व्योम में विलीन होते देख कर मन में बस यही ख़याल आता है कि क्या कुछ ऐसा है जो मन के अन्दर की उन अविरल, अबाधित व अनवरत चलने वाले विचार-प्रवाहों की गहराई में जाकर जीवन के बीते हुए क्षणों को पुनर्जीवित कर सके! जो मन की व्यथा को गा सके, जो सोये और खोए आनन्द के क्षणों को जगा सके। जो बेहद अपना हो, जो जीवन रूपी सूरज की उदीयमान किरणों की लालिमा और ढलते हुए सूरज की लालिमा को तोल सके। जीवन में पाई और खोई सौगातों को जो फिर से याद दिलाए और राह में लगी ठोकरों को जो चुपके से दोहराए। प्रेरणा, हँसी व रुदन के प्रस्तरों से आने वाली उस ध्वनि को क्या नाम दें! तो उस क्षण जयशंकर प्रसाद की उक्त कविता का शाीर्षक ‘आत्मकथा‘ शब्द अपने उन तमाम प्रश्नों का उत्तर समेटे हुए प्रतीत होता है।

आत्मकथा साहित्यजगत् की वही आनन्द भूमि है जो साहित्य की अन्य विधाओं से निःसंदेह अद्भुत और अतुलनीय है। इस आनन्दभूमि का पथ चाहे कितना भी दुर्गम हो किन्तु साहित्य सृजन का मार्ग तो सदैव ही वेदना की अभिव्यक्ति का, संकल्पना की संभावना का एवं लोकहित की भावना का पोषक होता है। तभी तो हमारे आर्ष ऋषि वाल्मिकि के सन्दर्भ में ‘शोकः श्लोकत्व मागतः‘ कहा जाता है तथा आंग्ल कवि पी.बी. शैली की ये पंक्तियाँ भी हमारे साहित्य सृजन की मूल भावना को इंगित करती प्रतीत होती हैं- Our sweetest songs are those that tell of the saddest thoughts.

साहित्यकार की अन्तःप्रकृति सहज सम्प्रेषणीयता का मार्ग खोजती हुई अपने ‘स्व‘ को अभिव्यक्त करने हेतु उदग्र रहती है। हम उसे भावनाओं का उद्वेलन कहें या अनुभूतियों की अभिव्यक्ति, चिन्तन का विस्तार कहें या कुण्ठाओं का परिष्कार, मानव में कुछ ऐसा अवश्य है कि वह अपने परिदृष्ट अनुभवों, अर्जित संस्मृतियों एवं अनुभूतियों को मानवीय भाषा अथवा अन्य असमर्थ संकेतों के द्वारा सम्प्रेषित करने को सदैव आतुर रहता है। कुँअर ‘बेचैन‘ के शब्दों में-

औरों के ग़म में ज़रा रो लूँ तो सुबह हो दामन पे लगे दाग़ों को धो लूँ तो सुबह हो

अपनी अनुभूति की सूक्ष्मता, चिन्तन की गम्भीरता, करुणा, प्रेम और गीतात्मक चेतना के आधार पर मानो निष्कर्ष निकालती हुई मूल्यवादी अन्तर्मुखी कवयित्री महादेवी वर्मा आत्मकथा लिखने के मार्ग को पवित्रता, श्रमसाध्यता और उत्कट निर्भीकता का पथ बताती हुई लिखती हैं-

 "माता जिस प्रकार आस्था के बिना अपने रक्त से संतान का सृजन नहीं कर सकती, धरती जिस प्रकार ऋतु के बिना अंकुर को विकास नहीं दे सकती, साहित्यकार भी उसी प्रकार गंभीर विश्वास के बिना अपने जीवन को अपने सृजन में अवतार नहीं दे पाता।"

