तम गहन तम
मन तम गहरा
छाया तम है चहुँ ओर यूँ
जैसे बैठा है कोई पहरा
ख़ाली गागर सा संगीत
चाहूँ लिखना मैं एक गीत
किन्तु न जाने स्वर गुम हैं सब
आकारों की ना कोई मंज़िल
कठिन डगर पर चलना जैसे
तम की गठरी को ढो ढो कर
बूढ़े की लाठी सा संग है
सहना, रहना तम ही तम है
ना कोई छेद जहाँ से आये
किरण उजाले की छन कर कोई
जो पत्थर सी मोटी चादर
चीर कर कुछ प्रकाश फैलाये
धड़कनों में आती जाती
साँसों में मेरी बस जाती
छलती मुझको हर दम तू ही
तम की जंग मैं जीत न पाती
आशा है बस अब एक मेरी
मिले द्वार कोई ऐसा मुझको
जिसमें न हो तम का साया
बिजली दौड़े समग्रता में
और न हो तम, गहरे तम में॥

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