फुटपाथ और पगडण्डी

15-03-2014

फुटपाथ और पगडण्डी

सुरेन्द्रनाथ तिवारी

मैं अपनी नौकरी के तहत अल्बुकर्की आया हूँ।

अल्बुकर्की, अमेरिका के न्यू मेक्सिको राज्य का बड़ा, शायद सबसे बड़ा, शहर है। इस होटल में मुझे अपने काम के तहत कोई पाँच रातें बितानी हैं, आज बस दूसरी रात है। होटल बहुत ही आरामदेह है, पर घर की बात ही और है। नए बिस्तर पर नींद नहीं आती, चाहे वह कितना ही आरामदेह क्यों न हो।

आज अभी साढ़े तीन बजे ही नींद खुल गई; शायद इस लिए भी कि न्यू जर्सी में जहाँ मैं रहता हूँ, अभी सुबह के साढ़े पाँच बज गए हैं, क्योंकि वहाँ का समय दो घंटे आगे है। मेरे जागने का आम तौर से यही समय है। पर यहाँ तो अभी साढ़े तीन ही बजे हैं। करवट बदलने और मानसिक उहापोह में मन में कल्पनाएँ चिड़ियों की तरह चूँ चूँ करने लगीं। ………यह चिड़िया इसलिए याद आती है कि मेरे घर के अहाते में सीडर के घने वृक्षों और उनसे लिपटी लताओं का जो घना जंगल है उसमें हज़ारों पक्षी सुबह यूँ ही चूँ चूँ कर मुझे जगाते हैं। खैर, नींद खुली तो सोचा: सुबह घूमने निकल जाऊँगा।

........होटल के विस्तृत परिसर में टहलने के लिए कोई एक मील लंबा फुटपाथ है…। बाहर भी शहर में व्यस्त अट्टालिकाओं के नीचे फुटपाथ का अनंत विस्तार है, जिन पर टहला जा सकता है। …पर मन पता नहीं क्यों फुट-पाथ पर टहलने से मना करता रहा।………. फुट-पाथ का कड़ा कंक्रीट याद आया। ……… जूते चाहिए, बिना जूते के चल नहीं सकते। फिर याद आयी पगडंडी। … पगडंडी पर जूतों की ज़रूरत नहीं है। फुटपाथ और पगडंडी…। चलने के दो अलग-अलग रास्ते !

भोजपुरी में पगडंडी को "खुरपेड़िया" कहते हैं। खुरपेड़िया का अर्थ है वह "पेड़ा" या रास्ता जो गाय के खुरों से बना हो। यह उस रास्ते को कहते हैं जो शाम को, गोधूलि बेला में, लौटती गायों के खुरों से बनता है। इसे मोटा-मोटी अमेरिका में डिअर-ट्रेल कह सकते हैं। आपने कभी सोचा है, .....हमारी संस्कृति गाय या "गो" के इर्द-गिर्द घूमती है ? …गोधूलि , गोकुल, गोपाल, गोबर्धन, गोकर्ण, गोबर, गोमती, गोशाला, आदि आदि।

…यहाँ शहरों के फुटपाथों को देख कर वह "खुरपेड़िया", वह पगडण्डी, बहुत याद आती है।

….कुछ साल पहले जब गाँव गया था तो मधुमालती गाँव के महादेव के मंदिर में पूजा करने जाने का मन हुआ....आश्विन मास का पहला सोमवार... ब्रह्म-वेला में ही उठ कर जब जाने लगा तो किसी ने कहा, आप सड़क से हो कर जाइये, सीधा रास्ता है। पर मैंने ठान ली थी…. आज पगडंडी से जा कर देखता हूँ, उस टेढ़े -मेढ़े, पर परिचित रास्ते से,........ सीधी सड़क तो अभी बनी है…. इस नये रास्ते से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, कितना भी सीधा यह क्यों न हो……… मुझे यह पगडण्डी अपनी लगती है…आत्मीय लगती है।