अतः अपनी विशुद्ध आत्मानुभूति को अभिव्यक्त करना साहित्य की अनिवार्यता और नित्यधर्मिता निःसंदेह माना जाते हुए भी यह कार्य करना तलवार की धार पर चलने जैसा है और यदि महादेवी वर्मा के ही शब्दों में कहें तो- "कण्टकों की सेज जिसकी/आँसुओं का ताज सुभग" है। आत्मकथा की व्युत्पत्ति की बात करें तो "आत्मनः विषये कथ्यते यस्यां सा आत्मकथा", अर्थात् जहाँ अपने ही विषय में बात की जाए, वही आत्मकथा है। अतः यह तो सुनिश्चित है कि आत्मकथाकार की दिशा बहिर्प्रयाण से मुड़कर अन्तःप्रयाण की ओर होगी। पं. नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व यशपाल जैसे लेखकों ने अपने समस्त पर्यावरण को ‘आत्म‘ की संज्ञा दी है। स्वामी दयानन्द अपने शिव की खोज में यात्रापथ पर नितान्त अकेले हैं, तो बच्चन, अमृता प्रीतम और अश्क की रंगीनियाँ अपने साथ अनेक इन्द्रधनुषी रंगों वाले संसार समेटे चलती हैं। अनेक आत्मकथा लेखकों ने अपनी कृतियों के लिए आत्मगाथा, आत्मचरित्र, आपबीती, आत्मचरित, आत्मवृत्त, निजवृत्तान्त, मेरी कहानी, आत्मविश्लेषण, आत्म-जीवनी और अपनी कहानी आदि शीर्षक भी प्रयुक्त किये हैं, किन्तु हिन्दी के समीक्षकों और कोशकारों ने ‘आत्मकथा‘ शब्द का ही प्रयोग सर्वाधिक किया है। पाश्चात्य जगत् में इसी आत्मकथा शब्द के लिए ऑटोबॉयग्राफी शब्द प्रचलित हुआ।

संतराम ने सामान्य जीवन की सरल अभिव्यक्ति को उपयोगी आत्म-कथा बताते हुए लिखा है- "अपने जीवन के छिहत्तर वर्षों में मुझे जो सुखद दुःखद अनुभव प्राप्त हुए हैं; उन्हीं को मैंने ईमानदारी के साथ ज्यों का त्यों यहाँ लिखने का यत्न किया है। दुनिया ने तज़रुबातो अवादिस की शक्ल में जो कुछ मुझे दिया है, वो लौटा रहा हूँ मैं।"

विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने आत्मकथा के बारे में लिखा है - "आत्मकथा जीवन का सत्यान्वेषण है, कल्पना के अवकाश की कोरी उड़ान नहीं है। आम आदमी का जीवन प्रेरणास्पद नहीं हो सकता, महान् व्यक्तियों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व आम आदमी के लिए दिशाबोध का काम करता है; उनके जीवन के आदर्शनिष्ठ मूल्यों को स्वीकार करता हुआ उस पथ पर अपने आपको ढालने का प्रयास करता है। आत्मकथा सत्य एवं स्पष्टवादिता को लेकर चलती है।" आत्मकथा लेखन के पीछे छिपी प्रेरणा, मन्तव्य एवं प्रयोजन पर विचार करने पर बहुत से बिन्दु उभरते हैं किन्तु उन सब प्रयोजनों से बढ़कर जो बात आत्मकथा के मूल में उजागर होती है वह है - आत्मबोध

आत्मकथा साहित्य की वैसी विधा नहीं है जैसी कविता, कहानी, या उपन्यास होते हैं। इन विधाओं में कल्पना तत्त्व की प्रधानता होती है, इन्हें ललित वाङ्मय कहा जाता जबकि आत्मकथा में कल्पना तत्त्व एक दोष है, गुण नहीं, आत्मकथा में रचनाकार एक सुचिंतित सरणि के तहत अपने जीवन के उन चुनिंदा क्षणों को कुछ इस तरह पिरोता है कि जिससे जीवन के प्रति उसकी ‘दृष्टि‘ उसके पाठकों तक पहुँच सके और सहृदय पाठक उस दृष्टि से समृद्ध, संवेदित या सजग हो सके। आत्मकथा विधा का एक उत्कृष्ट उदाहरण ‘गाँधी की आत्मकथा’ है जिसकी दृष्टि उन्होंने स्वतः घोषित कर दी है- ‘सत्य के प्रयोग‘ नाम देकर। 

रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा मृत्यु से सिर्फ़ दो दिन पहले लिखी गयी और बिस्मिल को पता था कि दो दिन की दूरी पर मृत्यु अचल खड़ी है। बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा की एक वज़ह यह बतायी है- "इसी कोठरी में यह सुयोग प्राप्त हो गया है कि अपनी कुछ अंतिम बात लिखकर देशवासियों को अर्पण कर दूँ। सम्भव है कि मेरे जीवन के अध्ययन से किसी आत्मा का भला हो जाय। बड़ी कठिनता से यह शुभअवसर प्राप्त हुआ है। नवयुवकों को मेरा अंतिम संदेश यही है रिवाल्वर या पिस्तौल को अपने पास रखने की इच्छा को त्यागकर सच्चे देश-सेवक बनें। पूर्ण-स्वाधीनता उनका ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें। फल की इच्छा छोड़कर सच्चे प्रेम से कार्य करें, परमात्मा सदैव उनका भला ही करेगा।

यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहत्रों बार भी, 
ते भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊँ कभी।
हे ईश भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो, 
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो।"

ऐतिहासिक तथ्यों की सुरक्षा एवं समकालीन इतिहास का विवेचन भी आत्मकथा लिखने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। जैनेन्द्र, मैथिलीशरण गुप्त, पंत, हरिकृष्ण प्रेमी, उदयशंकर भट्ट और रामवृक्ष बेनीपुरी आदि लेखकों ने तो सृजन-प्रक्रिया को आत्मकथा लिखने के पीछे एक महत्वपूर्ण प्रयोजन माना है।

आत्मकथा लेखन के प्रयोजन तो कई हैं जो कि लेखक की मनःस्थिति एवं परिस्थितियों पर निर्भर हैं। लोकोपकार की भावना, आत्मोदाहरण से आगामी जन पथ-प्रदर्शन जैसे लोकोपकारी उद्देश्यों से जब लेखक आत्मकथा लिखता है तो वह मानो जन-जन से जुड़ कर जन भावनाओं को प्रेषित करने का माध्यम बन जाती है और वैयक्तिक निधि होकर भी सर्वलोक-हिताय सिद्ध होती है। राहुल सांकृत्यायन ने तो अपने पूर्व-पुरुषों से भी ऐसी आशा की थी, साथ ही आगामी पीढ़ियों को उन्होंने निराश नहीं छोड़ा-

"मेरी जीवन यात्रा, मैंने क्यों लिखी? मैं बराबर इसे महसूस करता रहा हूँ कि ऐसे ही रास्तों से गुज़रे हुए दूसरे मुसाफ़िर यदि अपनी जीवन-यात्रा को लिख गए होते, तो मेरा बहुत लाभ हुआ होता।" 

कुछ महापुरुषों को जेल में बिताए लम्बे एकांत क्षणों ने ही इस हेतु प्रेरित किया जैसे नेहरू, राजेन्द्रप्रसाद, दीवान सिंह और आज़ाद। आत्मकथा लेखन के प्रयोजनों में चतुर्वर्ग फल-प्राप्ति की बात कही गई है - "काव्यं यशसेऽर्थकृते, व्यवहार-विदे, शिवेत रक्षतये सद्यःपरि निवृत्तये कान्ता-सम्मित तयोपदेश युजे" प्राचीन काल में आत्मकथा के बीजांकुर कठोपनिषद के इस वचन में दृष्टिगोचर होते हैं- "कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत"(अर्थात् कोई बिरले धीर बुद्धिमान् मनुष्य ही ऐसे होते हैं जो आत्म-समीक्षण की ओर प्रवृत होते हैं।) मनु ने आत्मा को साक्षी बताते हुए आत्म चिन्तन व निरीक्षण पर बल दिया है- "आत्मैव ह्यात्मनःसाक्षी गतिरात्मा तथात्मनः।"
 
