20-02-2019


खो गई है
एक बच्चे की हँसी
यहीं कहीं इस भीड़ में।
कलियों से होंठों पर
जड़ दी गई हज़ारों कीलें
कँटीले विज्ञापनों की -
जिनमें प्रतिनायक के
टेढ़े-मेढ़े चेहरे हैं
और हैं उधार ली गई आवाज़ें
मकड़जाल में लिपटीं -
बेहुदी आकृतियाँ
खोखली हँसी
आपाधापी मचाती
दृष्टिहीन भगदड़ -
इसी में चिथ गए हैं
अंकुर - से नन्हें पाँग।
बुझ गई है दृष्टि
गले में फँसकर 
रह गई है चीख
यहीं इसी अंधी भीड़ में
गुम हो गई
एक बच्चे की दूधिया हँसी
हो सके तो
ढूँढकर ला दीजिए।
 

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक
कविता
नवगीत
लघुकथा
सामाजिक
हास्य-व्यंग्य कविता
पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य कहानी
बाल साहित्य कविता
कविता-मुक्तक
दोहे
कविता-माहिया
विडियो
ऑडियो