एक विद्रोही शायर- ‘फ़ैज़’

17-02-2012

एक विद्रोही शायर- ‘फ़ैज़’

चंद्र मौलेश्वर प्रसाद

फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ को एक विद्रोही शायर के रंग में देखा जाता है जिन की लेखनी में सामाजिक सरोकार और मजबूरियों का लेखा-जोखा मिलता है। वे एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने कलम ही नहीं बंदूक भी पकड़ी है क्योंकि वे फ़ौज के अफ़सर भी रहे। उनकी जीवन-यात्रा का जायज़ा लें।

सियालकोट के कादिर खां नामक एक छोटे से कस्बे में ३ फ़रवरी १९११ ई. को चौधरी सुलतान मोहम्मद खाँ के घर में एक चिराग़ रौशन हुआ। माँ सुलतान फ़ातिमा ने उस बालक का नाम फ़ैज़ अहमद रखा जो आगे चल कर ‘फ़ैज़’ तकल्लुस से काव्य जगत में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया।

बचपन से ही फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ एक ऐसे ज़हीन मस्तिष्क के मालिक थे जिन्होंने चार वर्ष की छोटी सी आयु में क़ुरान-ए-शरीफ़ कंठस्थ करना शुरू कर दिया था।

बचपन से लेकर अपनी पूरी तालीम पूरी करने तक ‘फ़ैज़’ हमेशा प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण होते रहे। स्कॉट मिशन हाई स्कूल, लाहौर से सन्‌ १९२१ में मैट्रिक पास किया, फिर सियालकोट चले गए। मर्रे कालेज से इंटर पूर्ण कर लाहौर लौट आए। १९३३ में गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेज़ी में एम.ए. करने के बाद अगले वर्ष ओरियेंटल कॉलेज से अरबी में भी एम.ए. किया और अमृतसर पहुँच गए।

१९३४ से लेकर १९४० तक एम.ए.ओ.कॉलेज, अमृतसर में कार्यरत रहने के बाद ‘फ़ैज़’ दो वर्ष तक हैली कॉलेज, लाहौर में अंग्रेज़ी पढ़ाने लगे। इसी दौरान उनकी भेंट एक अंग्रेज़ी महिला मिस एलिस जार्ज से हुई। मिस जार्ज के हुस्न को देखकर शायर का इश्क़ नशे में डूब गया।

बिखर गया जो कभी रंग-पैरहन सरे-बाम
निखर गई है कभी सुबह, दोपहर कभी शाम
चमन में सर्वो-सनोबर संवर गए तमाम
तुम्हारे साया-ए-रुख़सारो-लब में साग़रो-जाम
सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम।

उनका प्रेम परवान चढ़ा और १९४१ में शादी की मंज़िल तक जा पहुँचा।

आबशारों के, बहारों के, चमन-ज़ारों के गीत
आमदे-सुबह के, महताब के, सम्यारों के गीत
यूँ ही गाता रहूँ, गाता रहूँ, तेरी ख़ातिर
गीत बुनता रहूँ, बैठा रहूँ, तेरी ख़ातिर॥

उनकी दो पुत्रियाँ हुईं- १९४२ में सलमा और मुनीजा १९५४ में। ‘फ़ैज़’ को ऐसा लगा जैसे जीवन की आरज़ू पूरी हुई।

कभी-कभी आरज़ू से सहरा में आके रुकते हैं काफ़िले से
वो सारी बातें लगाव की सी, वो सारे उन्वां विसाल के॥

१९४२ में फ़ौज में भरती होकर ‘फ़ैज़’ कप्तान की हैसियत से दिल्ली आ गए और १९४७ में कर्नल पद से इस्तीफ़ा देकर लाहौर लौट गए।

‘फ़ैज़’ के साहित्यिक मियार को देखते हुए पंजाब के धनी व प्रसिद्ध नेता मियां इफ़्तेखारुद्दीन ने अपने अंग्रेज़ी दैनिक ‘पाकिस्तान टाइम्स’, उर्दू दैनिक ‘इमरोज़’ तथा साप्ताहिक पत्रिका ‘लैलो-निहार’ का उन्हें प्रधान संपादक नियुक्त किया।