वह खलिहान वाली पगडण्डी जो बरगद के पेड़ के नीचे से होते हुए भड-भूंजे के चूल्हे के पास से हो कर अहीर-टोली के चौबे भैया के घर के पीछे जाती है, फिर सडक पार करके, भिखम राउत के बगल की गली से होकर, उनकी गोभी के खेत की आर (मेड़) से होती हुई, गन्ने के खेतों में खो जाती है,..... और जब प्रकट होती है तो मेरे अपने अरहर-तीसी के खेतों के बीच अंगड़ाईयाँ लेती हुई सिकरहना नदी के साथ चलने लगती है, महादेव के देवल तक जाने के लिए। .......अगर आप मेरे जैसे देहाती नहीं हैं, तो शायद "देवल" का अर्थ नहीं जानते होंगें। सच मानिए, देवल कोई प्राकृत यानी देहाती शब्द नहीं है, शुद्ध संस्कृत शब्द है। देवल का मतलब है…देवालय। ……..… जहाँ देवता का निवास हो….देव का आलय। मेरी मातृभाषा भोजपुरी में, गावों में, मंदिर कम, देवल ज़्यादा प्रचलित है। ...... मन्दिर तो आप जैसे दिल्ली-बम्बई वाले कहते हैं।

…खैर थोड़ी देर चलने के बाद दूसरे टोले के कोई पंडित जी आते दिखे, अभी थोड़ी दूर थे, कोहरा झीना झीना ही था, पर था तो सही। दूर की चीज़ें स्पष्ट दिखाई नहीं देती थीं। कनइल याने कर्णिकार के फूलों के ऊपर जो ओस सोई पड़ी थी, सुबह की ठंडी हवा से लगा जाग उठी थी……. और बरसने को आतुर थी, मैं ही सामने पड़ गया और फूलों पर सोई ओस की बूँदें झरझरा कर मेरे बालों को सिक्त कर गयी, पता नहीं क्यों, सर्दी सी लगने के बाद भी एक अजीब सुखद अनुभूति हुई, एक अपनापन सा लगा।

मैं धोती की खूँट से अपने चेहरे से ओस की बूँदें हटा ही रहा था कि पंडित जी सामने आ गये। अब मैं पहचान गया। ….अरे, ये तो शास्त्री रामरिख पधेया हैं। शुद्ध संस्कृत में कहें तो ये हैं शास्त्री रामर्षि उपाध्याय …छोटी काया, पर सुन्दर उन्नत ललाट पर त्रिपुण्ड चन्दन और सिर के पीछे धौत-केशों की लम्बी शिखा। …… दूर दराज तक अपने पाणिनि ज्ञान के लिए प्रसिद्ध …, अगर थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी आती तो अवश्य किसी अच्छी नौकरी में रहते। पर देश-भक्ति के आवेश में अंगरेज़ी नहीं सीखी, कहते रहे अगर भारत के प्रति भक्ति है तो हमें हर अंगरेज़ी चीज़ का बहिष्कार करना चाहिए। १९४६ में किसी अंग्रेज़ को भला-बुरा कह दिया, पकड़े गए, पर तब तक अंग्रेज़ों की हेकड़ी ख़त्म हो चुकी थी अतः जल्दी ही छोड़ दिए गये। …उसी झगड़े में वे रामेसर पाँडे से उलझ पड़े थे, क्यों कि रामेसर पाँडे अंग्रेज़ का पक्ष ले रहे थे। रामेसर पाँडे के बाप उसी अंग्रेज़ की निलही कोठी में बड़े वफादार नौकर थे। जब अंग्रेज़ जाने लगे तो कोई सौ बीघा ज़मीन उनके नाम कर के चले गए। इसका असर यह हुआ कि रामेसर पाँडे का परिवार आज़ादी के बाद रातोंरात नौकर से राजा बन गया; और अनपढ़ रामेसर पाँडे संस्कृत कालेज के ट्रस्टी बोर्ड के अध्यक्ष बन गये। तब शास्त्री जी ने अक्खड़ता में अनपढ़ ट्रस्टी वाले संस्कृत कालेज की नौकरी को धत्ता बताया और अपनी छोटी खेती में लग गये। गाँव के लोग उन्हें पधेया जी या पंडी जी (पंडित जी) ही कहते हैं।

