हवा भरने का इल्म : मौज-मौज में मानव धर्म की खोज 

01-05-2020

हवा भरने का इल्म : मौज-मौज में मानव धर्म की खोज 

डॉ. राजेन्द्र  वर्मा


समीक्ष्य पुस्तक : हवा भरने का इल्म (व्यंग्य संकलन)
लेखक : अशोक गौतम
मूल्य : ₹ 275.00
प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स
(ए डिवीज़न ऑफ़ सेल्सनेट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड)
सी-122, सेक्टर 19, नोएडा, 201301, गौतमबुद्ध नगर (एन.सी.आर. दिल्ली) 

“हवा भरने का इल्म” अशोक गौतम का इक्कीसवां व्यंग्य संग्रह है। इस संग्रह के प्रकाशन के बाद और भी कुछ संग्रह प्रकाशित हो गए हैं। व्यंग्य की गंगा में गौतम जी बिना थके निर्बाध तैरते हैं। गंगा मैली है, यह उन्हें पता है, बराबर पता है सरकार! किन्तु शायद उनके इस जन्म के पाप इसी गंगा में डूबते-उतराते ही धुलने हैं, या शायद वे आश्वस्त हैं कि इस जन्म की चुंगी ऐसे ही कटनी है। लो मैं भी उन्हीं की भाषा बोलने लगा। व्यंग्य का आकर्षण ही ऐसा है और मैं उनके लगभग दस-बारह व्यंग्य-संग्रह तो आद्यंत पढ़ चुका हूँ और जब भी अन्यमनस्क हो जाऊँ तब तो और निस्तार ही कहाँ क्योंकि एक तो साहित्य पढ़-पढ़ाकर जीवन की गाड़ी को धकियाने वालों को नींद वैसे ही कम आती है (मुझे माफ़ कीजिएगा यदि आप खर्राटे भर-भर सोते हैं!) और दूसरे व्यक्तिगत लाइब्रेरी में बहुसंख्या उन्हीं की व्यंग्य-पुस्तकों की हैं, जो सादर और निशुल्क मिली हैं। ख़रीद कर किताबें पढ़ने के ज़माने गए और अशोक गौतम अपने व्यंग्यों में इस प्रसंग को बार-बार छेड़ते हैं। ख़ैर, मेरे मुखारविंद से अथवा हस्तलाघव  से कहिए, क्योंकि आजकल कोरोना जी की कृपा से लॉक-डाउन के चलते लैपटॉप की कुंजियों पर उँगलियाँ सरपट भागने लगी हैं— मैं, जो समादृत प्रशंसा कर रहा हूँ उससे यह मत समझिएगा कि मैं ‘हवा भरने के इल्म’ की प्रैक्टिस कर रहा हूँ बल्कि शायद यही कि समीक्षा की परम्परागत विधि के देवताओं को धीरे-धीरे कूच करते भी रहना चाहिए अथवा व्यंग्य की समीक्षा में थोड़ा हास्य या व्यंग्य आ भी जाए तो अच्छा ही है। वैसे एक बात और भी है— पुस्तकें पढ़ने की घटती प्रवृत्ति के इस संकट काल में व्यंग्य रूपी बिछली घास या बाजरे की छरहरी कलगी का सम्मोहन ही हमें जिलाए हुए है।  

“हवा भरने का इल्म” नामक व्यंग्य से ही यदि प्रारंभ करें तो स्पष्ट है कि यदि अशोक गौतम ने इसे संग्रह का शीर्षक बनाया है यो वे स्वार्थ-प्रेरित चापलूसी की उस प्रवृति को मुख्य रूप से निशाना बना रहे हैं जो हमारी संस्थाओं विशेषकर सरकारी संस्थाओं में शनैः शनैः घर करते करते संस्थागत रूप लेती जा रही है। लोक-तंत्र में निश्चय ही प्रशासन और शासन लोक के नज़दीक आ गया है, आना भी चाहिए; किन्तु उसने कुछ लोगों के घरों में तो डेरा ही डाल लिया है। स्वार्थ दोनों ओर है— शासन की ओर भी तो लोक की ओर भी और अब इसे विकृति नहीं आधुनिक प्रबंधकीय कौशल समझिए— इसलिए एक ओर आशीर्वाद तो दूसरी ओर चापलूसी, एक ओर मक्कारी तो दूसरी ओर लाचारी और फिर लाचारी को मक्कारी में बदलते कितना समय लगता है। इसलिए व्यक्तित्व निर्माण  का यह सिलसिला संस्थागत रूप ले चुका है और जो इस कला में दीक्षित नहीं हो सकते वे हवा खाएँ या यदि प्रतिभाशाली हैं तो निजी सेक्टर में जाएँ या भाड़ में जाएँ हमारी बला से— हमारी सरकार तो ऐसे ही चलेगी। अपनी चिर-परिचित शैली में व्यंग्यकार लिखता है— “कहते हैं कृष्ण चौंसठ हुनर निपुण थे। असल में उस वक्त मैक्सिमम हुनरों की संख्या ही चौंसठ रही होगी। पर आज की तारीख़ में हुनरों की गिनती कर पाना बहुत कठिन है। ..... हुनर चाहे कितने भी हों पर आज के समय के हिसाब से सबसे सशक्त हुनर है हवा भरने का हुनर। इस हुनर में जो कोई निष्णात हो जाए तो वह गधे में भी ऐसी हवा भरे.... ऐसी हवा भरे कि उसके बाद मज़े से बिन काठी के ही उसकी पीठ पर चढ़ दसों लोकों की सवारी कर ले और तब गधा अपने गधेपन पर इतराता अपने को दसों लोकों में सबसे अच्छी नस्ल के घोड़े से कम न समझे।”(पृ.110-111) और यह महारत ऐसे ही नहीं मिलती इसके लिए सुबह–शाम सिर खपाना पड़ता है। किन्तु मज़े की बात यह है कि इस विद्या में निष्णात होने के बाद बेरोज़गारी की समस्या से दो-चार नहीं होना पड़ता क्योंकि बकौल व्यंग्यकार— “हवा भरवाने की ज़रूरत आज की तारीख़ में कमोबेश सभी को रहती है, .... यही थोथी प्रशंसा की भूख हवा भरने वालों को जन्म देती है। ...... तब उनका हवा भरने का धंधा ऐसा टनाटन निकल पड़ता है कि उन्हें इस धंधे के आगे सारे धंधे फीके लगते हैं, रीठे लगते हैं।” (पृ.112) 

