दो घूँट पानी

01-01-2020

अपने सपनों को साकार करने के लिए मुझे मायानगरी मुंबई में आए हुए 3 साल हो चुके थे। इन 3 सालों में मैंने अपने पैतृक शहर चुरु (राजस्थान) की ओर एक बार भी रुख़ नहीं किया था। करता भी कैसे। वैसे भी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक स्क्रिप्ट राइटर का काम भी तो उलझनों व व्यस्तताओं वाला होता है। दिनभर कंप्यूटर स्क्रीन के आगे बैठकर स्क्रिप्ट टाइप करते रहो और जब थक जाओ तो कॉफ़ी पीकर फिर शुरू हो जाओ। वैसे भी मैंने सपना भी तो यही देखा था। मेरे गाँव से आने के पीछे का मुख्य उद्देश्य भी मेरा यही था। इन 3 सालों में मेरे गाँव में क्या-क्या बदला मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था। 15-20 दिनों में माँ बात हो जाती थी। दोस्त तो वैसे भी मुझे घमंडी कहने लगे थे क्योंकि मैं व्यस्तता के कारण उनके कॉल नहीं ले पाता था। बस एक विभु ही था जो अपने मन की भड़ास महीने में एक-दो बार निकाल लेता था। उसकी नज़र में तो मैं एक रोबोट बन चुका था।

ख़ैर, हमेशा की तरह एक रोज़ मैं थका हारा में रात की क़रीब 9:00 बजे अपने किराए के मकान पर पहुँचा तो अचानक मेरे फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर मेरी माँ का नंबर दिखाई दे रहा था। मैंने पिछले 9 दिनों से उन्हें फोन नहीं किया। शायद आज मुझे डाँट पड़ने वाली थी।

"हेल्लो! माँ।"

"हेल्लो के बच्चे कितने दिन हो गए तुझे? एक फोन तक नहीं कर सकता था?"

" अब तुम्हे क्या बताऊँ माँ? एक नया सीरियल मिला है। तो..."

"बस! बस!, अब ज़्यादा मत बोल 5 दिन बाद रेणु की शादी है। तू गाँव आ रहा है ना?"

"माँ..."

"अब कोई बहाना नहीं चलेगा। सगा भाई मानती है वो तुझे। वह बोल रही थी अगर तू नहीं आया तो वह शादी ही नहीं करेगी।"

"अच्छा!"

"हाँ! और हाँ, मुझे नहीं पता अगर नाराज़ हो गई तो तेरी ख़ैर नहीं। इसलिए चुपचाप कल तक घर आ जाना। वैसे भी पाँच-छह दिनों की ही तो बात है।"

"हाँ! ये तो है। ठीक है माँ मैं कोशिश करूँगा।"

" कोशिश नहीं पक्का आना है, समझे!"

इस बार हर बार की तरह माँ का निवेदन नहीं आदेश था। ऐसे में टालना मेरे बस की बात नहीं थी।

"अच्छा! ठीक है माँ मैं कल शाम तक घर पहुँच जाऊँगा।" मैंने अपनी माँ से कहते हुए फोन कट कर दिया और अपना सामान पैक करने लगा।

रेणु मेरी मुँहबोली बहन थी। बचपन से ही हम दोनों साथ रहे थे। एक ही स्कूल में पढ़ते थे। वह द्वितीय श्रेणी की अध्यापिका बन गई और मैं...? मैं इन कामों में उलझ गया। या यूँ कह लो कि अपनी पसंद का काम कर रहा था। कपड़े पैक करने के बाद मैंने अपनी घड़ी की तरफ़ देखा तो 10:00 बजने को थे। जयपुर जाने वाली फ़्लाइट का समय सुबह 4:00 बजे का था। मैंने तुरंत ऑनलाइन टिकट भी बुक करवा ली। अपने ज़रूरत का अन्य सामान बैग में डालने के पश्चात मैं आराम करने के लिए सोफ़े पर लेट गया। मैंने टैक्सी वाले को भी फोन कर दिया ताकि वह मुझे समय रहते एयरपोर्ट छोड़ दे। कुछ ही देर में थकान की वजह से मेरी पुतलियाँ भारी होने लगीं। लेकिन मुझे यह ज़रूर ध्यान था कि मुझे फ़्लाइट पकड़नी है। 