आपने समझा न कि पधेया का मतलब है उपाध्याय? भोजपुरी की प्राकृत में बेचारा संस्कृत "उपाध्याय", पधेया बन कर रह गया। असल में जब अंगरेजी सरकार के लोगों ने गाँव के अनपढ़ किसानों से नाम पूछा होगा तो लोगों ने वे नाम बताये होंगे जिससे वे पुकारते होंगे, जैसे पधेया , या शुकुल, या मिसिर,। अगर यही सवाल किसी थोड़े पढ़े लिखे लोगों से किया गया होगा तो जबाब मिला होगा; उपाध्याय, शुक्ल , मिश्र आदि। अंग्रेजों ने, या अंगरेजी में, जैसा जबाब मिला लिख दिया। यहाँ अमेरिका में भी मैंने ये 'प्राकृत' नाम देखे हैं। ओहायो राज्य के एक विधायक थे डा. मिसिर। ये भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे, यहाँ डाक्टर थे। बाद में विधायक बने। ....मैं भी कहाँ बहक गया।

हाँ, तो पंडित जी सामने थे ......पगडंडी कोई फोर-लेन हाई-वे तो है नहीं कि हम दोनों उस पर चलते जाते; मैं अदब में नीचे उतर गया और झुक कर प्रणाम किया।

उन्होंने कहा "खुश रह-अ ", पर पहचाना नहीं, .......कभी-कभार तो गाँव आता हूँ; उस पर सुबह की ओस-भरी धुंध और उस के ऊपर पंडित जी का मोटा चश्मा! सोचा चलता जाऊँ; ऐसे तो आते-जाते बहुत लोग पंडित जी को मिलते होंगे और प्रणाम करके सभी अपने रास्ते चलते रहते होंगें। पर लगता है कि चूँकि उन्होंने पहचाना नहीं, अतः वे रुक गए।

"के ह -अ?।" उनका प्रश्न था। यानी "कौन है?"

मैंने उत्तर दिया।

"आरे बाबू, बहुत दिन का बाद आइल बाड़-अ?" उन्होंने स्नेह से कहा।

मैंने जब से होश सम्भाला है, मुझे याद है वे सदा मुझे स्नेह देते रहे हैं; शायद इसलिए कि मेरे पिता जी उनके गुरुभाई थे और इन्हीं की तरह अक्खड़, ..... और मैं उनके संस्कृत ज्ञान से बचपन से अभिभूत रहा हूँ, अतः इस पारस्परिक स्नेह-श्रद्धा के कारण हम बहुत देर बतियाते रहे। उनका एक नाती, श्यामल, अभी अभी आई.पी.एस. में चुना गया है; यह पंडित जी के लिए ही नहीं मेरे पूरे गाँव के लिए बड़े गर्व की बात थी। पंडित जी ने बड़े गर्व से उसके बारे में बताया।

मैंने पूछा, "श्यामल के ट्रेनिंग कब शुरू होई?" और ऐसे ही कितने प्रश्न और उनके गर्व भरे उत्तर। उनके दामाद जी ने शुरुआत तो सरकारी बैंक की क्लर्की से की थी पर कोई दस वर्ष बाद ही मैनेजर हो गए थे; बेटी शैलजा को भी हाई-स्कूल तक पढ़ाया था, फर्स्ट डिविजन भी थी, पर विवाह पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी होता है गाँव में । शैलजा आगे पढ़ी तो नहीं, पर परिवार में शिक्षा की परम्परा थी, इसी संस्कार के कारण उसने अपने मायके की सरस्वती-साधना की परम्परा को ध्यान रख बच्चों की शिक्षा को प्रधानता दी थी। और भारत के कई शहरों, जहाँ जहाँ पोस्टिंग हुई, बच्चे साथ-साथ गए और उनक बड़ा सुन्दर विकास हुआ। पति की आन्ध्र प्रदेश में कई पोस्टिंग हुई। एक पोस्टिंग के दौरान, वारंगल शहर की सुन्दरता और काकातेयी, भद्रकाली, तथा रामप्पा मंदिरों के स्थापत्य ने शैलजा की किशोरी बेटी मीरा को बहुत प्रभावित किया और वह इंजीनियरिंग की छात्रा बन गयी। ........ मुम्बई के आईआईटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर इ टी एच जुरिच, नेदरलैंड्स; में वह स्थापत्य (आर्किटेक्चर) में मास्टर्स या पी. एच.डी कर रही है। इ टी एच जुरिच में हम जैसे गंवारों के लिए दाखिला असंभव सा है; कहाँ स्थापत्य का यह विश्व -प्रसिद्ध विश्वविद्यालय और कहाँ एक छोटे गाँव की किशोरी बेटी। मुझे जब यह पता लगा था तो मेरा सर गर्व से ऊँचा हो गया था। उसके भाई श्यामल के आई.पी.एस. में आने की बजाय मुझे ज़्यादा गर्व हुआ था जब मीरा इ टी एच में गयी थी। पर आम भारतीय, वह भी गाँव के लोगों को इ टी एच जुरिच का पता भी नहीं है; उनके लिए तो सरकारी आदमी चाहे वह चपरासी ही क्यों नहीं हो, ज़्यादा रोबदार होता है, और यहाँ तो आई.पी.एस. की बात हो रही है।