इस संग्रह में और भी व्यंग्य हैं जो इसी नवाचार की प्रवृति को समर्पित हैं। “जय श्री अद्भुत चापलूस चालीसा यंत्र”, “कनखजूरे”, “चार्ज हैंडिड ओवर, टेकन ओवर” आदि ऐसे ही व्यंग्य हैं। “चार्ज हैंडिड ओवर, टेकन ओवर” में सेवानिवृति के बाद भी अफ़सर को ऐसे हुन्नर-मंद मातहतों की फ़िक्र है। क्या करें बांड ही ऐसा बन जाता है! अपने स्थानापन्न को हिदायत देते हुए टीके नामक निष्ठावान की निष्ठा का गुणगान करता हुआ निर्गमन-भावी अफ़सर कहता है— “नहीं, ऐसी बात नहीं। वह हर साहब के लिए समर्पित होने वाला जीव है। साहब की चाटुकारी का गुण उसमें नैसर्गिक है। भले ही उसे अपने बारे में कोई जानकारी हो या न, पर वह आप तक सारे ऑफ़िस की और ऑफ़िस वालों की एक-एक ख़बर चौबीसों घंटे बिन रुके पहुँचाता रहेगा। इससे अधिक और साहब को चाहिए भी क्या? साहब के चरणों में रहने को ही वह अपना जीवन मानता है। भ्रष्टाचार की चरम सीमा जहाँ आकर ख़त्म होती है, उसकी चापलूसी वहाँ से शुरू होती है।”(पृ.46) कुर्सी पर विराजमान होने वाले अफ़सर को और आश्वस्त करते हुए वह कहता है— “जी वर्मा जी! वह एक समर्पित टेस्टिड चाटुकार क़िस्म का है सच पूछो तो मैं तो उस पर आँख मूँद कर विश्वास  करता था। ऑफ़िस की कुछ बातें तो मुझे और केवल उसे ही पता होती थीं। वैसे अगर आप उसे अपने से अलग भी रखेंगे तो भी वह अपने को आपके दिल में रखने के लिए चौथे दिन मजबूर करके ही साँस लेगा।”(पृ.48) एक दूसरा चरित्र यद्यपि निवर्तमान होने वाले अफ़सर को पसंद नहीं, किन्तु उसकी प्रजाति भी अमुक हुन्नर-मंद से भिन्न नहीं। क्या है कि ऐसे हुन्नर-मंदों की अब कोई कमी थोड़े ही है, आख़िर इस देश में लोकतंत्र स्थापित हुए सत्तर से अधिक वर्ष हो गए हैं और ऐसे लोग तो हर काल-खंड में पुष्पित-पल्लवित होते रहे हैं—चाहे वह सामंतवादी युग रहा हो, साम्राज्य-वाद का समय हो, पूँजीवाद का या फिर साम्यवाद ही क्यों नहीं! हाँ साम्यवाद की जड़ें भी इसी हुन्नर से मज़बूत होती हैं जी। व्यंग्यकार के नामकरण के अनुसार यह दूसरा पात्र पीके है किन्तु गुण-धर्म में टीके ही है, बस दिन बुरे चल रहे हैं। यह टीके का वरिष्ठ भी है या ठीक से कहूँ तो अग्रज और चापलूसी करते-करते लाचार से मक्कार हो गया है— जैसे मैंने ऊपर निवेदन किया था, इसलिए आउट गोइंग साहब को पसंद नहीं— “वह कुछ भी कर सकता है। बड़ा चुस्त है वह। बातें ऐसी लच्छेदार कि... सीएम-पीएम से नीचे वह बात ही नहीं करता। चाय तक एसपी, डीसी, चीफ इंजीनियर के साथ ही पीता है।”(पृ.47)