क़रीब 3 घंटे बाद मुझे आभास हुआ कि कोई मुझे आवाज़ दे रहा है। मैंने अर्द्धसुप्तावस्था में ही खड़ा होकर देखा तो टैक्सीवाला आ चुका था। हालाँकि मेरी आँखों की पुतलियाँ अब भी भारी थीं और इस कारण मुझे सब धुँधला- धुँधला सा दिखाई दे रहा था। मैंने टैक्सी में अपना सामान रखा और एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गया। एयरपोर्ट से मैंने कब फ़्लाइट पकड़ी और कब जयपुर पहुँच गया मुझे याद नहीं रहा। आख़िर मेरी नींद अभी पूरी नहीं हुई थी। मैंने जयपुर से चुरू के लिए गाड़ी पकड़ी और अपनी नींद पूरी करने के लिए सीट का सहारा लेकर लेट गया। हालाँकि बस में क्या हलचल हो रही थी मुझे ढंग से याद नहीं रहा।

"अरे! भाया, उठणो कोनी के? गाड़ी चुरू बायपास आ गी है। (अरे! भाई, साहेब उठना नहीं है क्या? चुरू बायपास आ गया है।)" बस कंडक्टर ने शेखावाटी लहज़े में मुझसे कहा। मैंने अपना सामान उठाया व अर्द्धबेहोशी की हालत में ही बस से नीचे उतर गया। इधर-उधर देखा तो मैं आश्चर्यचकित हो गया। शहर के बाहर का नज़ारा अब पूर्णतया बदल चुका था। आसमान धुँधला-धुँधला सा दिखाई दे रहा था। शाम के क़रीब 4:00 बजने वाले थे। लेकिन सूरज अब भी आग उगल रहा था। सड़कें भट्टी की तरह जल रहीं थीं। मेरा गला प्यास की वजह से सूख चुका था। मैंने पानी की तलाश में इधर-उधर नज़र दौड़ाई लेकिन दूर-दूर तक जल का कोई स्रोत नज़र नहीं आ रहा था। मैं शहर से बाहर था। ऐसे में पानी की बंद बोतल का मिलना भी मुश्किल था। आख़िरकार बिना पानी पिये ही मैं गाँव जाने वाली बस का इंतज़ार करने लगा। क़रीब 20 मिनट बाद हमारे गाँव जाने वाली वही पुरानी जानी-पहचानी बस शहर की मुख्य सड़क से आ रही थी। मैंने बस को रोकने के लिए हाथ से इशारा किया। बस में मात्र 5 से 6 ही सवारियाँ थी। मैंने मुश्किल से अपना सामान बस में रखा। मेरी आँखें नींद ना पूरी होने की वजह से अब भी पूरी तरह से खुल नहीं पा रहीं थीं। ऊपर से प्यास की वजह से मैं बेहाल था। बस पुन: चल पड़ी। बहुत ज़ोर की प्यास लगी होने के कारण मैंने बस में ही पानी की तलाश में इधर-उधर नज़र दौड़ाई। लेकिन बस में किसी के भी पास पानी की बोतल नहीं थी। मैं निराश होकर पुनः बैठ गया। अब मैं घर पहुँचने के इंतज़ार के अलावा कुछ नहीं कर सकता था। बस अपनी धीमी