पंडित जी शायमल की बातें करते रहे, मैं कभी मीरा की उपलब्धियों और कभी इस परिवार की गौरवशाली पाँडित्य-परम्परा के बारे में सोचता रहा; .....किसी ने कहा था कि मीरा चार भाषाएँ; हिंदी, अंग्रेजी, जर्मन तथा तेलुगु तो फर्राटे से बोलती है, इसके अतिरिक्त संस्कृत तो उसकी पारिवारिक परम्परा रही है....नानाजी के साथ उसने "शिव-तांडव" से "शाकुन्तलम्" तक की यात्रा की है ... और भोजपुरी तो मातृभाषा है ही......मैं सोचता रहा की अगर मीरा चाहे तो वह मीरा कुमार, या मीरा शंकर बन सकती है......लोक सभा की अध्यक्षा, या अमेरिका में भारत की राजदूत ...या फिर मीरा नायर .......!!

मीरा पर बात आयी तो कहने लगे, "बेटा, मीरा है तो बड़ी तेज, और उसको छात्र-वृत्ति (स्कालरशिप) भी मिली है कॉलेज से, पर रहने-खाने और टिकट आदि का खर्चा तो अपने ही देना है न। शैलजा ने सारा पैसा बेटे को दिल्ली रख कर पढ़ाने में खर्च कर दिया; जो कुछ बचा है वह मीरा के विवाह के लिए रखा है। अतः सोचा मैं भी थोड़ी मदद कर दूँ; सो पटहेरवा सरेह का ढाई बीघा खेत परती पड़ा था, अब मुझसे खेती होती नहीं; बटाई वाले भी चोरी करते हैं....अतः उसे बेच दिया, और वही पैसा दामाद जी को दे दिया। जो थोड़ा बहुत खेत बटाई पर है, उससे हम दोनों का गुजर चल जाता है ....अब हम कितने दिनों के मेहमान हैं, सब तो उन्हीं लोगों का है, आज या कल....लेकिन मैंने शैलजा और दामाद जी को साफ़ कह दिया कि यह केवल मीरा कि पढ़ाई और उसके विवाह के लिए है, विवाह भी तो ज़रूरी है न? लड़की कितनी भी पढ़ जाय, पर विवाह बेटियों के लिए बहुत ज़रूरी है।

....इसी क्रम में मुझे अपने गाँव वाले भाई की बातें याद आयीं जो कहते हैं की पंडित जी की नतिनी के बारे में कई अफवाहें हैं भैया.... वह किसी अंग्रेज़ से फंस गयी है जो बम्बई में उसका प्रोफ़ेसर था आदि आदि .....गाँव में हर गोरा आदमी चाहे वह जर्मन, फ्रेंच कुछ भी हो...अंग्रेज़ होता है! वैसे ही जैसे ज़्यादातर उत्तर भारतीयों के लिए हर दक्षिण भारतीय "मद्रासी" लगता है, चाहे वह विजयनगरम या बंगलौर का हो, या कोचीन या कोयंबटूर का, सब मद्रासी ही हैं ...... इतने दिनों अमेरिका में रहने के बाद किसी भारतीय कन्या का किसी गोरे लड़के से विवाह को मैंने मन ही मन स्वीकार कर लिया है। मैंने श्यामल या मीरा को देखा नहीं है....पण्डित जी के दामाद को भी नहीं देखा है.....शैलजा को बहुत दिनों कोई ३०-३५ बर्षों पूर्व देखा था...बड़ी नेक, सुन्दर नाक-नक्श वाली कन्या थी पंडित जी की। ...उनकी बिटिया भी सुन्दर होगी....सरस्वती-साधिका तो वह है ही!

