20-01-2019

फ़िसादो दर्द और दहशत में जीना

अब्बास रज़ा अलवी

फ़िसादो दर्द और दहशत में जीना
मिला यह आदमी को आदमी से

बुरा कहते हैं हम क्यों क़िस्मतों को
बढ़ी हैं रंजिशें अपनी कमी से

वतन ऐसा जलाया बिजलियों ने
सहम जाते हैं अब हम रोशनी से

जहाँ गुज़रा था एक बचपन सुहाना
वह दर छूटा है कितनी बेदिली से

न जब कोई तुम्हारे पास होगा
बहुत पछताओगे मेरी कमी से

कभी तो यह हक़ीक़त मान लोगे
तुम्हें चाहा है मैंने सादगी से

हुई सब ग़र्क़ वो ख़्वाहिश ‘रज़ा’ की
सुनाएँ किया तुम्हें अपनी ख़ुशी से
 

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