रफ़्तार में गाँव की तरफ़ बढ़ रही थी। टूटी हुई खिड़की से लू अंदर आ रही थी। बाहर का नज़ारा देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। पिछले तीन सालों में यहाँ का वातावरण बहुत बदल चुका था। जहाँ पहले लोगों के खेतों में रोहिड़ा व खेजड़ी के पेड़ बहुतायत में नज़र आते थे। अब गिने-चुने ही दिखाई दे रहे थे। यहाँ तक कि कई खेतों में तो हरे पेड़ ही कटे पड़े थे। आषाढ़ का महीना था लेकिन आसमान में बादल का एक भी टुकड़ा दिखाई नहीं दे रहा था। खेतों में इंसानों का नामोनिशान नहीं था। मैं यह सब देखकर दु:खी हो गया। आख़िर इतने पेड़ काटने की वजह से ही तो बारिश नहीं हो रही थी। अगर समय रहते पेड़ों की कटाई को नहीं रोका गया तो परिणाम भयानक होंगे। किंतु लोगों का क्या है! उन्हें तो बस अपने फ़ायदे से मतलब है। वैसे भी लोग प्रकृति का दोहन बिना किसी रोक-टोक के या सोचे समझे करते हैं। यही कारण है कि कभी जिस प्रदेश में ठीक-ठाक बारिश होती थी। आज वहाँ सूरज आग उगल रहा था। ज़मीन भट्टी की तरह तप रही थी। मैं बाहर प्रकृति के बदले हुए परिवेश को देख रहा था कि अचानक ड्राइवर ने बस के ब्रेक मारी। मैंने नज़रें उठाकर देखा तो पता चला बस मेरे गाँव जाने वाले रास्ते की सीध में खड़ी थी। बस स्टैंड से मेरा गाँव क़रीब 1 किलोमीटर दूर था। ऐसे में मुझे पैदल ही जाना था। मेरे गाँव के बस स्टैंड पर उतरने वाला सिर्फ़ मैं ही था। क्योंकि बाक़ी की सवारियाँ दूसरे गाँवों की थीं। शाम के क़रीब 5:00 बजने वाले थे। किंतु लू के थपेड़े मुझे अब भी महसूस हो रहे थे। प्यास की वजह से मेरा कंठ भी सूख चुका था। इस कारण मैंने जल्दी-जल्दी घर की तरफ़ क़दम बढ़ाए। खेतों में घास का एक भी तिनका नज़र नहीं आ रहा था। मैं किसी टाँके पर जाकर पानी पीना चाहता था। किंतु दूर से ही टाँकों की स्थिति को देखने के बाद मुझे आभास हो गया था कि बारिश न होने के कारण इनमें पानी नहीं है। कंधे पर भारी बैग, यात्रा की थकान और ऊपर से प्यास मेरे घर तक पहुँचने में मुश्किलें पैदा कर रहे थे। मैं जैसे-तैसे करके गाँव में पहुँचा। बारिश न होने के कारण गाँव की चौपाल के अधिकांश पेड़ सूख चुके थे। चौपाल में स्थित पानी की टंकी भी सूख चुकी थी। जो कुछ मवेशी गाँव की चौपाल में थे वे कमज़ोर नज़र आ रहे थे।

