गुड मोर्निंग सर

15-07-2019

धँसी हुई आँखें, तीखी हलनुमा ठुड्डी, चौड़ी भौंहें और पिचके हुए गाल मुझे एक बेहद ही अजीब सी शक्ल वाला युवा बनाते हैं। ऊपर से मेरा काला रंग मुझे अन्य युवाओं से भिन्न बना देता है। मैं अन्य युवाओं की तरह सुन्दर और गौर वर्ण का नहीं हूँ। यही कारण था कि अक्सर कॉलेज व स्कूल में मेरे सहपाठी मेरी शक्ल-सूरत का मज़ाक उड़ाते थे और मैं हमेशा अपमान का घूँट पी लेता था। धीरे-धीरे मेरे जीवन मैं ये अपमान का ज़हर ऐसा घुलने लगा की मुझे अपनी ही शक्ल से दुश्मनी सी हो गई। मैं अक्सर घर में बस एक ही कोठरी में बैठा रहता और मुश्किल से ही कभी बाहर निकलता। मेरा जीवन अब उस कोठरी तक ही सीमित रह गया। हमेशा कॉलेज से आने के बाद मैं उसी कोठरी में घंटों बैठे रहता। कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता की कहीं मेरी मुस्कुराहटें इस कोठारी में ही क़ैद होकर न रह जाएँ। मैं यदा-कदा जब घर के अहाते में शाम को जाता तो कुछ गौरेया दाना चुगने आतीं। मुझे बस उनसे ही लगाव था। आख़िर वही सब तो मेरी एकमात्र सच्ची दोस्त थीं। उनका मेरे सामने इठलाकर चलना और अगले ही पल अपने पंखों को फैलाकर उड़ जाना। बहुधा मैं ये सोचता रहता कि काश मैं भी इन पक्षियों की तरह एक पक्षी होता। क्योंकि इनमें इंसानों की तरह काले-गोरे का भेद करने की क्षमता नहीं होती। इनमें किसी दूसरे पक्षी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं होता। ये कभी किसी दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करते। ये कभी इंसानों की तरह किसी दूसरे का आकलन शक्ल-सूरत से नहीं करते बल्कि इनके लिए दिल की पवित्रता और सुन्दरता मायने रखती है। लेकिन इंसान तो इनके बिलकुल उल्ट होते हैं। इंसान तो किसी दूसरे इंसान की परख उसकी शक्ल-सूरत, उसके धर्म, लिंग और उसकी जाति से करते हैं। ख़ैर मैं चाहकर भी पक्षी नहीं बन सकता था इसलिए शाम होते ही मैं वापस उस कोठरी में चला जाता। उस कोठरी में, जहाँ अँधेरा छाया रहता था। स्याह काला अँधेरा। शायद अब मुझे अँधेरा ही उजाले से ज़्यादा भाने लगा था क्योंकि अँधेरा काले-गोरे का भेद नहीं करता। उसके लिए सब एक समान है। इस लिए न जाने क्यों मुझे अँधेरा प्यारा लगने लगा। मैं ना चाहकर भी तमस के समन्दर में गोते लगाने को मजबूर था। मेरी दुनिया साहित्य पठन और उन गौरेयाओं तक ही सीमित हो गई थी। मैं जब भी दुखी होता अपनी पुस्तकों को खोल लेता और उन पुस्तकों के किरदारों के साथ साहित्य के गहरे समन्दर में गोते लगाने लग जाता। लेकिन कब तक? अगले दिन ज्योंही सूरज की पहली किरण मेरी कोठरी में प्रेवश करती मैं पुन: सपनों की दुनिया से यथार्थ की दुनिया में आ जाता। मेरी यथार्थ की दुनिया सपनों की दुनिया से काफ़ी अलग थी। जहाँ पुस्तकों में कहानी की नायिका को अच्छे व नेकदिल लड़के ही पसंद आते हैं तो वही हक़ीक़त के संसार में इसके बिलकुल उल्ट होता है। कोई भी लड़की मेरे चाहने के बावजूद भी मुझसे दोस्ती करने के लिए आगे नहीं बढ़ती थी। जो कोई भी थोड़ी बहुत बात करती वो सिर्फ पढ़ाई से सम्बंधित क्योंकि बस शिक्षा ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र था, जहाँ मैं अन्य युवाओं से काफ़ी आगे था। 

धीरे-धीरे वक़्त बिताता गया और मेरी दुनिया उस कोठरी में ही बंद होकर रह गई। मैंने अच्छे अंकों से बेचलर की डिग्री हासिल की और फिर अँग्रेज़ी साहित्य से एम.ए. भी कर लिया। इस दौरान मेरे पिताजी का देहांत हो गया। इस कारण हमारे घर की आर्थिक स्थिति अस्थिर हो गई। 

