ग़ल्तियाँ होती रहीं
तुमसे, मुझसे,
इससे, उससे।

ग़ल्तियों पर ग़ल्तियाँ,
मिल - मिल कर बनते गये ग़ल्तियों के पुलन्दे,
बिखरे हैं जो यहाँ से वहाँ तक,
अनन्त की सीमाओं के बिल्कुल निकट तक।

सब हिसाब - किताब ग़लत,
गणनाएँ ग़लत,
संबंध ग़लत,
भावनाएँ ग़लत,
यहाँ तक कि हो गई संवेदना भी ग़लत।

हमने कर दिया प्रकृति को ग़लत
भोजन ग़लत,
पानी ग़लत,
हवा भी ग़लत,
बूढ़ा इतिहास ढो रहा है राजाओं की ग़ल्तियाँ,
बूढ़ा समाज ढो रहा है प्रजाओं की ग़ल्तियाँ।

कहो तो,
परम सत्य, परम आनन्द, परम चिन्मय,
जो कुछ भी हो तुम,
कहो तो,
इन ग़ल्तियों के बीच जीती, मैं, एक ग़लत संज्ञा,
क्या ठीक करूँ?
कहाँ से ठीक करूँ?

कि इस ग़लत - सलत,
गड़ु-मड़ु हिसाब से
कैसे उभरे,
एक सहीं संख्या,
एक सही संज्ञा,
एक सही आवाज,
एक सही भाव,
एक सही नाव,
जो पार ले जाए इस ग़ल्तियों के समुद्र से...
किसी सही टापू पर
पुन: नई ग़ल्तियाँ करने को .........

क्योंकि बहाना है मेरे पास,
आड़ है ग़ल्तियाँ करने की,
कि आख़िर मैं मनुष्य ही तो हूँ।

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