शाम होने के बावजूद भी गाँव की चौपाल व गलियों में चहल-पहल नज़र नहीं आ रही थी। प्यास की वजह से मैं बेहाल था। कुछ ही देर में अपने घर पहुँचा। मेरे घर में मुझे हमारी झूमल (गाय) नज़र नहीं आ रही थी। घर के सभी कमरों के दरवाज़ों पर ताले लगे हुए थे। मैंने सोचा शायद माँ-बाबा दोनों रेणु के घर ही होंगे क्योंकि उनके घर में मेहमान आने शुरू हो चुके होंगे। मैंने अपना बैग उतारा और घर में पानी की तलाश करने लगा। बाहर कोई भी पानी का घड़ा नज़र नहीं आ रहा था। मेरे घर में बने एक मात्र टाँके के मुहाने पर ताला लगा हुआ था। मेरे पास रेणु के घर जाने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था। मैंने अपना सामान अपने घर के आँगन में रखा और रेणु के घर की तरफ़ चल पड़ा। कुछ ही देर में मैं रेणु के घर पहुँच चुका था। घर के मुख्य दरवाज़्र को जब मैंने खोला तो देखा कि घर के आँगन में दस-बारह औरतें घूँघट निकाले राजस्थानी गीत गा रहीं थीं। मेरा दोस्त विभु मेरे अन्य दोस्तों के साथ घर की एक दीवार के पास खड़ा बातें कर रहा था। रेणु के घर में आए दो मेहमान उसके घर के मेहमान कक्ष के आगे पड़ी चारपाई पर बैठे बातें कर रहे थे। मेरे पिताजी व माँ मुझे घर के बाहर दिखाई नहीं दे रहे थे। प्यास व थकान की वजह से मेरा बुरा हाल था। मेरी आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा। किसी की भी नज़र मेरी स्थिति पर नहीं पड़ी। पानी मँगवाने के लिए मैंने मुख्य दरवाज़े से ही विभु को आवाज़ लगाईं।

"व...व.. विभु... पानी"

मेरी आवाज़ सुनकर विभु पीछे की तरफ़ मुड़ा।

"अरे! आदि, तू…,” मुझे देखकर विभु ख़ुशी के मारे ज़ोर से बोला। उसने दौड़कर मुझे गले से लगा लिया। मुझे उसके आलिंगन से ज़्यादा पानी की आवश्यकता थी।

"तू तो भूल ही गया था हमें?" विभु ने कटाक्ष किया।

"प.. प.. पानी पिला न विभु," मैंने पुनः कहा

"अरे! अभी लाया भाई। तू यहाँ बैठ चारपाई पर।"

थकान व प्यास के मारे मेरे पाँव लड़खड़ा रहे थे। मुझे सबकुछ धुँधला-धुँधला सा दिखाई दे रहा था। मैं चारपाई पर बैठा तब तक मेरे बाक़ी के दोस्त भी आ चुके थे।
"कैसा है रे आदि तू?" अंकित ने पूछा।

 " ठ... ठीक हूँ।" ज़ोर की प्यास लगने की वजह से मेरे लफ्ज़ मेरे होठों में ही अटक रहे थे।

"विभु पानी ला ना यार," मैंने खीजते हुए कहा।

"अरे! भाई बस अभी लाया," विभु ने घर के एक कोने में स्थित टाँके को खोलते हुए कहा।

"अरे! श्याम ये तो ख़ाली है। इसमें तो एक बूँद भी पानी नहीं है," विभु ने टाँके के ढक्कन को खोलने के बाद कहा।

 विभु की बात सुनकर मैं निराश हो गया। मेरा अन्य दोस्त अंकित मेरी शक्ल देख कर बोला, “अरे! रुक मैं लाता हूँ।"

"जल्दी ला भाई। बहुत ज़ोर की प्यास लगी है," मैंने पुनः मजबूरी जताई।

"हाँ! लाया...," वह दौड़ता हुआ दूसरे टाँके की तरफ़ गया। उसने बाल्टी को रस्सी से बाँधा व पानी निकालने के लिए टाँके के अंदर फेंका। मैं उसे ध्यानपूर्वक देख रहा था। मुझे अब सब काला-काला सा दिखाई देने लगा।

"ओह! तेरी अरे, श्याम बाल्टी अंदर गिर गई। यार तू अंदर से लेकर आ पानी।"

अंकित के शब्दों ने मुझे निराश कर दिया। श्याम दौड़ता हुआ घर के अंदर गया व एक जग को पानी से भरकर दौड़ता हुआ मेरी तरफ़ आने लगा।