एक रोज़ मेरी माँ ने मुझे हमारे गाँव से पन्द्रह किलोमीटर दूर एक बाहरवीं तक के विद्यालय में पढ़ाने की सलाह दी। मैंने उनके कहे अनुसार स्कूल को ज्वाइन कर लिया। मुझे बाहरवीं तक अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ाने की एवज़ में पन्द्रह हज़ार रुपये मासिक वेतन देना तय हुआ। मेरा मासिक वेतन मेरी उम्मीद से काफ़ी अच्छा था और इससे हमारे घर की आर्थिक हालातों को पटरी पर लाने की मुझे आशा थी। विद्यालय में मेरे शुरूआती कुछ दिन तो सामान्य रहे लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया मेरे काले रंग की वज़ह से बच्चों ने मेरा मज़ाक बनाना शुरू कर दिया। इस वज़ह से मेरे वही पुराने घाव वापस हरे हो जाते। मेरे ऊपर रोज़ को की गई रंग भेदी टिप्पणियों की वज़ह से मेरा अध्यापन का व्यसाय भी प्रभावित होने लगा। कुछ बड़ी कक्षाओं के लड़कों ने मेरे तरह-तरह की उपनाम भी रख लिए। 

एक रोज़ मैं हमेशा की तरह अंतिम कालांश में बाहरवीं कक्षा में पढ़ा रहा था। मैंने जैसे ही चाक उठाकर श्यामपट्ट पर कुछ लिखना चाहा पीछे से अचानक मुझे किसी ने ’ओबामा’ कहकर संबोधित किया. ’ओबामा’ शब्द के सुनते ही मेरे अन्दर एक अजीब सी सिहरन पैदा हो गई। पीछे की पंक्ति मैं बैठे कुछ लड़कों की शैतानी हँसी ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया। मैं उनसे कुछ कह पता इससे पहले ही घंटी बज चुकी थी। मैं बिना रुके विद्यालय से बाहर आ गया और बस स्टैंड की तरफ़ तेज़ी से बढ़ने लगा। 

शाम की पाँच बजने वाली थी। जनवरी का महीना होने के कारण उत्तरी हवाओं का दौर ज़ोरों पर था। एक कोट व मफ़लर भी ठण्ड के आगे हाथ खड़े कर चुके थे। मैंने जैसे ही नज़रें उठाकर आसमान की तरफ़ देखा तो पता चला पूरा आसमान बादलों से घिरा हुआ है। बादलों की वज़ह से सूरज अस्ताचल में डूबने जा रहा था। जिससे धीरे-धीरे अँधेरा छाने लगा। इस अंधकार की तरह ही तो मेरे जीवन में अन्धकार छा चुका था। तुच्छ सोच वाले इंसानों की रंगभेदी टिप्पणियों ने मुझे भी सूरज की तरह अस्त होने को मजबूर कर दिया था। उस लड़के के द्वारा बोला गया एक ’ओबामा’ शब्द मुझे इस क़द्र तमस के समन्दर में डुबो देगा मैंने सोचा नहीं था। मेरे दिमाग में बस एक ही ख़्याल आ रहा था कि आख़िर उस लड़के ने मुझे ओबामा क्यों कहा? क्योंकि मैं भी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरह अश्वेत हूँ। मैं भी उनकी तरह काला हूँ। ऐसे ही ना जाने कितने ख़्यालों ने मुझे घेरे रखा। उस दिन मुझे देर रात तक नींद नहीं आई। 

अगली सुबह मेरा स्कूल जाने का मन नहीं हुआ लेकिन परिवार में एक मात्र कमाने वाला होने के कारण मुझे विद्यालय जाना पड़ा। अब उन लड़कों का मुझ पर रंगभेदी टिप्पणियाँ करने का रोज़ का काम हो गया। उन्हें मेरा अँग्रेज़ी विषय पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। वो तो बस मेरा तिरस्कार करके ख़ुद को सुन्दर सिद्ध करने पर तुले हुए थे। धीरे-धीरे मेरे मन में मेरी शक्ल-सूरत को लेकर हीनभावना बढ़ती ही चली गई। अब मुझे मेरी हीनभावना ने आईने से दूरी बनाने को मजबूर कर दिया। मुझे अब आईना खाने को दौड़ने लगा। मैं शनैः शनैः रंगभेदी टिप्पणियों के गहरे समन्दर में डूबा जा रहा तो और मुझे उस गहरे समन्दर से हाथ पकड़कर बाहर निकालने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा था। 