मैं कई बातें सुन-गुन रहा हूँ... .. विवाह कि इतनी ज़रूरत बेटियों के लिए ही क्यों ....और धीरे-धीरे पंडित जी यह खेती सचमुच बेच देंगें?... .....क्या यहाँ से सचमुच पंडित जी का नामोनिशान मिट जायेगा?..... आज से पचीस वर्ष बाद मीरा दुनिया के किस देश में रहेगी, श्यामल कहाँ होंगे, पर शायद गाँव में पंडित जी का कोई नहीं रहेगा! उनका पाणिनि-ज्ञान, जिसके बारे में गाँव वाले बड़े गर्व से अपने को "पंडित जी के गाँव आला" कहते थे, क्या सचमुच लोप हो जायेगा? सोचता हूँ, गाँव क्या, भारत में भी, कुछ वर्षों बाद, पाणिनि को जानने वाले नहीं मिलेंगें । ....... सोचता हूँ यह विडंबना हम सबों की है.....मेरी भी तो यही हालत है....कब तक गाँव मेरा अपना है....दस वर्षों बाद मुझे खुद भी इस गाँव में कौन जानेगा? अभी ही धीरे-धीरे लोगों ने मुझे पहचानना बंद कर दिया है....थोड़े ही लोग तो पहचान पाते हैं....बच्चे-किशोर मुझे नहीं जानते, कुछ युवा लोग थोड़ा मेरे बारे में जानते हैं, पर मुझे नहीं जानते, और जो मुझे जानने वाले वृद्ध हैं उनकी आँखें कमज़ोर हो गयीं हैं... मैं अमेरिका में कई भारतीय परिवारों को जानता हूँ जिनकी बहुत खेती थी भारत में....सब छोड़ कर यहाँ बस गए हैं...दशकों हो गए, देखने तक नहीं जाते.....पंद्रह-बीस वर्षों पूर्व वे अपने गाँव के किशोरों के आदर्श थे... .अब उन्हें शायद ही कोई जानता है!

...खैर...पंडित जी खड़े-खड़े थकने लगे थे, चारु-वृत्त तरूण-अरुण सूर्य भी ओस की गहरी धुंध से झाँकने लगे थे; मैंने पंडित जी से विदा ली......" साँझ के दुआरा आएब, अब च-ल-तानी, ना- त- अ देर हो जाई " .....यानी मैं शाम को आपके दरवाजे पर आऊँगा (तब और भी बातें होंगीं।), अब चलता हूँ नहीं तो देर हो जायेगी" । ....पथ में ऐसे ही स्नेहिल तरुवरों से मिलकर "विरल: स कोsपि विटपी " वाला जगन्नाथ का श्लोक बहुत याद आता है!

