01-06-2016

हर कोई अपना था

डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल

हर कोई अपना था, लेकिन कोई भी अपना न था
ज़िंदगी से इस तरह रिश्ता कभी टूटा न था

मुतमईन थे ज़िंदगी से जब कोई ख़्वाहिश न थी
साफ़ था हर अक्स जब तक आइना धुंधला न था

यूँ मुझे मालूम था मिलकर पिघल जायेगा वो
फिर नदी बनकर बहा ले जायेगा सोचा न था

किस तरह डूबा मै उसमे और क्यों उबारा नहीं
मै कोई पत्थर नहीं था, वो कोई दरिया न था

ख़्वाहिशों की भीड़ से निकला तो ये मुश्किल हुई
पास था मेरे सभी कुछ इक मेरा चेहरा न था

किस तरह मिलते कि हम थे अपनी अपनी क़ैद सभी
वो हया और मैं हवस के जाल से निकला न था

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