अगले दिन मैं फिर से विद्यालय में समय पर पहुँचा। उन लड़कों ने फिर से मेरी शक्ल और मेरे श्याम वर्ण का मज़ाक बनाया। एक बारगी तो मेरा मन कर रहा था की मैं इस विषय में प्रधानाचार्य महोदय से बात करूँ लेकिन अगले ही पल मुझे एक ख़्याल ने रोक लिया कि उन्हें कहने से क्या होगा? क्या वो किसी की सोच को बदल देंगे? वैसे भी मैं इस सम्बन्ध में किन-किन के ख़िलाफ़ लड़ता? वे एक सीमित सोच वाले इंसानों में से एक थे, जिनकी सोच ही दूसरे लोगों को अपने से नीचा दिखाने की होती है। वैसे भी वे सभी मेरे विद्यार्थी थे। इस सम्बन्ध में अगर मैं कुछ भी बोलता तो अनुचित होता। इस लिए मैंने उनसे बिना कुछ कहे ही किनारा कर लेना ही उचित समझा। 

एक बार फिर घंटी बजी और उस दिन मेरे क़दमों की रफ़्तार तेज़ होने की बजाय धीमी थी। क्योंकि मैं अब अन्दर तक टूट चुका था। उन लड़कों के द्वारा मेरी आत्मा को भी अंदर तक झकझोर दिया गया। मैं धीमे-धीमे बस स्टैंड की तरफ़ बढ़ रहा था। आकाश में बादल फिर से छाए हुए थे। बादलों ने एक बार फिर सूरज को समय से पूर्व ही डूबने को मजबूर कर दिया था। मैं निराशा रूपी अंधकार में गुम सा हो गया था। कहीं से भी उम्मीद की किरण दिखाई नहीं दे रही थी। मैंने एक बार फिर से अपनी गर्दन नीचे झुका ली और आगे बढ़ रहा था। मैं जैसे ही नुक्कड़ के पास पहुँचा। मेरे पीछे से किसी लड़की ने मुझे ज़ोर से कहा, “गुड मोर्निंग सर..!”

मैंने जब पीछे मुड़कर देखा तो मेरी आँखों के सामने एक सात वर्षीय लड़की थी। कमल के फूल की भाँति उसका कांतिमय मुख, हिरणी जैसी वाचाल आँखें, एक प्यारी मुस्कराहट, गुलाब के फूल की पंखुड़ियों से होंठ और उनके अन्दर से सफ़ेद मोतियों की माला सी झाँकती उसकी दन्तावली। वाह! कितना प्यारा और कांतिमय रूप था उसका। मैं तो भावविभोर होकर उसे देखता ही रहा गया। ऐसा लग रहा था मानो कोई देवी मेरी आँखों के सम्मुख नन्हे रूप में प्रकट हुई हो। जब मैं कुछ देर नहीं बोला तो उसने मुझे दूसरी बार गुड मोर्निंग बोला। उसके दूसरे गुड मोर्निंग ने मुझे यथार्थ जीवन में ला पटका। मैंने जब पश्चिम की तरफ़ देखा तो सूरज डूब चुका था। अचानक मुझे आभास हुआ कि यह ग़लती से शाम को गुड इवनिंग की जगह गुड मोर्निंग बोल रही है। 

मैंने उससे झूठी मुस्कराहट मुस्कुराते हुए कहा, “गुड मोर्निंग नहीं बेटा... गुड इवनिंग बोलो। देखो उधर... सूरज डूब चुका है। शाम हो चुकी है। अब कुछ ही देर में रात भी हो जाएगी और यह वक़्त शाम का है ना कि सुबह का। इस लिए गुड इवनिंग बोलो न कि गुड मोर्निंग..।”

“ऐसा क्या?”

“हाँ! बिलकुल ऐसा ही। चलो अब कहो गुड इवनिंग...।”

“हाँ! हाँ! गुड मोर्निंग सर...।”

और वह पुन: खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसे हँसते हुए देखकर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसे जानबूझकर ग़लती करने में ख़ुशी महसूस हो। मेरी नज़र अचानक उसकी हाथ की घड़ी पर पड़ी तो मुझे याद आया कि मेरे गाँव जाने वाली बस के निकलने में मात्र पाँच मिनट ही बचे थे। मैंने क़दमों की रफ़्तार को तेज़ कर लिया। वह लड़की मेरे पीछे दौड़ने लगी। उसके कंधे पर लटके हुए बैग में से पैंसिल और पेन की आवाज़ पायल के घुँघरुओं की भाँति आ रही थी। मैंने जब पीछे मुड़कर देखा तो वो मेरे बेहद क़रीब थी। मेरे साथ चलने की इच्छा ने उसे थका दिया था क्योंकि वह मेरे जितनी तेज़ नहीं चल पा रही थी। इस वज़ह से उसकी साँस फूल गई। मुझे नहीं पता कि वह मेरे साथ चलने के लिए क्यों दौड़ रही थी? हालाँकि मैंने तो उसे कोई चोकलेट भी नहीं दी थी। उसे तकलीफ़ न हो इस लिए मैंने अपने क़दमों की रफ़्तार धीमे कर ली। हालाँकि मेरी बस आने में मात्र दो मिनट ही बचे थे। पर फिर भी न जाने क्यों मैं उससे अनायास ही एक मोह की डोर में बँध सा गया था। मैंने उससे बात करने के लिए उससे पूछा, “अच्छा तुम ये बताओ की तुम कौन सी कक्षा में पढ़ती हो?”