मैं अहीरटोली पहुँच कर चौबे-भैया के दरवाज़े पर गया......चौबे-भैया, सबके भैया हैं...बड़े-बूढ़े-बच्चे सबके.... सलाम-दुआ हुई...चौबे भैया ने पूछा ...केने के जात्रा बा? .. याने ....किधर की यात्रा है? बताने पर वे कहने लगे कि मैं बहुत दिन बाद आया हूँ और देवल को जाने वाली खुरपेड़िया बदलती रहती है क्योंकि सिकरहना नदी जब उफनती है तो खुरपेड़िया क्या, सड़कों को भी उखाड़ फेंकती है। अत; मैं उनके दस साल के बेटे प्रकाश को साथ लेता जाऊँ वह खेतों के बीच बल-खाती हुई खुरपेड़िया पर मेरा मार्ग दर्शन करेगा। प्रकाश अपने सेल फोन पर अपने मामा से गप्प हाँक रहा था, ....मैं सोच रहा था ...हाँ हाँ , मेरे गाँव में भी विकास तो हुआ ही है....दस साल को छोरा सुबह सात बजे अपने बस-ड्राईवर मामा को कोई १५० किलोमीटर दूर ....हाजीपुर फोन कर जगाता है..... "मामा आज शाम को केले का एक घौद जरूर लेते आईयेगा जब बस इधर ले आईयेगा, आज माँ का व्रत है ।" .....मामा पटना से रक्सौल वाली बस चलाते हैं...हाजीपुर के छोटे केले बड़े प्रसिद्ध हैं...अतः रोज़ ही प्रकाश के घर केले आते हैं...पटना-रक्सौल सड़क पर ही तो है गाँव। गाँव की औरतें चौबाईन की बड़ी प्रशंसा करती हैं....."भाई होखे तो अईसा ....केरा से घर भरा रहता है।" .....केरा मतलब "केला"!!
....अपने पिता के कहने पर प्रकाश मेरे साथ हो लिया!
जब हम चलने लगे तो इस बात का अंदेशा तो था कि मेरी जानी-पहचानी पगडण्डी ने अपना रास्ता बदल दिया होगा, पर हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए, मुझे लगा कि कुछ नहीं बदला है। ....वही बड़े-बड़े घने गन्नों के खेतों में छिपती हुई, सरसों-तीसी-गेहूं के खेतों की मेड़ों पर रेंगती......वही "सिरिसिया" सरेह .....कुछ भी तो नहीं बदला है। मैं चला जा रहा हूँ और वह ठीक "स्पाट" याद करने की कोशिश कर रहा हूँ जहाँ हम कुछ किशोर..... जब गन्ना काटने से थक जाते थे और सूरज सर पर चढ़ कर अपनी गर्म आँखें दिखाने लगता था......बैठ कर सुस्ताते और गन्ने की छाया में गन्ने का "जलपान' करते। ....

.....या जहाँ मसुरी (मसूर-दाल) को काट कर "बोझा" बाँधने के बाद, उस बोझ को लेकर खलिहान का डेढ़ मील का रास्ता तय करने के पहले, बैठ कर तोलते ताकि ज़्यादा भारी "बोझा" धरम महतो के लिए छोड़ दें....वे हम सबों में सबसे ज़्यादा मजबूत थे। ....फिर सर पर 'मुरेठा" यानी पगड़ी, बाँध, बोझे को उठाकर खलिहान की तरफ चल पड़ते.....

......हाँ हाँ, इसी पगडण्डी से, वही "डण्डेर" यानी मेड़, जिस पर "बोझा" के बोझ से हम बहुत संभल कर चलते कि कहीं गिर न जायं......चुहल में एक-दूसरे का बोझा गिरा देते....खूब झगड़ा होता....और इसके पहले कि पीछे से आते हुए कोई बुजुर्ग हमें देख लें और डाँटें, हम झटपट सुलह कर एक-दूसरे की मदद से बोझा उठा कर खलिहान की तरफ चल पड़ते ...हँसते, मुस्कराते ...। हाँ हाँ ...यही वह स्पाट है! "डण्डेर" भी नहीं टूटी है.....सिकरहना की कई साल की बाढ़ भी इसे नहीं डिगा पायी है, ४०-४५ वर्षों बाद भी। ....

....मैं थोड़ी देर रूकता हूँ। अपनी स्नेहिल यादों में डूब, उस "डण्डेर" की मिट्टी को छूने के लिए ....थोड़ी देर वहाँ बैठने का मन होता है। भोजपुरी का एक गीत याद आता है : "निमिया तरे डोली रख दे कहरवा, देखीं तनी गवुआं के लो-ग हे-अ " ।

प्रकाश थोड़ा आगे बढ़ गया था, मुड़कर मुझे देखता है, पूछता है: "का भईल चाचा?"