भारतीय संस्कृति में रचनाकार, कलाकार हमेशा अनाम ही नहीं रहता, वह अपने नाम और वैशिष्ट्य की घोषणा भी करता है। कालिदास ने ‘मालविकाग्निमित्रम्‘ नाटक में लिखा है कि उनके नाटक को केवल इसलिए ख़ारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह नया है। उन्होंने लिखा है कि पुरानी होने से कोई श्रेष्ठ चीज़ नहीं हो जाती और न नयी होने से ही वंदनीय। संत परीक्षा के बाद किसी चीज़ का महत्व स्वीकार करते हैं, जबकि मूढ़ दूसरों द्वारा कही बातों आधार पर अपनी राय बनाते हैं। भवभूति ने ‘उत्तररामचरितम्‘ में तो अपना परिचय एक ऐसे रचयिता के रूप में दिया जिसकी सेविका विद्या की देवी सरस्वती स्वयं हैं। तर्कशास्त्र में निष्णात जयदेव अपने ‘प्रसन्नराघव‘ नाटक में और काशीपति ‘मुकुंदनंदभान‘ नाटक में अपने बारे में इसी प्रकार की गर्वोक्ति करते हैं। भारत में कवि, कथाकार और शिल्पकार अपने वैशिष्ट्य और वैयक्तिकता को लेकर सचेत थे। और उसका बढ़-चढ़कर बखान भी करते थे। यहाँ आत्मकथा भले न लिखी गयी हो लेकिन आत्मकथा लिखने की सम्भावना मौजूद थी। यह अवश्य है कि चूँकि यहाँ ‘आत्म‘ के मायने पश्चिम से भिन्न थे और यहाँ की साहित्यिक संस्कृति भी पश्चिम से अलग थी, इसलिए यहाँ ‘आत्म‘ की अभिव्यक्ति के लिए आत्मकथा की स्वतंत्र विधा का विकास भी बहुत बाद में हुआ। अपभ्रंश काल के जैन कवियों ने संक्षिप्त आत्म परिचय के संकेत दिये हैं, जैसे पुष्पदंत ने ‘नागकुमारचरित‘ के अंत में, स्वयंभू ने ‘पद्मचरित‘ की भूमिका में धनपाल ने ‘भविष्यदत्त कथा‘ में, ‘पृथ्वीराजरासों‘ में कवि चन्दबरदायी का आत्म परिचय प्राप्त होता है। भक्तिकाल में कबीर, सूरतुलसी आदि ने जो आत्म-परिचयात्मक उक्तियाँ लिखी हैं, किन्तु वे उनकी विनीतता, दैन्य व ग्लानि आदि की परिचायक अधिक हैं, आत्मकथात्मक रुचि की कम।

आत्मकथा की विकास-यात्रा का प्रथम उत्थान सन् 1875 से 1931 तक दयानन्द युग (प्रारम्भिक काल) के नाम से जाना जाता है। हिन्दी की सर्वप्रथम मानी जाने वाली आत्मकथा कविवर बनारसीदास जैन की ‘अर्द्धकथानक‘ इसी काल की उत्पत्ति है। सन् 1641 ई. के पश्चात् 1875 ई. में महर्षि दयानन्द की आत्मकथा प्राप्त होती है। यथार्थ वर्णन, आत्म-केन्द्रित स्वरूप, आत्म-विश्लेषण की रुचि, सत्य-प्रतिपादन एवं स्मृति-सम्पादन की कुशलता के कारण कथ्य और शिल्प के आधार पर इस आत्मकथा को स्तरीय आत्मकथा कहा जा सकता है। इस काल की अन्य मुख्य आत्मकथाएँ जो कि लोकप्रसिद्धि के क्षेत्र में आती हैं इस प्रकार है- भवानीदयाल संन्यासी की जेलकथा, श्रद्धानन्द की ‘कल्याण मार्ग का पथिक‘, ‘लाला लाजपत राय की सचित्र आत्मकथा‘, आचार्य रामदेव की ‘मेरे जीवन के कुछ पृष्ठ‘, रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा जिसे बनारसीदास चतुर्वेदी ने हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ आत्मचरित कहा है। भारतीय लेखकों की अनूदित कृतियों में सर्वश्रेष्ठ कहलाने की अधिकारिणी दोनों आत्मकथाएँ महात्मा गांधी की ‘सत्य के प्रयोग‘ एवं कवि सम्राट रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘जीवन-स्मृति (आत्मकथा) हिन्दी में अनूदित होकर प्रारम्भिक काल में प्रकाशित भी हुई। हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा अनूदित महात्मा गाँधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग‘ शीर्षक से सस्ता साहित्य मंडल से 1927 ई. में छपी। इस युग की दूसरी श्रेष्ठ कृति कवि सम्राट रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘जीवन-स्मृति (आत्मकथा) है। श्री सूरजमल जैन ने (द्विवेदी की प्रेरणा से) इस आत्म-कथा का अनुवाद करके मित्रग्रन्थमाला इन्दौर से 1930 में प्रकाशित करवाया।