“दूसरी कक्षा में..,” उसने मुस्कराते हुए कहा।

“ओह! और तुम्हारा नाम क्या है?”

“मेरा.. मेरा नाम तो दीपिका है। मेरे पापा का नाम अभिषेक पुरोहित है। ममा का नाम सुविता है। आपको पता है... मुझे मेरी दादी अम्मा घर पर क्या बुलाती है? दीपू.. मेरे घर पर मेरा एक छोटा भाई भी है। उसका नाम आदि है। वह बहुत तुतलाता है। और मुझे तो हर वक़्त डिपू..डीडी डिपू डीडी बुलाता है। और.. हाँ..” 

“अरे! बस.. बस.. रुको बाबा। साँस ले लो...” मैंने उसे हँसते हुए कहा। 

मेरे अचानक बात काटने की वज़ह से वह एक बारगी चुप सी हो गई। मुझे लगा की उसे बुरा लग गया होगा। इस लिए मैंने स्थिति को सँभालते हुए उससे पुन: अगला प्रश्न पूछा, “अच्छा तुम ये बताओ तुम्हे कौन सी मैडम सबसे अच्छी लगती है?”

“मुझे? मुझे मरुधर मैडम सबसे अच्छी लगती हैं।” 

“क्यों? वो क्यों अच्छी लगती हैं? क्या वो तुम्हे चोकेलेट्स देती हैं?”

“नहीं तो। चोकलेट तो कभी-कभी देती हैं। हमेशा नहीं। पर वो हमें कभी नहीं मारती हैं और हमें कहानियाँ सुनाती हैं। और हाँ, कभी-कभी तो मेरे दोनों गालों को पकड़कर ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार वाली पोएम भी सुनाती हैं।” 

“ओह! तो ये बात है…,” मैंने पुन: उसकी तरफ़ मुस्कुराते हुए कहा। मैं आगे उससे कुछ बोल पाता उससे पहले ही मेरे गाँव जाने वाली बस का हॉर्न मुझे सुनाई दिया। मैंने उसे बिना अलविदा कहे ही बस स्टैंड की तरफ़ दौड़ लगा दी। 

मैं जैसे ही दौड्ता हुआ बस स्टैंड पहुँचा तो मुझे पता चला की मेरे गाँव जाने वाली गाड़ी जा चुकी थी और अगली गाड़ी आने में अभी एक घंटे का वक़्त पड़ा था। आकाश बादलों से घिरे होने के कारण अँधेरा छा गया। मैं पुन: अपने अतीत में खो चुका था। मुझे बाहरवीं कक्षा के उन लड़कों की रंग भेदी टिप्पणियाँ पुन: याद आने लगी। लेकिन अगले ही पल मुझे दीपिका की बातें याद आने लगीं। कैसे आज वह मुझसे बातें कर रही थी? मानो वह मुझे बरसों से जानती हो। उसकी बातों से, उसका मेरे पीछे दौड़ते हुए पीछा करना और अपने घर और स्कूल की बातें बताना। कितना अद्भुत क्षण था। कितना प्यारा अहसास था वो। दीपिका की बातों को याद करने से अनायास ही मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आ गई। ऐसा लग रहा था मानो रेगिस्तानी ज़मीं पर बरसों से कोई पानी की बूँद गिरी हो। मैं भी तो रेगिस्तान बन गया था। मुझे तो याद भी नहीं था की मैं आख़िरी बार दिल से कब मुस्कुराया था। आज उसने मुझे अनजाने में ही सही, अपने बचपन में पहुँचा दिया था। मैं उसके बारे में ही सोच रहा था की अचानक बस आ गई। 

मैं शीघ्रता से बस के अन्दर चढ़ा और कोने की सीट पर अकेला जाकर बैठ गया। उस रोज़ मैं घर देरी से पहुँचा। लेकिन मेरी माँ की इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं रही। मैंने चाय पी और अपनी कोठरी में चला गया। रात को मुझे दीपिका की बातों से कुछ हद तक दर्द को सहने में आसानी हुई। मेरे मन के नकारात्मक विचार उसकी बातों को याद करने की वज़ह से दूर हो गए। इस कारण मुझे शीघ्रता से नींद आ गई। 