“डंडा पीर मुस्टंडों का” व्यंग्य यद्यपि सरकार के उस आशय पर आधारित है, जिसमें सरकारी कर्मचारियों के परफ़ॉरमेंस रिव्यु की बात की गई थी। हाँ, सरकारें समय-समय पर ऐसी अधिसूचनाएँ जारी करती ही रहती हैं, किन्तु जब उनको कार्यान्वित करने की बात आती है तो तथाकथित अपने ही आड़े आ जाते हैं; किन्तु पात्र यहाँ भी उससे मिलता जुलता ही है, जिसकी चमड़ी इस वातावरण में पलते-बढ़ते, खाद-पानी खाते-पीते मोटी हो गई है—जो हवा भरने के इल्म के निरंतर अभ्यास से पारंगत या कि डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त हो गया है। उसकी कारगुज़ारियों का नमूना देखिए— “जब देखो, कोई न कोई बहाना बना ऑफ़िस से गायब। मिलते पंचायत के सेक्रेटरी से तो बताते कि वे बस अभी-अभी विभाग के सेक्रेटरी से मिलकर आ रहे हैं। वाह! क्या कमाल के साहब हैं। आदमी की परख तो उनको ऐसी है कि... वे तो मुझे उठने ही नहीं दे रहे थे अपने पास से। कह रहे थे यार कहाँ ग़लत जगह फँस गए हो तुम भी। तुम्हें तो सचिवालय में होना चाहिए था, मेरी जगह... आदि-आदि। अपने घर में तो जैसे चाय पीते ही नहीं। डीसी के स्तर से कम वालों के साथ चाय पीएँ तो उन्हें जुलाब लग जाएँ।”(पृ.52) “गवर्नमैंटी फ़ार्म की बैस्ट मुर्गी” व्यंग्य में भी ऐसे ही सरकारी कर्मचारी के गुणों का बखान कुछ इस तरह हुआ है— “तो लीजिए, सावधान! वे आ गए। नौ बजे के बदले बारह बजे आने पर भी उनके चहरे पर कोई शिकन नहीं। .... उनका चेहरा असल में शर्म के लिए बना ही नहीं है। जो चेहरे शर्म के लिए ख़ुदा बनाकर भेजता है, असल में उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलती।”(पृ.104) इस प्रकार इस संग्रह के चार-पाँच व्यंग्यों में यह चरित्र अपने विराट रूप में सामने आ जाता है। अब कोई भी ऐसे चरित्र का जाप करके कृत-कृत्य हो सकता है और बिना फ़ीस दिए इस विद्या में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त कर व्यवस्था में स्थापित हो सकता है। अशोक गौतम का खुला आमंत्रण है।

धर्म भी हमेशा से ही व्यंग्यकारों के निशाने पर रहा है, क्योंकि कभी समय था जब धर्म, अर्थ और काम को नियंत्रित कर, मोक्ष के अंतिम पायदान तक पहुँचने का माध्यम होता था, और धर्म का अर्थ केवल और केवल मानव धर्म— विशुद्ध मानव धर्म जो मनुष्य ने पशु से मानव बनने की प्रक्रिया में बड़े अध्यवसाय से अर्जित किया था। धर्म का, सत्ताओं ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए प्रयोग किया, विकृत हुआ और आज स्थिति यह है कि ‘धर्म’ शब्द गाली हो गया, क्योंकि धर्म भी अपने अपने हो गए हैं, अपने और पराये हो गए हैं, सम्प्रदाय हो गए हैं  और ‘अर्थ’ सब के सिर पर नाच रहा है बे-लगाम! “अप्लीकेशन्स आर इनवाइटिड”, “बाबा, बाज़ार और बेचारा करतार”, “बोलो, मुझ जैसे भक्त की जय!” “धर्म का ठेला, मेला ही मेला”, “धर्म के कारोबारी की व्यथा कथा”, “फ्रेंचाइज़ी आबंटन फिलहाल बंद” आदि व्यंग्य इसी आत्मघाती विपर्यय को संबोधित हैं। “बाबा, बाज़ार और बेचारा करतार” व्यंग्य का एक उदाहरण द्रष्टव्य है— “भगवान को पाने का हर रास्ता आज भी वैसे ही बाबाओं की गली से होकर जाता है जैसे आत्मा के स्वर्ग का रास्ता जीव के मरने के बाद पंडों के पिछवाड़े से होकर जाता है।”(पृ.22) अपने काम-धंधे में फ़ेल हो, हताश-निराश हो अथवा इससे भी आगे सर्व-इच्छा-पूर्ति हेतु कामधेनु की तलाश में जब भी व्यक्ति आगे बढ़ता है तो उसे पहले सिद्ध-बाबा की तलाश करनी पड़ती है। इस व्यंग्य का पात्र भी कमर कस कर उस ओर बढ़ चला है। और बाबा की सहज कृपा देखिए— “पहले ये लो भगवान का बैंक अकाउंट नंबर और इसमें पाँच हज़ार एक सौ जमा करवा दो।”(पृ.23) और फिर आगे का प्रवचन सुनिए— “हर लोक में धन की ज़रूरत किसे नहीं भक्त? धन है तो भजन है। धन है तो मन है। धन समस्त सृष्टि का आधार है। धन के बिना जीव निराधार है। धन के बिना भगवान बिन चमत्कार है। धन के बिना हर गृहस्थी ही नहीं, सरकार से लेकर बाबा तक बीमार है।........ धन हर सोच का मूल है। धन है तो आग भी कूल है। धन है तो शूल भी फूल है।”(पृ.23) यही आज के जीवन का सार-तत्त्व है जिसे ऊपर भी इंगित किया गया है, और यह भी कि क्यों व्यंग्यकार बार-बार ऐसे पात्रों को गढ़ने पर मजबूर हो जाता है और गढ़ने की भी क्या ज़रूरत है—अब ऐसे पात्रों को खोजने के लिए वन-वनांतर में थोड़े ही जाना होता है, आप अपनी कोठरी से बाहर निकलिए ये आपको गली में ही मिल जाएँगे, बस आपकी बदक़िस्मती कि आपकी उन पर अभी तक नज़र नहीं पड़ी या अभी तक आप पर उनकी नज़र-ए-इनायात नहीं हुई। कोई ऐसा बाबा नहीं जिनकी अपने प्रोडक्ट्स की चेन न हो और उसके प्रोडक्ट ख़रीदना भी लाज़मी! बिना प्रोडक्ट ख़रीदे कोई सम्भावना है? नहीं— “नहीं! बिलकुल नहीं!! साहस हो तो आज़मा कर देख लो। परम सत्य है, असल में जब पैसे वाला जीव भौतिक सुख साधनों से ऊब जाता है, तब ही वह भगवान के चरणों में जा गिड़गिड़ाता है। और रुपैया छाप भक्त उसे त्यागी कह कर एक बार फिर धोखा दे जाते हैं। तब हम जैसे बाजार में कुछ और चौड़ी मैली चादर बिछा देते हैं।”(पृ.25)