आत्मकथा की विकास यात्रा का द्वितीय उत्थान काल प्रेमचन्द युग के नाम से प्रसिद्धि है। जिसका काल खण्ड (सन् 1932 से 1947) माना जाता है। साहित्यकारों को आत्मकथा लिखने हेतु सम्प्रेरित करने और उनका पथ-प्रदर्शन करने का सर्वाधिक श्रेय कथा-सम्राट् प्रेमचन्द को है। उन्होंने जनवरी, फरवरी सन् 1932 ई. के संयुक्तांक के रूप में ‘हंस‘ का आत्मकथांक प्रकाशित करके हिन्दी आत्मकथा के क्षेत्र में एक नवीन प्रगति और परम्परा का सूत्रपात किया। सन्1946 में ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन की ‘मेरी जीवन यात्रा‘ का प्रकाशन हुआ। उनके जीवन और साहित्य के समान ही निरन्तर गत्यात्मक, संघर्षशील और विवेकपूर्ण होने के साथ-साथ उनकी आत्मकथा उनके साहित्य की सर्वश्रेष्ठ निधि है।

1947 ई. की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि डॉ.राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा है। अतिवादों के विरुद्ध समन्वयवादी दृष्टि समस्याओं के समाधान में किस प्रकार सहायक सिद्ध होती है, यह इस आदर्शवादी आत्मकथा से प्रमाणित हो सकता है। 1947 ई. में ही भवानी दयाल संन्यासी की ‘प्रवासी की आत्मकथा‘ का प्रकाशन हुआ। प्रथम उत्थान के समान इस द्वितीय उत्थान में भी कुछ प्रसिद्ध तथा उत्कृष्ट आत्मकथाओं के अनुवाद हुए, जिनमें सर्वप्रथम और प्रसिद्धतम अनुवाद पं.जवाहर लाल नेहरू की, 1936 ई. के प्रारम्भ में मूलतः अँग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित ‘माई स्टोरी‘ का है। इस पुस्तक का अनुवाद हरिभाऊ उपाध्याय ने कृष्णदत्त पालीवाल तथा वियोगी हरि आदि के सहयोग से किया।