अगली सुबह मैं हमेशा की अपेक्षा जल्दी उठ गया और तैयार होकर विद्यालय समय से पूर्व ही पहुँच गया। मुझे फिर से रंग भेदी टिप्पणियों के ख़िलाफ़ मैदान में उतरना था। लेकिन एक बार फिर मैं इस कार्य मैं असफल रहा। उन लड़कों की तीखी टिप्पणियों ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया और ऊपर से ओबामा शब्द से संबोधन करने से तो मुझे हमेशा की तरह गहरा आघात पहुँचा। लेकिन मैं हमेशा की तरह निराश होने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता था। एक बार फिर घंटी बजी और सभी बच्चे एक-एक कर विद्यालय से बाहर चले गए। मैं हमेशा की भाँति निराश होकर बस स्टैंड की तरफ़ जा रहा था। मैंने अपनी गर्दन को ऊपर की तरफ़ उठाना मुनासिब नहीं समझा। मैं जैसे ही उस नुक्कड़ के क़रीब पहुँचा। पीछे से मुझे किसी ने डराया..

“भाऊ…!”

मैंने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा तो मेरी आँखों के सामने दीपिका थी। पहले दिन की भाँति गुड मोर्निंग के साथ.. और ऊपर से वही बचपन की मुस्कराहट। 

मैंने थोड़ा सा खीजते हुए कहा, “क्या है ये? तुम्हें कितनी बार कहा था मैंने कल की शाम के समय को गुड इवनिंग बोलते हैं ना कि गुड मोर्निंग..”

"ओह! ठीक है सर। गुड मोर्निंग सर.."

और फिर वह पुन: खिलखिलाकर हँस पड़ी। मानो उसे मेरे ग़ुस्से से कोई फ़र्क नहीं पड़ा। उसके साथ एक अन्य लड़की भी थी जो शायद उसकी दोस्त थी। वह भी ताली पीटकर हँसने लगी और उसने भी दीपिका के गुड मोर्निंग बोलने में पूरी सहायता की। मैं कुछ देर के लिए तो उनकी हँसी से असहज हुआ लेकिन फिर मैंने भी उससे मुस्कुराते हुए पूछा, "अच्छा बताओ.. चोकलेट खाओगी?"

"हाँ! है ना तुम्हारे लिए ही नहीं तुम्हारी दोस्त के लिए भी है," मैंने उससे मुस्कुराते हुए कहा।

"अच्छा तो दो ना फिर.."

"हाँ! दे दूँगा लेकिन मेरी एक शर्त है!"

"शर्त! कैसी शर्त?" उसने आश्चर्य चकित होकर मुझसे पूछा। 

"शर्त? शर्त यह है कि आज के बाद तुम मुझे शाम को गुड मोर्निंग नहीं बोलोगी। यह वक़्त इवनिंग का है तो जानबूझकर गलत क्यों बोलती हो?"

"हाँ! ठीक है अब नहीं बोलूँगी। लेकिन पहले आप मुझे चोकलेट तो दो.."

"ठीक है ये लो," मैंने अपनी ऊपर की जेब में से दो चोकलेट निकालीं और एक उसे और दूसरी उसकी दोस्त को दे दी। 

दीपिका ने उस चोकलेट को अपने दाँतों से काटा और दो भागों में कर लिया उसने उस चोकलेट के एक भाग को मुझे पकड़ाते हुए कहा, "आप भी खाओ ना।"

मैं उसे मना नहीं कर पाया। हालाँकि उसके मुँह का कुछ थूक उस चोकलेट पर लगा हुआ था। लेकिन मैंने बिना इसकी परवाह किए उस चोकलेट को खा लिया ओर जैसे ही आगे बढ़ने लगा। मुझे दीपिका की एक बात ने पुन: मुस्कुराने को मजबूर कर दिया। 