“बोलो, मुझ जैसे भक्त की जय!” व्यंग्य, नवरात्रों आदि के अवसर पर मंदिरों में लगी भीड़ को संबोधित है, जिनकी होड़ देख कर लगता है कि मानो भगवान नौ दिनों के लिए ही मंदिरों में विराजमान होंगे और उसके बाद अपने बैकुंठ-लोक चले जाएँगे। व्यंग्य देखिए— “अपने आप तो भक्त इन दिनों हवा पानी के सहारे चल रहा है पर उसने आजकल भगवान का भी खाना, पीना, सोना सब हराम कर रखा है। भगवान के सारे रूटीन गड़बड़ा गए हैं। जिधर देखो, लग रहा है सतियुग आ गया। सब भगवान का गुणगान करने में जुटे हैं।”(पृ.41) जब से मानव के जीवन-दर्शन से धर्म—आशय मानव धर्म से ही है, विस्थापित हुआ है तब से मनुष्य के अंतर में ख़ालीपन तो है ही, बल्कि वह दिन-प्रतिदिन खाई में परिवर्तित हो रहा है—तब से यह होड़ मची है; कम से कम भारत के सन्दर्भ में तो यही सत्य है। “धर्म का ठेला, मेला ही मेला” व्यंग्य में इसी वस्तु-स्थिति का अवलोकन करते हुए काम-धंधे के चौपट होने पर जीवन से आक्रांत कामपाल जब आश्रय खोजता हुआ शरणस्थली पर पहुँचता है तो बाबा के कथन में आश्वस्ति का भाव देखिए— “इस देश में जितना धर्म बिकता है उतना और कोई माल नहीं बिकता। धर्म के ख़रीदार यहाँ हर कैटेगरी के हैं। जिन लोगों के पास आटा-दाल ख़रीदने के पैसे नहीं, वे भी आटे दाल की परवाह किये बिना धर्म ज़रूर ख़रीदते हैं। रही बात ठेले पर धर्म बेचने की सो धर्म के जितने भी आज मॉल सजे देख रहे हो न! सबने धर्म बेचना ठेले से ही शुरू किया था।”(पृ.80)— यह हुई धंधे की दीर्घकालीन सफलता की गारंटी। बाबा की ज़ुबानी ही धंधे में स्कोप देखिए— “मेरे पास स्वर्ग जाने तक के लिए लिफ़्ट मौजूद है। भीतर ही भीतर आई फील दैट कि स्वर्ग के देवता तक मुझसे चिढ़ने लगे हैं। हज़ारों की संख्या में मेरे दिमाग़ और बिना दिमाग़ वाले भक्त हैं! घर के ख़ाली दाल-चावल के डिब्बों में सोने के आभूषण, हीरे जवाहरात भरे पड़े हैं। कल तक जिन्हें मैं हफ्ता दिया करता था वे सब मेरे चरणों में डेली चढ़ाने आते हैं।”(पृ.81) “धर्म के कारोबारी की व्यथा कथा”, “फ्रेंचाइज़ी आबंटन फिलहाल बंद” आदि व्यंग्य किसी न किसी प्रकार से धर्म के नाम पर हो रहे कारोबार की ही पोल खोलते हैं।

