हर युद्ध तू स्वीकार कर - 2

01-11-2019

हर युद्ध तू स्वीकार कर - 2

ज्योति मिश्रा

नींदों से अपने जाग कर,
कर्मों का आँचल थाम कर, 
कर्तव्य पथ पर आगे बढ़, 
तू इक नयी शुरुआत कर॥


सहमा न रह,  तू शोर कर,
सन्नाटों को सब तोड़कर, 
पहचान इक अपनी बना, 
दुनिया को पीछे छोड़कर॥


छू ले गगन, वो उड़ान भर, 
तनिक भी तू, न अभिमान कर, 
ऊँचाइयों से डर न तू, 
इस धरा का भी सम्मान कर॥


कोमल ही न, तू सख़्त कर, 
हृदय पर तू, पत्थर भी रख, 
अपनों की हो,  या परायों की,
हर भावना की क़द्र  कर॥


संकल्प ले, न संकोच कर, 
संघर्ष तू , पुरज़ोर कर, 
सामर्थ्य तेरा अजेय है, 
अराति  को ये प्रमाण कर॥


विकराल वज्रपात पर,
पापियों के उन्माद पर, 
इंसाफ़ की तलवार रख, 
तू क्रांति का आह्वान कर॥


न झुक कभी, न उत्पात कर, 
पराधीनता अस्वीकार कर,
प्रताड़ना, शोषण विरुद्ध, 
हर युद्ध तू स्वीकार कर॥

हर युद्ध तू स्वीकार कर॥

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