उसने चोकलेट खाने के बाद ज़ोर से कहा। "गुड मोर्निंग सर"। और फिर यह कहते हुए खिलखिलाकर पुन: हँस पड़ी। उसकी दोस्त की हँसी भी कुछ कम नहीं थी। दोनों को दुनियादारी से कोई मतलब नहीं था। सड़क पर अन्य बच्चे और लोग भी चल रहे थे लेकिन उन्हें तो बस अपने गुड मोर्निंग की चिंता थी। उन दोनों की हँसी मुझे मन्त्रमुग्ध कर रही थी। कितनी निश्छल और अबोध मुस्कराहट थी उन दोनों की। पहले मुझसे गुड मोर्निंग न बोलने का प्यार से वादा करना और फिर उसे तोड़ देना। कितना अद्भुत अहसास था। इससे भी अद्भुत तो यह था कि मुझे भी उसके वादे के तोड़ने से दुःख होने की बजाय ख़ुशी महसूस हो रही थी। मैंने उसके फिर से गुड मोर्निंग बोलने पर दोबारा नहीं डाँटा। क्योंकि मुझे पता था की वह मेरे लाख समझाने के बावजूद भी गुड मोर्निंग कहना नहीं छोड़ेगी। मैं इस दरमियान उसे ध्यान से देख रहा था। वह अपनी ही रामायण सुनाने में तुली हुई थी। आज मेरे क़दम चाहते हुए भी तेज़ नहीं चल रहे थे। क्योंकि न जाने क्यों उस अबोध बालिका ने मुझे अपनी बातों के मायाजाल में ऐसा बाँध लिया कि मैं अपने आपको छुड़ाना ही नहीं चाहता था। वह मुझसे बात करने के दरमियाँ बार-बार ताली पीटकर हँस रही थी और साथ में अपनी दोस्त के बैग को उठाकर उसकी पीठ पर पटक रही थी। उसे देखकर मुझे लगा रहा था की मेरा भी बचपन लौट आया हो। वह बचपन जो रंग भेदी टिप्पणियों के पहाड़ तले कहीं दब गया था। मेरे बचपन की मुस्कुराहटें नीची सोच व तुच्छ नज़र वाले लोगों के द्वारा मेरे होंठों के अन्दर ही दबा दी गई थी। लेकिन अब वो मुस्कुराहटें दीपिका की वज़ह से शनै:-शनै: वापस आ रही थीं। मैंने भी सोचा मुझे भी क्यों न अब दीपिका की तरह अपनी ग़लतियों पर हँसना शुरू कर देना चाहिए। लेकिन मैने क्या ग़लतियाँ की थी? मैं इस सवाल का जवाब ढूँढ़ता इससे पहले ही दीपिका ने मुझे अलविदा कह दिया।

मैं उस दिन भी समय पर घर नहीं पहुँच सका। रात को मुझे दीपिका की बातें फिर से याद आने लगी। उसकी मुस्कुराहटें, उसका ताली पीटकर खिलखिलाकर हँसना, और अपनी ही बातें बोलते जाना। कितनी अबोध थी वह। कितनी नि: स्वार्थ। अन्य लोगो से कितनी भिन्न। उसने ही तो मेरे दिल की पवित्रता की पहचान की थी। वरना लोग तो मेरी शक्ल देखकर ही मेरे व्यक्तित्व को भी काला समझ लेते। किंतु वह बाक़ी के लोगों से अलग थी। अपनी ही दुनिया में मस्त रहने वाली। आख़िर मैं भी तो उसके जैसा ही तो था। जब बचपन में मुझे कोई लड़का या लड़की मेरे काले रंग की वज़ह से चिढ़ाता था तो मैं उल्टा उन्हीं का मज़ाक बना देता था। मैं उनसे अक्सर हँसते हुए कहता- "मैं तो हूँ कान्हा की तरह श्याम वर्ण और तुम हो भेड़िये की तरह गौर वर्ण अब बताओ श्रेष्ठ कौन हुआ?" और जो शख़्स मेरी मज़ाक बनाता उल्टा वही मज़ाक बनकर रह जाता। उसकी बोलती बंद हो जाती। लेकिन ज्यों-ज्यों मैं बड़ा होता गया मेरी समझदारी भी बढ़ती गई। समझदारी? वही समझदारी जो तुच्छ सोच के लोग मुझे सिखाते थे कि मैं काला हूँ। वही समझदारी और ज्ञान की, गौरवर्ण के लोग श्याम वर्ण के लोगों से ज़्यादा ख़ूबसूरत होते हैं। वे मुझसे ज़्यादा भाग्शाली हैं। क्योंकि भगवान ने उन्हें गोरा और मुझे काला बनाया है। अब मुझे मेरी अपनी ही मूर्खता और ग़लतियों पर हँसी आ रही थी कि मैं कितना मूर्ख था। मैं तो लोगो के द्वारा इतना बुद्धू बना दिया गया था कि जो दुनिया वो मुझे अपनी दृष्टि से दिखाना चाहते थे, मैं तो बस वही देख रहा था। मुझे तो उन सब ने हीन भावना में अँधा कर दिया था। मेरे स्वयं का विवेक तो कहीं खो सा गया था और मैं अपने आपको अँग्रेज़ी विषय का एक ज्ञाता समझ रहा था। लेकिन सच तो यह था की मुझसे ज़्यादा बुद्धिमान तो दीपिका थी जिसे अपने से मतलब था। मैं भी तो उन तुच्छ बुद्धि के इंसानों की तरह दीपिका को हर रोज़ यही ज्ञान देने पर तुला हुआ था कि जैसे ही सूरज डूब जाए तो उस वक़्त को गुड इवनिंग कहते हैं ना कि गुड मोर्निंग। लेकिन ये सब तो उस व्यक्ति पर निर्भर करता है की वह डूबते हुए सूरज को किस दृष्टि से देखता है। अगर दीपिका के लिए डूबते हुए सूरज का मतलब गुड मोर्निंग है और वह उस वक़्त को गुड मोर्निंग कहकर अपने हँसने का माध्यम बना सकती है, तो भला मैं क्यूँ नहीं? मैं क्यों लोगों के द्वारा दिए गए निरर्थक ज्ञान को ग्रहण कर रहा था।। अगर लोगों की दृष्टि में गौरवर्ण का व्यक्ति ही ख़ूबसूरत है तो वो उनकी परेशानी व उनके सोचने का नज़रिया है ना कि मेरा। मेरे लिए तो श्याम वर्ण के लोग ख़ूबसूरत हैं। लेकिन मैंने तो उनकी ही मानी ना कि दीपिका की तरह अपने मन की की। उसे मेरे ज्ञान से कोई मतलब नहीं था। उसके लिए मुझे शाम को गुड मोर्निंग बोलना हँसने का ज़रिया था। वह तो गुड मोर्निंग इस लिए बोल रही थी ताकि ताली पीटकर हँस सके और मैं बुद्धू उसे ज्ञान देने पर तुला था। ठीक ऐसा ही ज्ञान तो लोग मुझे दे रहे थे। लेकिन मुझे उनके ज्ञान की क्या आवश्यकता थी? जब मुझे दीपिका की भाँति पता था की शाम के वक़्त को गुड इवनिंग बोलते हैं न कि गुड मोर्निग लेकिन फिर भी वह उसे गुड मोर्निंग बोल रही थी। मैं भी क्या दीपिका की तरह अपने मन की नहीं कर सकता था? क्या मैं भी लोगों पर भद्दी टिप्पणियाँ करने पर हँस नहीं सकता था? लेकिन बजाय हँसने के मैं तो हीन भावना से भर गया। अब मुझे निर्णय करना था कि मुझे लोगों की रंग भेदी टिप्पणियों का सामना कैसे करना है? मुझे दीपिका के गुड मोर्निंग ने एक नई राह दे दी थी।