“फेसबुकम् मुंडन पेस्टयामि” का कथ्य यद्यपि सोशल मीडिया के उस शौक को संबोधित है जिसमें बिना कुछ सोचे समझे सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने की होड़ मची हुई है। हरिद्वार जाकर अंतिम संस्कार की क्रियाएँ करते हुए स्नान क्या शोक है अथवा शोक का प्रदर्शन— “उन्हें माँ के शोक में डूबे बस इसी बात की जल्दी थी कि वे कब जैसे हरिद्वार पहुँचें और वहाँ जा कब जैसे अपना सर मुंडवाने के बाद फेसबुक के सहारे अपने को मातृशोक से ग्रसित घोषित करें। ...........अब कोई भी शोक तब तक सही मायने में शोक नहीं कहा जा सकता जब तक वह फेसबुक, व्हाट्सऐप पर लाइक न किया जाए, उस पर कमेंट्स न आएँ।”(पृ.93) प्रदर्शन की यह आधुनिक प्रवृत्ति, संवेदनाओं का यह निपट स्खलन, सभ्य-संस्कार तो नहीं ही है, तथापि इस व्यंग्य में धर्म के नाम पर होने वाली आस्थाओं और विश्वासों के दोहन की होड़ पर तीखा प्रहार भी द्रष्टव्य है— “दोस्तो, अपनी नस्ल के हर कुत्ते तक की मरी आत्मा तक को स्वर्ग पहुँचाने के लिए हरिद्वार जाना ही पड़ता है। ज़िन्दा जी वह नरक में घुटती रहे तो घुटती रहे। दूसरे, मरे जीव को स्वर्ग भेजने वाले ट्रैवल एजेंट केवल हरिद्वार में ही रहते हैं।”(पृ.94) आचार-विचार, आस्था विश्वास अपनी जगह है, किन्तु आस्था और विश्वास का बेशर्म दोहन अलग बात है। व्यंग्यकार इसी प्रवृत्ति बल्कि विकृति के प्रति सचेत कर रहा है।   

भ्रष्टाचार और विशेषकर राजनीतिक भ्रष्टाचार सभी व्यंग्यकारों के लिए प्राणवायु के सामान है। अर्थ यह नहीं कि राजनीतिज्ञ जान-बूझ कर व्यंग्यकारों को यह अवसर देते हैं। व्यवस्थाओं में ऐसे परजीवी-विषाणु कोरोना वायरस की तरह चाहे-अनचाहे मौजूद रहते ही हैं और जैसे ही तंत्र शिथिल होता है अथवा नागरिकों में अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का अभाव होता है, ये विषाणु संक्रामक रूप ले लेते हैं। व्यंग्यकार यही कोशिश करता रहता है कि लोग अपने और समाज के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें ताकि ये परजीवी-विषाणु संक्रामक रूप न ले सकें। वैसे इस विषाणु की वैक्सीन कभी विकसित होगी ही नहीं, क्योंकि सरकारें ऐसी वैक्सीन के निर्माण में रुचि ही नहीं रखती। किन्तु व्यंग्यकार अपने स्वभाव के कारण मजबूर है या अभिशप्त कि वह सामाजिकों को सचेत करता ही रहता है और कदाचित् तभी कुछ ज़ोन ग्रीन ज़ोन बने रहते हैं। यह प्रदेय क्या कम है? “बड़े बाबू ऐसा भी तो हो सकता है कि...”, “अतृप्त आत्मा की शांति हेतु”, “डियर बिरादरों से अपील”, “डिग्री दुःख का कारण”, “देश संकट में है”, “देश तो बंद होकर ही रहेगा” आदि ऐसे ही व्यंग्य हैं— कहीं-कहीं ही सही, ग्रीन ज़ोन बनाने और बनाए रखने की ईमानदार कोशिश। 