वे एक नर्म मिजाज़ और नाज़ुक खयाल के व्यक्ति थे। किसी ने भी उन्हें ऊँची आवाज़ में बात करते हुए या बहस करते नहीं सुना था।

ले नासेह! आज तेरा कहा मान जाएँ हम
दिल को मनाएँ हम कभी आँसू बहाएँ हम॥

                ***                        ***                        ***

तुम नाहक टुकड़े चुन-चुन कर
दामन में छुपाये बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो॥

 ‘फ़ैज़’ जीवन के जिस दौर से गुज़रे, उसमें उन्होंने ने भूख, गरीबी, गुलामी और शोषण को करीब से देखा। उनके मस्तिष्क में कई प्रश्न उठते। किसान को अपने खेत में खून-पसीना एक करते देखा पर बदले में उसे क्या मिलता है? यह प्रश्न उन्हें उद्वेलित करता है।

ये हसीं-खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
किस लिए इन में फ़कत भूख उगा करती है
अपने मौज़ू-ए-सुखन इनके सिवा और नहीं
तबअ-ए-शायर का वतन इनके सिवा और नहीं।

उसी प्रकार मज़दूरों की मजबूरी से भी वे वाकिफ़ थे। अपना खून टपका कर उन्हें क्या मिलता है? यह सोच उनका खून खौल उठता-

जब भी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाह-राहों पे गरीबों का लहू बिकता है
आग सी सीने में रह-रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पे मुझे काबू ही नहीं रहता है।

अपने अतराफ़ इस प्रकार का शोषण देख ‘फ़ैज़’ का दिल शीशे की तरह टूट जाता है - हाँ, शीशा जो टूटता है तो फिर नहीं जुड़ता!

मोती हो या शीशा, जाम कि दर
जो टूट गया सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया सो टूट गया।

फिर भी, उदासी के इन काले बादलों में शायर को तदबीर की सुनहरी किरणें भी दिखाई देती हैं।

मेरा दिल ग़मगीन है तो क्या, ग़मगीं ये दुनिया है सारी
ये दुख तेरा है न मेरा, हम सब की जागीर है प्यारी ...
क्यों न जहां का ग़म अपना लें बाद में सब तदबीरें सोंचे
बाद में सुख के सपने देखें, सपनों की ताबीरें सोंचे।

इन्हीं तदबीरों से जब यही मज़लूम बेदार हो जाएँगे, तो ‘फ़ैज़’ सोचते हैं कि उन्हें अपना हक लेने से कोई नहीं रोक सकेगा।

ये मज़लूम मखलूक़ गर सर उठाए
तो इंसां सब सरकशी भूल जाए
कोई इनको अहसासे-ज़िल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे॥

कदाचित यही कारण था कि उनकी रचनाओं में समाजवादी विचारों की बहुतायात मिलती है।

जब कहीं बैठ के रोते हैं बेकस जिनके
अश्क़ आँखों में बिखरते हुए सो जाते हैं
नातुवानों के निवालों पे झपटते हैं बाज़
बाजू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
जिस्म पे कैद है, जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फिर महबूस है, गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मेयाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र, कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं।

इन्हीं विचारों के कारण ‘फ़ैज़’ को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। हुआ यूँ कि १९५१ में, जब चौधरी लियाकत अली खां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे, तब कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता सैय्यद ज़हीर को ‘फ़ैज़’ के साथ पाया गया जब दोनों शायर मित्र अन्य दो फौजी अफ़सरों के साथ देखे गए। उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया जो ‘रावलपिंडी कांस्पिरेसी केस’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘फ़ैज़’ को चार वर्ष तक कैद में रखा गया था जिसमें से ३ माह की कैद-ए-तन्हाई भी शामिल थी।

मताअ-ए-लौहो-कलम छिन गई तो क्या ग़म है
कि खूने-दिल में डुबो ली है उंगलियाँ मैंने
ज़बां पे मुहर लगी है तो क्या रख दी है
हर एक हल्का-ए-ज़ंजीर में ज़ुबां मैंने॥...


