एक छोटा सा कारवां

01-12-2019

एक छोटा सा कारवां

राहुलदेव गौतम

घर के अँधेरे में,
जब चिराग़ जलता है।
जैसे किसी कोने में,
कोई मुस्कुरा देता है।
लाज़मी है कि हम अँधेरों के गुलाम हैं,
लेकिन उसमें मेरा हक़ है।
जिसके तख़्त पर,
जीना मेरे बस में है
मरना मेरे बस में है।
ये जो दीवार है
उसकी एक तरफ साँसें हाँफ रहीं हैं।
जिसका ताप मुझे मेरी साँसों में,
महसूस हो रहा है।
मन के कारवां तक,
तुमने जो मशाल जलाई है।
उसी के सहारे,
मैं बेपनाह चला जा रहा हूँ. . . .

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