“डिग्री दुःख का कारण” व्यंग्य में नेताओं द्वारा जनता की मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने की कोशिशों को निशाना बनाया गया है—“धन्य हैं मेरे देश के नेता जो इन दिनों जनता की समस्याओं से दो-दो हाथ करने के बदले एक दूसरे की डिग्रियों से सौ-सौ हाथ करने में जुटे हैं। धन्य हो इनकी जनसेवा। डिग्रियों के प्रति इनका आक्रोश-जोश देख कर तो यही लगता है कि इनके हाथों में लोकतंत्र सुरक्षित है, उसे लोक से कोई ख़तरा नहीं। तंत्र से होता हो तो होता रहे।”(पृ.59) इसी पृष्ट पर एक अन्य उदाहरण भी द्रष्टव्य है— “वैसे डिग्रीधारी होना अलग बात है, डिग्री से नौकरी मिलना अलग बात। असली डिग्री वाले बहुधा नौकरी से वंचित रह जाते हैं, जबकि नक़ली डिग्री वाले मज़े से नौकरी पा जनता और सरकार दोनों को छाती ठोंक-ठोंक खा जाते हैं।”(पृ.59) किन्तु समझ में यह नहीं आता कि प्रतिभाओं को येन-केन-प्रकारेण मुख्य-धारा से अलग रख कर कौन से प्रयोजन की सिद्धि होती है या कि नेताओं के पास बेहतर समाज की परिकल्पना अथवा विज़न ही नहीं है। शायद यही सच है। “चुनावी सीज़न का मसालेदार विज़न” नामक व्यंग्य में यह विज़न स्पष्ट हुआ है, वह है किसी भी तरह चुनाव जीतना— वादों-प्रवादों की ताल ठोक प्रतियोगिता— फिर वादा चाहे साइकिल के बदले स्कूटी का कर दो, रेडियो के बदले टीवी दे दो, कंप्यूटर दे दो, लैपटॉप दे दो। नेता जी अपनी टीम को निर्देश देते हैं— “कहने में जाता क्या है? बाद की बाद में देखी जाएगी। अभी तो अभी की सोच हे मलाई लाल! मन करे तो अनपढ़ों को बीए, एलएलबी की डिग्री देने का भी वादा कर डालना हमारी ओर से।”(पृ.50)— और इसमें किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं है। बहुत से निजी क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों का पर्दाफाश होता रहता है, जो शिक्षा की अपेक्षा फ़र्जी डिग्री बाँटने के धंधे को ज़्यादा लाभकारी मानते हैं। शिक्षा का निजीकरण किन शर्तों और प्रतिमानों के आधार पर हो रहा है इसके लिए किसी रहस्य-विद्या की आवश्यकता नहीं। जन-आन्दोलन से बनी क्रांतिकारी सरकार के मंत्रियों के फ़र्जी डिग्री के आधार पर इस्तीफ़े से यह स्पष्ट है कि हर कोई बहती गंगा में हाथ धोने के लिए लालायित है और गंगा साफ़ करने का मादा किसी में नहीं। कुछ और पंक्तियाँ चिंतनीय हैं। चुनावी वादों की होड़ का चरम देखिए— “हुजूर वे ये भी कह रहे हैं कि उनकी सरकार आ गई तो वे हर वोटर को काम करने का मौका नहीं देंगे। वोटर पाँच साल तक हाथ पर हाथ धरे खाता रहेगा, खाकर पछताता रहेगा,”(पृ.51) और इसके प्रत्युत्तर में नेता जी का फ़रमान देखिए—“कोई बात नहीं जब जनता से वादे करने ही हैं तो दिल खोलकर ही क्यों न कर लिए जाएँ। वादे करने में हमारे बाप का जाता क्या है? जाओ, जनता से कह दो कि जो हमारी सरकार आ गई तो हमारे वर्कर जनता के मुँह में हलवा-पूरी पाँच साल तक डालते रहेंगे।”(पृ.51) जब लोकतंत्र में चुनावी विमर्श यहाँ तक पहुँच जाए, तो यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आज़ादी के बहत्तर वर्ष बाद हम कहाँ पहुँचे हैं। अन्तर्निहित प्रश्न बहुत हैं यदि जनता ग़रीब तो मुफ़्त अनाज, कम क़ीमत पर आहार, सस्ती दरों पर कृषि उपकरण ज़रूरी हैं और उपज का उचित मूल्य भी। इस सब के लिए समुचित नीति की भी आवश्यकता है। किन्तु जब ये सब नीति का अंग न होकर वोट प्राप्ति के हथियार बन जाते हैं तो साफ़ है कि हमारे पास राष्ट्र-निर्माण की दीर्घावधि योजना नदारद है। स्वतंत्रता के बाद जो सबसे बड़ी आवश्यकता थी, वह थी जनता का आत्म-विश्वास लौटना, हीन-भावना से उसका निस्तार, स्वाभिमान की रक्षा, खोई हुई प्रतिष्ठा की पुनः प्राप्ति। किन्तु अब तक हमारे नेतृत्व की रीढ़ सीधी नहीं हुई, जनता की कब होगी! इस व्यंग्य की अन्तिम पंक्ति बड़ी सार्थक है— “वे ठठियाए और लहलहाते खेत को चरने के सुनहरे सपनों में खो गए।”(वही)

“बस, चित्रगुप्त बस!” व्यंग्य में मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले के माध्यम से व्यवस्थागत गंभीर प्रश्न और हैरान करने वाली सचाइयों से रूबरू करवाया है— “हुजूर, मालूम हुआ है कि वहीँ के इस रोजगार देने वाले ग्रुप द्वारा रोजगार देने पर हो रही जांच की आंच के चलते आरोपी, गवाह समय से पहले मौत को पता नहीं किस डर के गले लगा रहे है, यही कारण है कि हम वारंट अपने यमदूत के पास देते तो दो के हैं पर उनके साथ चार आ जाते हैं।” (पृ.30) आगे देखिए— “हुजूर, अपने यजमानों के देश में अब तो ये सब बात आम है। वहाँ जनता से पैसे लिए जाते हैं इलाज के और उन्हें थमा दी जाती है मौत! अपने देश के यजमानों से पैसे वसूले जाते हैं अमृत के और पिला दिया जाता है विष ....।” (पृ.31) “डियर बिरादरों से अपील” में भी जाति-सम्प्रदाय आधारित वोट की राजनीति का पर्दाफ़ाश किया गया है। “देश संकट में है” व्यंग्य में देश की ढुल-मुल क़ानून व्यवस्था और राजकीय-प्राथमिकताओं के अभाव की स्थितियों को निशाना बनाया गया है। मंत्री की बकरी की खोज में ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी, उसको अगवा करने का कभी विपक्ष, कभी आतंकवादियों अथवा बाहरी ख़ुफ़िया एजेंसियों तक पर इल्ज़ाम इसी राजनीतिक चालबाज़ी की व्यंजक अभिव्यक्ति है, जिससे कभी भी जनता का मूल समस्याओं से ध्यान भटकाया जा सकता है। खोजने के प्रयास में अपने संस्थानों पर इसलिए भरोसा नहीं क्योंकि इन संस्थानों को सशक्त बनाया ही नहीं गया— “रही बात पुलिस जी की! वे तो बेचारे अपने थाने के अन्दर गुम हुए माल को ढूँढने तक में नाकाम रहते हैं, सो उनकी बकरी क्या ख़ाक ढूँढ़ पाएँगे? अब उन बेचारों का भी क्या दोष। उन्हें अपने आम के बागों की रखवाली करने से कोई बाहर आने दे तो बेचारे कुछ और नया सीखें। वरना बन्दूक उलटी ही पकड़ेंगे। इसलिए अबके यह काम मंत्रीजी ने उन्हें नहीं दिया।”(पृ.62) सार भी वहीँ मौजूद है— “अगर बकरी न होती तो चुनाव में हार के बाद बलि का कोई बकरा न बन पता।.... तब उसकी जगह बलि चढ़ने के लिए कौन सहर्ष तैयार हो पाता? गीदड़, सियार तो समाज में आने से पहले ही चालाक रहे हैं। राजनीति में आने के बाद तो क्या मजाल जो कोई उनका बाल तक बांका कर सके।...... बकरी को जनता की अपेक्षा आसानी से दुहा जा सकता है।”(पृ.64) 

