हिन्दी भाषा और विदेशी शब्द

01-06-2019

हिन्दी भाषा और विदेशी शब्द

सुमन कुमार घई

कुछ सप्ताह पूर्व के अपने संपादकीय में हिन्दी भाषा में आँचलिक भाषाओं के प्रयोग से प्रस्तुत होती चुनौतियों के विषय पर कुछ लिखा था। केवल एक सम्पादकीय के मात्र लिख देने से मेरे समक्ष खड़े प्रश्न का समाधान नहीं हो जाता। शायद यह मेरी व्यवहारिक प्रवृत्ति है या भाषा की सीमित समझ; मेरे मस्तिष्क में निरंतर एक बहस चलती रहती है कि क्या ग़लत है और क्या सही। जिन लोगों की साहित्यिक योग्यता या भाषा के ज्ञान का आदर करता हूँ, उनसे प्रायः प्रश्न पूछता रहता हूँ, ताकि उचित उत्तर मिल सके। कुछ लोग समझाने का प्रयास करते हैं या फिर निरुत्तर खड़े रह जाते हैं। उनके हाव-भाव से लगता है कि अगर मैं उनसे प्रश्न न ही करता तो भला था, बेकार में ही उन्हें उलझन में डाल दिया। परन्तु उत्तर जानना आवश्यक है।

प्रश्न केवल आँचलिक शब्दों को हिन्दी भाषा में स्वीकार करने तक सीमित नहीं है। वर्तमान में संचार तकनीकी की क्रान्ति के दौर में नए शब्दों की बाढ़ सी आ गई है जो दैनिक भाषा या बोली का अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं। ऐसा केवल हिन्दी भाषा के साथ नहीं हो रहा बल्कि विश्व की सभी भाषाओं के साथ हो रहा है। हालाँकि इन शब्दों का अधिकतर जन्म अँग्रेज़ी भाषा में निहित है परन्तु अँग्रेज़ी के लिए भी यह प्रश्न खड़ा है कि किस शब्द को शब्दकोश में स्थान मिले किसे नहीं। क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी में बहुत से ऐसे शब्द हैं जिन्हें गढ़ते समय किसी विशेषज्ञ से नहीं पूछा गया। उदाहरण के लिए कुछ शब्द हैं जिन्हें आज आप भी प्रयोग करते हैं जैसे कि बाईट (byte), बिट (bit)| अन्तर केवल यह है कि अँग्रेज़ी ने एक निजी संकाय द्वारा अनुमोदित शब्दों को शब्दकोश में स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया को सहमति दे दी है - हिन्दी भाषा में शायद ऐसा नहीं है। अँग्रेज़ी में जब प्रयोगकर्ता किसी संज्ञा को क्रिया में बदल देते हैं तो वह भी स्वीकृत हो जाती है। उदाहरण के लिए "गूगल" को लीजिए – संज्ञा और क्रिया दोनों ही है। यह शब्द पिछले दशक की देन है और आज इसका प्रयोग सामान्य हो चुका है। यहाँ जनता ने अगर शब्द के प्रयोग को परिभाषित किया वहाँ भाषाविद्‌ जगत ने इस पर मान्यता की मुहर लगा दी। 

हिन्दी भाषा में अगर ऐसा हो सके तो…! अगर कोई करेगा तो कौन? कुछ दशक पहले जब विज्ञान और अन्य तकनीकी शब्दों के समानांतर हिन्दी के शब्दों का विकास किया गया था तो संस्कृत-निष्ठ शब्द ही देखने, सुनने और पढ़ने को मिले। ऐसे शब्द भाषा का हिस्सा तो बन गए पर बोली में प्रवेश नहीं पा सके और समय के साथ केवल पुस्तकों तक सीमित हो गए। अगर भाषाविदों का कोई मंडल फिर से वही ग़लती दोहरायेगा तो पूरा परिश्रम बेकार ही जाएगा। बेहतर यही होगा कि ऐसे शब्दों को जो अन्य भाषाओं के हैं, ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाए। बहुत पहले की बात है जब मैं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका का सह संपादक था; एक भारतीय विद्वान को आपत्ति थी कि मैं अँग्रेज़ी शब्दों का भारतीयकरण क्यों नहीं करता? बात समझ नहीं आई कि क्या उच्चारण को बिगाड़ कर भारतीयकरण हो जाता है। उनकी दलील थी कि लैंटर्न अगर अँग्रेज़ी का शब्द है तो लालटेन उसका भारतीयकरण हुआ स्वरूप स्वीकार्य है। ऐसे उन्होंने बहुत से उदाहरण दिये थे। अब ऐसे शब्दों को आँचलिक उच्चारणों का तड़का क्यों नहीं लग सकता? क्या आँचलिक बोलियाँ या भाषाएँ भारतीय नहीं हैं? अगर हैं तो उनका उच्चारण भी तो इस प्रक्रिया का हिस्सा है। मेरे विचार के अनुसार अगर हम किसी विदेशी भाषा के शब्द को हिन्दी में स्वीकार करते हैं तो हमें उसके मूल रूप में ही स्वीकार करना चाहिए और उच्चारण भी उसी भाषा का रहना चाहिए। जैसे कि इंटरनेट (internet)। उर्दू में स्वीकृत फ़ारसी और अरबी शब्दों का हिन्दीकरण करते हुए हम अर्थ का अनर्थ कर ही रहे हैं - उदाहरण है - तेज और तेज़, जरा और ज़रा, सजा और सज़ा यह कोई कठिन शब्द नहीं है पर अर्थ का अनर्थ अवश्य हैं। अभी हिन्दी में चन्द्रबिन्दु की जगह बिन्दी का प्रश्न नहीं उठाऊँगा क्योंकि अब तो बिन्दी भी समाप्त होती जा रही है!

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