कोई पुकारो कि उम्र होने आई है
फ़लक को काफ़िला-ए-रोज़ो-शाम ठहराए
सबा ने फिर दरे-ज़िंदा पे आके दी दस्तक
सहर करीब है दिल से कहो न घबराए॥

इसी कैद के दौरान ‘फ़ैज़’ ने कई रचनाएँ लिखी जिन्हें ‘दस्ते-सबा’ के नाम से प्रकाशित किया गया। इस दौरान इतनी राजनीतिक उथल-पुथल होती रही कि सरकारें तेज़ी से बदलीं। नतीजा यह हुआ कि मुकदमा पूरा हुए बगैर २० अप्रैल १९५५ को ‘फ़ैज़’ रिहा कर दिए गए।

अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िंदानों की खैर नहीं
जो दरिया झूम के उठेंगे, तिनकों से न टाले जाएँगे॥...

वो बात सारे फ़सने में जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है
चमन पे ग़ारते-गुलचीं से जाने क्या गुज़री
कफ़स से आज सबा बेकरार गुज़री है॥

अपने इन्हीं विचारों के कारण ‘फ़ैज़’ को १९५८ में फिर एक बार ‘सुरक्षा एक्ट’ के तहत गिरफ़्तार किया गया पर अप्रैल १९५९ में रिहा कर दिया गया।

जंग ठहरी है कोई खेल नहीं है ऐ दिल
दुश्मने-जां है सभी, सारे के सारे क़ातिल
ये कड़ी रात भी, साये भी, तन्हाई भी
दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिल।

इस राजनीतिक ऊहापोह से तंग आकर ‘फ़ैज़’ लंदन चले गए। तब उनके मन में यही विचार उठे होंगे-

दोनों जहां तेरी मुहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिल फ़रेब है ग़म रोज़गार के॥

दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है॥
भीगी है रात ‘फ़ैज़’ गज़ल इब्तेदा करो
वक़्त सरोद दर्द का हंगामा हो तो है॥

जब यह ग़म की शाम गुज़र गई और उम्मीद की सुबह नज़र आई तो ‘फ़ैज़’ फिर अपने वतन लौट आए।

दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं
जैसे बिछुड़े हुए काबे में सनम आते हैं।

१९६२ में जब ‘फ़ैज़’ लौटकर कराची पहुँचे तो उन्हें अब्दुल हारूं कॉलेज का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया। सैय्यद सज्जाद ज़हीर की मृत्यु के बाद रूसी सरकार की एफ़्रो-एशियन राइटर्स फ़ेडरेशन की बागडोर ‘फ़ैज़’ के हाथों में आई। इसी फ़ेडरेशन की बेरूत से छपने वाली पत्रिका ‘लोटस्‌’ के वे सम्पादक भी रहे। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए रूस सरकार ने उन्हें १९६२ में लेनिन पुरस्कार से सम्मानित किया था।

अपने बुढ़ापे के दिनों में ‘फ़ैज़’ को दमे का रोग इस कदर सताने लगा कि वे वापिस लाहौर लौट गए।

देखे है कौन-कौन ज़रूरत नहीं रही
कूए-सितम में सब को खफ़ा कर चुके है हम
अब अपना इख्तियार है चाहें जहाँ चले
रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम॥

रोग हद से ज्यादा बढ़ गया और साँस लेने में दिक्कत होने लगी।

बोल ये थोड़ा वक्त बहुत है
जिस्मो-ज़ुबां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले॥

‘फ़ैज़’ को लाहौर के मेयो अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उन्होंने २० नवम्बर १९८५ के दिन इस संसार को अलविदा कहा।

गुलों में रंग भरे बादे-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले॥

आओगे मेरी गोर पे तुम अश्क़ बहाने
नौखेज़ बहारों में हसीं फूल चढ़ाने
माज़ी पे नदामत हो तुम्हें या कि मसर्रत
ख़ामोश पड़ा सोएगा वामांदा-ए-उल्फ़त॥ 

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