अगली सुबह मैं जल्दी उठ गया। मैंने शीघ्र ही स्नान किया और मुस्कुराकर अपने बालों में तेल लगाया। मैंने जैसे ही बालों को सँवारने के लिए आईना उठाया। सच कहूँ तो मुझे काफ़ी वर्षों बाद मेरे चेहरे पर एक ग़ज़ब की चमक दिखी। ऐसा लगा जैसे मैं दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत इंसान हूँ। मैंने अनायास ही मुस्कुरा दिया। आईने में अपने आप को मुस्कुराते हुए देखकर मुझे अपने बचपन की याद आ गई। जब मेरे मोहल्ले की लड़कियाँ और महिलाएँ मुझे कान्हा कहकर पुकारती थीं। लेकिन वो कान्हा समय के पहिए और तुच्छ सोच वाले इंसानों की टिप्पणियों के नीचे रोंद दिया गया था। किंतु अब मुझे दीपिका के गुड मोर्निंग ने पुन: जीवित कर दिया था। मेरी आत्मा में एक नई जान आ गई थी। मैं विद्यालय भी हमेशा की अपेक्षा जल्दी पहुँच गया। मैंने पूरे दिन पूरी लगन से विद्यालय में पढ़ाई करवाई। आज मेरे अन्दर एक नई उर्जा थी। लेकिन जैसे ही सातवाँ पीरियड ख़त्म हुआ अनायास ही मेरा कलेजा बैठ सा गया। मुझे बाहरवीं कक्षा में जाना था और उन लड़कों का सामना करना था। मैंने अपने अन्दर हौसला भरा और कक्षा में प्रवेश किया। मैंने चोक उठाया और श्यामपट्ट पर अपना नाम लिखते हुए सभी विद्यार्थियों से मुस्कुराते हुए कहा, "मेरा नाम विवेक शर्मा है। आप सभी मुझे ओबामा भी बुला सकते हैं।"


मैंने जैसे ही ओबामा शब्द का प्रयोग किया सभी लड़के-लड़कियाँ खिलखिलाकर हँस पड़े। कुछ ही पल बाद आगे की पंक्ति में बैठी आरती नाम की एक छात्रा ने मुझसे पूछा, "ओबामा क्यों सर?