“देश तो बंद होकर ही रहेगा” व्यंग्य में तो व्यंग्यकार और भी मुखर है। उन्हीं की बानगी देखिए— “वास्तव में जिन्होंने देश के बारे में सोचने, देश को समझने को, देश के विकास को, देश से प्यार करने के पारिवारिक टेंडर भरे हैं, वे अपने देश में कम, विदेशों में अधिक रहते हैं। देश के असली नागरिक तो वे हैं जो हरदम देश को खाने के लिए जुगत भिड़ाए रहते हैं।”(पृ.65) किन्तु दूसरा पहलू अधिक ख़तरनाक है जो व्यंग्यकार की मुख्य चिंता है—  “पर जिन पर देश को बंद ही देखने का भूत सवार हो वे भला देश को खुला कैसे देख सकते हैं? देश बंद होने पर ही तो उनके लिए दरवाज़े खुलते हैं। देश बंद में ही उनके विकास की अनंत संभावनाएँ छिपी रहती हैं। ..... वे देश बंद को सफल बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। देश बंद को सफल बनाने के लिए उसके हवनकुंड में कुछ भी जला सकते हैं। देश बंद को सफल बनाने के लिए बाहर से किसी को भी बुलवा सकते हैं।”(पृ.66) किन्तु इसी व्यंग्य में एक विरोध का स्वर भी दृष्टिगोचर होता है जब वर्षों से मोहरा बना व्यक्ति प्रतिवाद करता है— “बंद के दौरान आगजनी, लूटपाट करते देखते अब मैं बहुत थक गया हूँ हे सौ मुँहे चरित्र! हर बार बंद के दौरान आग लगवाते मुझसे हो और रोटियाँ सेंकते अपनी हो। ये कहाँ की रीत है सर? बंद हमसे करवाते हो, पीठ अपनी थपथपाते हो?”(पृ.67) वास्तव में यहीं से शुरूआत होगी। व्यंग्यकार तो बार-बार तरह-तरह से इसीलिए सचेत करता रहता है कि लोग उसे स्वीकृत परिपाटी या व्यवस्था का गुण-धर्म ही न समझ बैठें और व्यंग्यकार मुखर भी इसीलिए है। 

“डेज़ी की कमर्शियल आत्मकथा” वास्तव में गाँव-देहात के भारतवर्ष की सादगी और आस्था से भरे जीवन से कुत्तों को पालने के शौक़ और कमर्शियल हो जाने की कथा है— गाय को सड़क पर आवारा छोड़ने और कुत्तों को पाल-पोस कर धन कमाने की जुगत वाली मानसिकता का पोस्ट-मोर्टेम है। आत्मकथा की परिकल्पना की व्यंजकता देखिए—“तब सपने में ही हम दोनों के बीच एक गुपचुप समझौता हुआ और मेरे भीतर उसकी आत्मा ने मुस्कुराते हुए जब प्रवेश किया तो जाकर पता चला कि यार, ये आत्मा तो कुतिया की है। मेरे पूछने पर उसने अपना नाम डेज़ी बताया और यह भी बताया कि कभी उसके पुरखे जर्मन से आए थे। पर अब वह मिक्स डीएनए की है। कब आए थे? उसे पता नहीं। अब वह भारतीय संस्कृति की हो गई है...”(पृ.69)— भारतीय संस्कृति के ह्रास-विकास की ऐसी व्यंजक अभिव्यक्ति, व्याख्या की नहीं चिंतन और मनन की माँग करती है। 