"कुछो ना हो".... मैं कहता हूँ; "तनी बैठ-अ; थाक गईल बानी"; ......मैं झूठ बोल जाता हूँ.....मुझे कोई थकान नहीं है, बल्कि एक नयी उर्जा का अनुभव होता है। वह हँसता है......"अबहीयें थाक गईलीं? अबहीं त देवल लम्हारा बा।" .........यानी आप अभी थक गए ....देवल तो अभी दूर है।....और मैं बैठ गया, उस मिट्टी से आत्मसात होने ...लगा यहीं बैठा रहूँ......

.......आज सोचता हूँ ....उस मिट्टी में माँ का स्नेह है, उसकी माटी में मिलती काया हमने यहीं देखी थी... पिता जी को भी हम इसी नदी वाले श्मशान पर ले आये थे ....इसी पगडण्डी से। ....इस "खुरपेड़िया" में उनका स्नेह है , उनकी फटकार है, उनका अनवरत आशीष है, ....कहाँ यह ममतामय -स्नेहिल पगडण्डी और कहाँ ये पथरीले फुटपाथ!

 

....पगडण्डी को हवा दुलराती है, मसूर की डालियाँ उससे बतियाती हैं, गन्ने के तनों पर फैली कोमल लम्बे लम्बे हरे पत्तों की छतरी उसे छाया देती है, और नदी के किनारे किनारे चल कर, दो तीन जगहों पर नदी का पानी पीकर -छूकर, देवल के पहले वाली बरगद की जड़ तक जाकर, पगडण्डी ख़तम हो जाती है। ...वही बरगद की जड़ जहाँ मधुमालती गाँव की किशोरियाँ माघ-फागुन में साग खोंटने या घास काटने के बाद आकर सुस्ताती थीं।

मुझे याद आ रहा है - प्रकाश से बतियाते-बतियाते, मेड़ पर बैठे-बैठे , सूरज भगवान् ऊपर चढ़ आये थे। सिकरहना का पानी अब पूरी तरह चमकने लगा था, ....बांस का पुल पार कर उस पार से आती हुई एक स्त्री पर मेरी नज़र पड़ी----उसकी चमकीली साड़ी पूरब के नवोदित सूर्य की पीली लालिमा में खूब चमक रही थी .....

दिनकर जी की "रश्मिरथी" के सातवें सर्ग की आरंभिक पंक्तियाँ अचानक कौंध गयी थी मानस-पटल पर :

"निशा बीती गगन का रूप दमका, किनारे पर किसी का चीर चमका।
क्षितिज के पास लाली छा रही है, अतल से कौन ऊपर आ रही है?"

और कई चित्र इसी तरह मानस में कौंधते रहे...

वाल्मीकि का, रावण-वध के पश्चात, अग्नि में तपी सीता का सौंदर्य-वर्णन.....:

"तरुणादित्य संकाशा तप्त कांचन भूषणाम्,
रक्ताम्बर-धराम वालाम, नील कुंचित मूर्धजाम् ।"

या फिर उर्दू का वह प्रसिद्ध शेर, जिसके शायर का नाम भी मुझे याद नहीं:

"उफक के दरीचों से किरणों ने झाँका, फजा तन गयी, रास्ते मुस्कराये
समटने लगी नर्म कुहरे की चादर, जवां साखसारों ने घूंघट उठाये,
वो दूर एक टीले पे आँचल सा लहरा, तसव्वुर में लाखों दिए झिलमिलाये!"