"ओबामा? ओबामा इसलिए क्योंकि मैं उनकी तरह श्यामवर्ण का हूँ," मैंने उससे मुस्कुराते हुए कहा। 

मेरा ऐसे बोलते ही पीछे की कतार में बैठे तीन लड़के खड़े हुए और मेरे पाँव पकड़कर माफ़ी माँगते हुए बोले, "वी आर सॉरी सर। हमें माफ़ कर दो। हमने आपका बहुत मज़ाक बनाया। प्लीज़ सर हमें माफ़ कर दो।" 

उन तीनो की आँखों में पश्चताप के आँसू थे। मैंने स्थिति को सँभालने के लिए उनसे मुस्कुराते हुए कहा, ?अरे! इसमे माफ़ी माँगने वाली कौनसी बात है? मुझे तो बहुत ख़ुशी हो रही है की आपने मेरा उपनाम ओबामा रखा। काश! मैं उनके जितने गुणों वाला इंसान होता। अगर उनके जितने गुण न सही तो उनके मात्र दस प्रतिशत गुण भी मेरे अन्दर होते तो मेरा जीवन तो धन्य हो जाता।" 

आज मैंने बोलना जारी रखा। ना जाने बरसों की टीस कैसे शब्दों के माध्यम से बाहर आ रही थी। आज मेरा एक-एक शब्द उन सभी विद्यार्थियों को रुलाने के लिए काफ़ी था। जिन विद्यार्थियों ने मेरा आकलन मेरे काले रंग से किया था। उन सब में आत्मग्लानी का भाव था. उन सब में मुझे नज़र ऊपर उठाकर देखने की क्षमता नहीं थी। मेरे प्रति किए गए इस दोगले और भेदभाव पूर्ण व्यवहार के पश्चाताप के आँसू प्रत्येक विद्यार्थी की आँखों से झलक रहे थे। पूरी कक्षा में सिर्फ़ मेरी ही आवाज़ गूँज रही थी। मैंने भी उन सब को दिल से माफ़ कर दिया। आख़िर वे सब मेरे ही तो विद्यार्थी थे। वे नासमझ भी थे लेकिन आज उन्हें ज्ञान हो गया था की वो पिछले काफ़ी दिनों से ग़लत कर रहे थे। उन तीनो विद्यार्थियों के अलावा भी सभी विद्यार्थी मुझसे माफ़ी माँग रहे थे। इस लिए मैंने सब से मुस्कुराते हुए बस एक ही पंक्ति बोली..

"अरे! रोना बंद करो! ओबामा खुश हुआ!"

मेरे इतना कहते ही सभी विद्यार्थी खिलखिकर हँस पड़े। मैं भी अपने आपको हँसने से रोक न सका। आज मैं भी बहुत ख़ुश था। शीघ्र ही घंटी बजी और सभी विद्यार्थी अपने-अपने घरों की तरफ़ जाने लगे। मैं भी बस स्टैंड की तरफ़ बढ़ने लगा। आज मेरे क़दमों की रफ़्तार तेज़ थी। मेरे अन्दर जीत की ख़ुशी थी। आज मैंने अपनी नकारात्मकताओं और मेरे मन में मेरे काले रंग के प्रति उपजी मेरी हीन भावना के ऊपर जीत पा ली थी। आज मैं गर्व से सर ऊपर करके चल रहा था। मानो मैं ही इस दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत इन्सान हूँ। मैं ख़ुशी-ख़ुशी आगे चलता हुआ जैसे ही नुक्कड़ के पास पहुँचा। मेरे पीछे से किसी ने ज़ोर से आवाज़ दी। 

"गुड मोर्निंग सर..!"

मैंने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा। मेरी आँखों के सामने दीपिका थी। वही सात वर्षीय दीपिका। जिसका कमल के फूल की भाँति कांतिमय चेहरा, हिरनी के जैसी वाचाल आँखें, गुलाब के फूल की पंखुड़ियों से उसके होंठ, और उनके बीच में से सफ़ेद मोतियों की माला सी झाँकती उसकी दन्तावली। लेकिन अचानक उसके चेहरे मैं हुए एक छोटे से बदलाव ने मुझे मुस्कुराने को मजबूर कर दिया। मैंने उससे मुस्कुराते हुए कहा, "अरे! ये क्या दीपिका तुम्हारा एक दाँत कौन ले गया?"

"ये... ये दाँत तो कल शाम को टूट गया। आपको पता है मेरी दादी अम्मा ने क्या कहा कल मुझे?"

"नहीं तो। क्या कहा?"

"मेरी दादी अम्मा ने कहा कि मैं अब बूढ़ी होने लगी हूँ तो इस कारण अब मेरे धीरे-धीरे सारे दाँत टूट जाएँगे।" 

उसके इतना कहते ही हम दोनों खिलखिकर हँस पड़े। उसकी दोस्त के चेहरे पर भी मेरी तरह ही मुस्हकुराहट थी। आज हम तीनों ख़ूब हँस रहे थे। हमें किसी से कोई मतलब नहीं था। बस हँसने से मतलब था। चाहे वो झूठ का सहारा ही क्यों ना लेना पड़े। हालाँकि मैं तो इतना भी नहीं जानता कि क्या दीपिका बूढी हो रही थी?

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