एक अनाथ पत्र

शेष अमित

किताबों के शेल्फ के,
सबसे आख़िरी ताख़े पर,
कुछ फ़ाइलें हैं, धूल की सलेटी चादर ओढ़े,
इन फ़ाइलों में बंद कागज़ातों को
वह अपना हिस्सा नहीं मानता,
पर मानने से ही तो नहीं होता,
कुछ रहती हैं हर चौराहे पर सनद की तरह,
रेगिस्तान में बाढ़ की तरह चढ़ आया था वह हिस्सा एक दिन-
रूख़े हाथों और पसीजे दिल से वह,
झाड़-खोल करने लगा,
कुछ पेंसिल स्केच,
अख़बार की कतरनें, पुराने नुस्खे-
इम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज की पुरानी रसीदें
जो अपने पीलेपन में,
बहते मवाद का सूख जाना था,
इन्हीं में दिखी वह चिठ्ठी,
जो डायरी का एक फटा पन्ना था।
चार फ़ोल्ड में सादा और उदास था,
उस सादे में गोलाई हरफ़ें झाँक रहीं थी।
रूख़े हाथ काँपें और आँखों में हल्का कुहासा उतर आया,
वह तो सारी चिठ्ठियाँ जला चुका था।
जब कहीं कुछ नहीं रह गया था,
एक बार, दो बार, कई बार-
हरफ़ों के जंगल में टहलने लगा,
वह चाहता तो चिंदियाँ कर देता उस उदास पन्ने को,
पर नहीं उसे मालूम था,
इस चिठ्ठी को उसे कई बार पढ़ना होगा,
गहरी रातों में, ठिठुरती सर्दी में
बारिश में, दुख में, मौज में
एक आदमी को अनायास ही-
कितनी बार बन जाना पड़ता है।
एक अनाथ पत्र। 

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