"अरे! श्याम बेटा पानी दे ना। बहुत देर हो गई। पानी ही नहीं पिया अब तक," बाहर चारपाई पर बैठे एक मेहमान ने श्याम से पानी का जग लेते हुए कहा। वह पानी पीने लगा। शायद उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा था।

इधर प्यास से मेरा बुरा हाल था। मुझे बेहोशी सी महसूस होने लगी।

"माँ! ओ.... माँ! मुझे प्यास लगी है। पानी पिला ना।"

मैंने असहाय होकर इस आस में आवाज़ लगाई की शायद माँ अंदर होंगी। मेरी आवाज़ सुनकर माँ पानी के लोटे के साथ घर के अंदर से दौड़ती हुई आई। अन्य महिलाएँ भी मेरी आवाज़ सुनकर घर से बाहर आ गईं। मैं असहाय होकर अपनी माँ को अपनी तरफ़ आते हुए देख रहा था। अचानक उनका पाँव रास्ते में पड़ी एक ईंट से टकराया और वो पानी के लोटे सहित गिर गईं।

"माँ!" मैं खड़ा होकर ज़ोर से चिल्लाया।

मेरे कानों पर पी-पी की आवाज़ पड़ रही थी। जब आँखों को मलकर देखा तो पता चला मैं तो सोफ़े पर ही सोया हुआ हूँ। मेरे फोन का अलार्म बज रहा था। मेरे चेहरे पर पसीना आया हुआ था। प्यास की वजह से मेरा गला सूख चुका था। एक अजीब से डर के कारण मेरा पूरा शरीर काँपने लगा। मैं दौड़ता हुआ फ़्रिज की तरफ़ पानी की तलाश में गया। मैंने फ़्रिज को खोला तो उसमें पानी की बोतल नज़र आई। मैंने जल्दी से बोतल का ढक्कन खोला और बोतल को अपने मुँह से लगा लिया। पहले एक घूँट फिर दूसरा.. फिर तीसरा... इस तरह से मैंने पूरी एक बोतल ख़ाली कर दी। उसके बाद भी मेरी प्यास नहीं बुझी तो मैंने दूसरी बोतल को भी खोल लिया और पानी पीना शुरू कर दिया।

"उफ़!" एक लंबी सिसकी के साथ मैंने अपने माथे का पसीना पोंछा। मेरी प्यास अब बुझ चुकी थी। मैंने अपने हाथ में ली हुई पानी की बोतल की तरफ़ देखा तो पता चला मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे। उस भयानक सपने ने मुझे अंदर तक हिला दिया था। मेरे हृदय की धड़कन अब भी तेज़ धड़क रही थी। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि जिस पानी के लिए कुछ पल पहले मैं सपने में चिल्ला रहा था वह सच में अब मेरे हाथ में है। पानी की बोतल में सिर्फ दो घूँट पानी बचा हुआ था लेकिन मैं सोच रहा था कि कहीं अगर यह भी एक दिन ख़त्म हो गया तो इस दुनिया का क्या होगा?

मैं इसी सवाल का उत्तर जानना चाहता था कि अचानक नीचे से गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। मैंने बालकनी से नीचे की तरफ़ देखा तो पता चला मुझे एयरपोर्ट छोड़ने के लिए टैक्सी वाला आ गया था। मैंने अपना बैग उठाया व टैक्सी में जाकर बैठ गया। हालाँकि वह सपना मेरे दिमाग़ में अब भी कौंध रहा था।

आँचलिक शब्द - टाँका (कुंड) (यह राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र में वर्षा जल एकत्रीकरण के लिए सीमेंट का खेतों व घरों में बनाया गया कुंड यानी छोटे कुएँ जैसा होता है। जिसके ऊपर लोहे या लकड़ी का ढक्कन भी होता है। राजस्थानी इलाक़ों में पानी की चोरी भी होती है इस कारण इन ढक्कनों के मुहाने पर ताले भी लगे होते हैं।)

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