एक बार फिर से

अनिल खन्ना

पहले
सिर्फ ख़्वाब थे,
फिर हक़ीक़त बने,
हक़ीक़त से
दो जिस्म इक जान बन कर
हवा में उड़ते हुए
आसमान छूने लगे,
सागर की गहराई नापते हुए
मोती चुनने लगे,
मुट्ठी में प्यार का गुलाल भरते हुए
फ़िज़ा में रंग बिखेरने लगे,
साज़ों पर नई धुन छेड़ते हुए
नग़्में गुनगुनाने लगे।

धीरे-धीरे
जिस्म ढलने लगे,
रातें लम्बी और
दिन छोटे होने लगे,
फ़िज़ा के रंग फीके पड़ने लगे,
साज़ों के तार ढीले होने लगे,
थके–थके से अल्फ़ाज़
अपना मतलब खोने लगे।

देखते-देखते
प्यार की किताब पर
धूल जमने लगी।
रेंगती हुई ज़िंदगी
ऊबने लगी।

इसके पहले कि
हम एक दूसरे के लिए
महज़ एक "आदत"
बन कर रह जाएँ,
चलो
दिल की गिरह खोलते हैं,
बुझती हुई आग को
दोबारा सुलगाते हैं,
एक बार फिर से
ख़्वाब बन जाते हैं।

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