विषय-वस्तु से इतर यदि व्यंग्यकार की शैली पर भी थोड़ा दृष्टिपात करें तो “अप्लीकेशन्स आर इनवाइटिड” में शैल्पिक दृष्टि से नया प्रयोग हुआ है। “बस, चित्रगुप्त बस!” व्यंग्य  की संवाद शैली आकर्षक बन पड़ी है। “डेज़ी की कमर्शियल आत्मकथा” में व्यंग्य कहानी का रूप ले लेता है। “भैंस गुस्से में है सर” व्यंग्य में आधार कार्ड को लेकर उठे विवाद को हल्के-फुल्के अंदाज़ में अभिव्यक्ति मिली है। शिल्प और भाषा के लिए गौतम जैसे व्यंग्यकार को किसी बाबा की शरण में नहीं जाना पड़ता क्योंकि अब वे स्वयं इस क्षेत्र के बाबा हैं। “बोलो, मुझ जैसे भक्त की जय” व्यंग्य का भाव तो मार्मिक है ही, जैसे ऊपर इंगित किया गया है, किन्तु भाषा की व्यंजकता देखिए— “वाह! गला तक काटने वालों ने अपने चाकू-छूरियाँ सान चढ़ाने वालों को दे मंदिरों से नाता जोड़ लिया है। इनकी भक्ति को देख तो ऐसा लगता है मानो ये अपने नाखून काटने तक को पाप समझते हों।”(पृ.42) इसी व्यंग्य में आगे वे कहते हैं— “बकरों और मुर्गों की आयु ईश्वर के परताप से नौ दिन और बढ़ गई है। वे अपने को मृत्युंजयी मानकर उधम मचा रहे हैं। पर बकरे की माँ आख़िर कब तक ख़ैर मनाएगी ? इन दिनों चिकन-मटन खाने वाले कितना त्याग कर केले-संतरे खा जीवन यापन कर रहे हैं। बाज़ार में लहसुन प्याज टुकुर-टुकुर ग्राहकों को ताकते सड़ियाए जा रहे हैं।”(पृ.42) “फ्रेंचाइज़ी आबंटन फिलहाल बंद” व्यंग्य का एक और उदाहरण देखिए— “बहुत हो लिया कर्ज लेकर सबसे मुँह छुपाई का खेल। देश का कल्याण तो जब भगवान से ही नहीं हो पाया सो अपना नाक चेक किया कि जो धर्म की फ्रेंचाइज़ी रूपी तालाब में डुबकी लगाऊँ तो नाक कटेगी तो नहीं। नाक कटने का जब कम ही ख़तरा दिखा तो मैंने डरते हुए भी धर्म की फ्रेंचाइज़ी में डुबकी लगाने की ठान ली।”(पृ.85)— ख़तरा उसे महसूस होता है जो पहला क़दम इस ओर बढ़ाता है, बल्कि यहाँ ख़तरा नहीं असमंजस ही है; और जब वह देखता है कि इस हमाम में सब नंगे हैं तब तो कहने ही क्या! यह ठीक है कि व्यंग्य अपने आप में कभी निबंध लेखन की शैली-मात्र हुआ करता थी, जिसका प्रयोग वस्तु को व्यंजक रूप में प्रस्तुत करने के लिए होता था; किन्तु यह शैली अब इतनी लोकप्रिय है कि अब शैली के लिए वस्तु ढूँढ़ने की भी आवश्यकता नहीं क्योंकि व्यवस्थाओं में उपलब्ध स्थितियाँं-विकृतियाँं मानो व्यंग्यकारों के स्वागत-सत्कार के लिए ही चहुँ ओर प्रसृत हैं और उनकी बाट जोहती रहती हैं। अशोक गौतम वहीँ अपनी चिर-परिचत मुस्कान के साथ मौजूद होते हैं।  

कुल मिलाकर अशोक गौतम के विवेच्य व्यंग्य-संग्रह में उठाई गई समस्याओं को अगर गहरे में लें तो कदाचित् उसमें हमारी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक व्यवस्थाओं में आई विकृतियों की गहन पड़ताल है। किन्तु इस पड़ताल में वे कोई आदर्श नहीं बघारते, समस्याओं के स्रोत को पकड़ते हैं और फिर हलके-तीखे-व्यंजक  अंदाज़ में उन्हें सामने लाने का प्रयास करते हैं। यह कोई रहस्य नहीं कि विश्व-सभ्यता का विकास का सारा विमर्श आज अर्थ-केन्द्रित हो गया है किन्तु रहस्य यह है कि हम यह नहीं समझ पा रहे हैं की विषमताओं और समस्याओं का मूल कारण भी यही है अन्यथा एक ओर सुविधाओं का अम्बार और दूसरी ओर आधी दुनिया के सामने अभाव विकराल—विश्व नेताओं को कहीं तो कचोटता। धर्म जो संस्कृति का आधार होता था— और जैसे ऊपर भी इंगित किया गया है, जिसे मानव ने पशु से मानव बनने की प्रक्रिया में बड़े अध्यवसाय से अर्जित किया था, वह विकृत हो अर्थ-लोलुप और भ्रष्ट मानसिकता का गुलाम हो गया है। मानव-संस्कृति की बात करना आउट ऑफ़ फ़ैशन हो गया है और यदि कोई विमर्श को इस ओर मोड़ने का प्रयास भी करता है तो दकियानूसी कह कर उसकी ठिठोली की जाती है अथवा जीवन की मूल आवश्यकताओं से ध्यान भटकाने की दुर्भि-संधि। अशोक गौतम विमर्श को मानव-धर्म की ओर मोड़ना चाहते हैं और “हवा भरने का इल्म” वास्तव में उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता और अभिव्यक्ति कौशल अथवा ‘इल्म’ का एक और मील का पत्थर है।

समीक्षक : राजेन्द्र वर्मा, “श्यामकला” 
ग्राम : कठार, पत्रालय : बसाल, बसाल रोड, तहसील व ज़िला सोलन, 
हिमाचल प्रदेश, भारत-173211      
 

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