आत्मकथा की विकास यात्रा के तृतीय उत्थान काल को स्वातंत्र्योत्तर युग (1948 ई. से 1980 ई. तक) माना जाता है। सन् 1947 ई. के पश्चात् विगत 32-33 वर्षों में आत्मकथा-साहित्य के लेखन, प्रकाशन, प्रचार तथा लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है तथा इसका स्वरूप-भेद भी स्पष्ट रूप से लक्षित होने लगा है। पर्वतीय पयस्विनी और मैदानी नदी एक होकर भी एक समान नहीं होतीं, क्योंकि एक ओर यदि सरिता के प्रारम्भिक वेग की क्षिप्रता, शीतलता तथा विशुद्धता की स्थिति समतल क्षेत्र में पहुँचकर क्षीण सी हो जाती है, तो दूसरी ओर उस मैदानी तरंगिणी में व्यापकता, विशालता, गम्भीरता और स्थैर्य की अभिवृद्धि लक्षित की जा सकती है। इतना ही नहीं, प्रथम चरण पर सरिताजल केवल हिमगिरि-स्त्रोतों की उच्चता का प्रतिनिधित्व वहन करता है, तो उपनगरीय स्तर पर अनेक उच्चावय अथवा निम्न जलस्त्रोतों के सम्मिश्रण से उसका रूप ही बदल जाता है। हिन्दी आत्मकथा की विकासयात्रा भी लगभग इस सरित्प्रवाह के समकक्ष है। इस युग की कुछ अन्य प्रमुख आत्मकथाएँ इस प्रकार हैं- हजारी प्रसाद द्विवेदी और विमल कुमार जैन की आत्मकथाएँ, गणेश प्रसाद वर्णी की ‘मेरी जीवन गाथा‘, यशपाल की ‘सिंहावलोकन‘ (सशस्त्र क्रांति की कहानी), सत्यदेव परिव्राजक की आत्मकथाएँ, देवेन्द्र सत्यार्थी की ‘चांद सूरज के वीरन‘, जानकी देवी बजाज की ‘मेरी जीवन यात्रा‘, धीरेन्द्र वर्मा की ‘मेरी कालिज डायरी‘, उपेन्द्रनाथ अश्क की ‘ज्यादा अपनी कम परायी‘, वेदानन्द तीर्थ की ‘जीवन की भूलें‘, अज्ञेय की ‘आत्मनेपद‘, बेचन शर्मा उग्र की बहुचर्चित आत्मकथा ‘अपनी खबर‘, गुरू गोविन्द सिंह की आत्मकथा ‘विचित्र नाटक‘, महात्मा भगवानदीन की ‘जीवन झांकी‘, आचार्य चतुरसेन की ‘मेरी आत्म कहानी‘, एम. विश्वेश्वरैया की खण्ड आत्मकथा ‘मेरे कामकाजी जीवन के संस्मरण‘, आबिद अली की ‘मजदूर से मिनिस्टर‘, लोकप्रिय कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा ने तो नवीन कीर्तिमान स्थापित किए हैं। यह सम्पूर्ण रूप से चार खण्डों में प्रकाशित हुई है- ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’, ‘दशद्वार से सोपान तक’। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की आत्मकथा के क्षेत्र में डॉ.सूर्यप्रसाद दीक्षित ने आत्मकथा सम्पादन के क्षेत्र में एक नवीन प्रयोग किया । इसके अतिरिक्त हिन्दी आत्मकथा लेखन का यह युग सुमित्रानन्दन पंत की ‘साठ वर्ष और अन्य निबन्ध‘ तथा मोरारजी देसाई की आत्मकथा ‘मेरा जीवन वृत्तांत‘, अनीता राकेश की ‘चन्द सतरें‘, काका हाथरसी की संक्षिप्त आत्मकथा, कृश्न चन्दर की ‘आधे सफ़र की पूरी कहानी‘, डॉ. रामविलास शर्मा की आत्मकथा अपनी धरती अपने लोग, नरेश मेहता की आत्मकथा हम अनिकेतन, कमलेश्वर की आत्मकथा जो मैंने जिया, यादों के चिराग, जलती हुई नदी, राजेन्द्र यादव की आत्मकथा मुड़ मुड़ के देखता हूँ, भीष्म साहिनी की आत्मकथा आज के अतीत, विष्णुप्रभाकर की आत्मकथा पंखहीन, मुक्त गगन में, पंछी उड़ गया, जैसी आत्मकथाओं से परिपूर्ण रहा है। इसी कालावधि में उभरते दलित लेखकों की आत्मकथाएँ जैसे अपने-अपने पिंजरे, जूठन और तिरस्कृत भी सामने आई हैं। वर्तमान कालावधि में अनेक लेखिकाओं की आत्मकथाएँ भी प्रकाशित हुई हैं- पद्मा सचदेव की ‘कस्तूरी कुंडल बसे‘, मैत्रेयी पुष्पा की ‘कुछ कही कुछ अनकही‘ आदि। हिन्दी की प्रथम आत्मकथा ‘अर्द्धकथानक‘से आधुनिक युग तक की हिन्दी आत्मकथा साहित्य की यह विकास-यात्रा, अनन्त अपरिगणनीय मुक्तामणियों से संवलित और सुसंग्रथित हो कर भी अपनी चिरन्तन प्रकृति के अनुकूल ज्ञान पिपासा को बढ़ाती है और अपनी विकास-यात्रा को यहीं विराम नहीं देती अतः ये विकास यात्रा आज भी निरन्तर जारी है । गंगा प्रसाद उपाध्याय के शब्दों में -

"याद मेरी तुम्हें रहे न रहे, 
ज़िक्र मेरा कोई करे न करे, 
मर्सिया मैं ही अपना लिख जाऊँ, 
कौन जाने कोई लिखे न लिखे।" 

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