भोर की -
पहली किरन से
पुलक भरा
स्पर्श पाया
जैसे शिशु नींद में
रह - रहकर मुस्कुराया।
धूप उतरी
घाटियों में
ज्यों उतरता
सीढ़ियों से
पीठ पर लादे हुए
बस्ता किताबों का
एक छोटा
अबोध बच्चा
और जादू
रोशनी का
धरा पर
उतर आया।
बह उठी है
भीड़ सड़कों पर
परनाले - सी
छा गई गर्मी
ढलानों पर
और वक्त 
थके चूर - चूर बच्चे - सा
कुनमुनाया।
 

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
कविता
सामाजिक
हास्य-व्यंग्य कविता
पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य कहानी
बाल साहित्य कविता
कविता-मुक्तक
साहित्यिक
दोहे
कविता-माहिया
विडियो
ऑडियो