देवीदिल से इंसाफ़ का दीया तो 
कुछ ही जलाते हैं,
मैंने अक़्सर बलात्कारियों को 
मोमबत्ती जलाते देखा है।
 
जो हर रात बंद कमरों में 
औरत की चीख़ें दबाते हैं;
सुबह, "लोग क्या कहेंगे" –
बताते देखा है।
 
घर की औरत को 
पर्दे में रखकर;
दूसरों की बहन को 
डराते देखा है।
 
अन्नपूर्णा बनकर जो 
सबकी भूख मिटाती है;
उस माँ को एक रोटी के लिए 
तरसाते देखा है।
 
मंदिर में जाकर जो 
दुर्गा को पूजते;
उन्हें गृह-लक्ष्मी को दहेज़ की 
आग लगाते देखा है।
 
मजबूरी को उसकी 
अपना शौक़ बनाके,
'वेश्या' कहकर 
उसे बुलाते देखा है।
 
जो दिन के उजाले में राह 
बदलते हैं उसे देखकर,
हर रात छुपकर उसकी 
गलियों में जाते देखा है।
 
मैंने इस समाज को, 
औरत को देवी कहकर;
दानव बन 
उसे मिटाते देखा है॥

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