मैं सोचता रहा सब कितनी सुन्दर कल्पनाएँ हैं! .....वह स्त्री नजदीक आ गयी , वह नदी से सटी पगडण्डी पर अपनी छोटी बेटी की उंगली पकडे चली आरही थी। जैसे जैसे नजदीक आती गयी, उसके गहने दिखने लगे......चमकीली साड़ी, बड़ा सा गोल मंगटीका, पाँव में पायल, हाथ में भारी पंहुंची....शायद महादेव शिव के देवल में आज सोमारी की पूजा है....."कर्पूर गौरम करुणावतारम्" शिव की; ....करूणा के अवतार.... देवों के देव.... महादेव, शिव की! .....उसे शायद हम दोनों का बतियाना सुनायी देता है। वह नदी के किनारे किनारे वाली पगडण्डी से, आँचल से अपना मुँह ढांके आगे निकल जाती है....बच्ची हमें देखती है ...फिर चुपचाप माँ की उंगली पकडे चलती जाती है। उनके थोड़ी दूर जाने के बाद प्रकाश कहता है ...."~ओह पार का धरम महतो के बेटी हई....पाँच बारिस हो गईल बियाह भइला, हर महिना में सोमारी के पूजा करे आवेली ...बाढ़ रहेला तबहिनो ...खूब पैसा कमालन इनकर मरद, फ़ौज में हवलदार हवन।" मैं उसकी बातें सुनता हूँ...गावों में हर आदमी हर आदमी के बारे में बतियाता है ! इस दस साल के छोरे को भी सारी बातें मालूम हैं। ....मुझे अपने जमाने के धरम महतो याद आते हैं....मजबूत गभरू जवान...धरम महतो से सम्बंधित कई कहानियाँ मन में गूँजती हैं... अकेले बड़ी निर्भयता से भरी हुई नदी तैर जाते थे...आदि आदि। ...मैं चुपचाप प्रकाश की बातें सुनता हूँ। ......

सोचता हूँ...इन पगडंडियों में आँचल है, साड़ी है, सिन्दूर है, मंगटीका है, पायल है, पंहुंची है, पंडित जी हैं, उनकी पाणिनि की ऋचाएं हैं....उनकी धौत-शिखा है, उनका भारतीयता पर गर्व है; धरम महतो हैं! ...... यह पगडण्डी कभी नदी से, तो कभी गन्नों से बतियाती है....रात के अँधेरे में सितारे नदी में डोल डोल कर इसे लोरियां सुनते हैं....पूर्णिमा की एकांत रात्रि में यह कभी आकाश के चाँद को तो कभी नदी के चाँद को निहारती चुपचाप सो जाती है....
.......और बेचारा फुटपाथ! उससे कोई नहीं बतियाता...बेचारा पत्थर की छाती लिए सारी दुनिया के जूते सहता है .....कोई स्नेहिल हवा उसे नहीं दुलराती ....बल्कि हजारों कारें अपना काला दूषित धुंआ उस पर उगलती दिन-रात भागती रहतीं हैं ....उसे कभी एकांत मिलता ही नहीं... किसी को उससे बतियाने की फुर्सत ही कहाँ है? कंक्रीट की अनवरत ऊँची उठती अट्टालिकाओं की छाया में बेचारा यह फुटपाथ और भी बौना होता चला जाता है ।

एक बात बार-बार मन में गूँजती है ... मैं जब यहाँ अमेरिका आया था तो सोचा था मैं इस पगडंडी और फुटपाथ के बीच पुल बनूँगा....विकासशील भारत और विकसित अमेरिका के बीच... अपने परिवार के बच्चों को अमेरिकनों जैसा पढ़ा-बढ़ा कर पुनः भारत लौट जाऊँगा...जब हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगा था तो अपने वक्तव्यों में यह मेरा तकिया-कलाम हो गया था...." हमारी पीढ़ी चक्रवर्ती पीढ़ी है, हम बेटों को भारत और बाप को अमेरिका दिखाएँगें...." लोगों को मेरी यह बात बहुत अच्छी लगती थी। ......
हाँ ...वह पुल करीब करीब अपने प्रसृत परिवार के लिए तो बन ही गया....पर मैं यह भूल गया था कि इस पार रह कर वह पुल बनाते बनाते मैं शायद इस पार को ज़्यादा जानने लगा हूँ, और शायद इतने गहरे स्नेह के बावजूद भी "उस पार" अंजाना सा लगने लगा है ...पुल पर कोई रहता तो नहीं है....रहना या तो उस पार है या इस पार।.शरीर, शायद मध्य-वर्गीय सुविधाओं के कारण, यहाँ का होना चाहता है, पर दिल और दिमाग अभी भी 'उस पार' में अटके हुए हैं, वह 'उस पार" कभी नहीं भूलता.... कम से कम पगडण्डी तो नहीं ही भूलती!!

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