डर दा मामला है

01-01-2020

डर दा मामला है

दिलीप कुमार

"सबसे विकट आत्मविश्वास मूर्खता का होता है, हमें एक उम्र से मालूम है - हरिशंकर परसाई"। 

फ़िल्मों की "द फ़ैक्ट्री" चलाने वाले निर्देशक राम गोपाल वर्मा महोदय ने डर के लेकर दिलचस्प प्रयोग किये। वो अपनी किसी फ़ेम फ़िल्म में डर फ़ेम शाहरुख़ खान को तो नहीं ला पाये, लेकिन डर को लेकर उन्होंने विभिन्न प्रयोग किये। पहले भूत का डर दिखाकर तो उन्होंने अपनी तिजोरी भरी, लेकिन फिर दर्शकों को ये बताते-बताते खुद कंफ्यूज़ हो गए कि डरना ज़रूरी है या डरना मना है। एक बार तो उन्होंने डर का उत्सव भी मनाया और पाँच लाख के इनाम-इकराम की भी घोषणा कर दी कि जो उनकी भूतिया फ़िल्म बिना डरे-सहमे अकेले देख ले उसको वे पाँच लाख रुपये इनाम में देंगे। उन्हीं दिनों अभिनेता ऋतिक रोशन सिर्फ दस रुपये में शीतल पेय पीकर हिम्मती बन जाने का सुझाव दे रहे थे और सुपर थर्टी की तर्ज़ पर मार्गदर्शन कर रहे थे कि "डर के आगे जीत है"। हज़ारों बेरोज़गारों ने अपने सुनहरे भविष्य के लिए दस रुपये का शीतल पेय पीकर अपने डर को भगाया और पाँच लाख रुपये जीतने निकल पड़े, बिना डरे हुए फ़िल्म देखने के लिए, लेकिन डर को जब नक़द होने का समय आया तो वो परवान नहीं चढ़ सका। 

अकेला आदमी अपनी रोज़ी-रोटी को लेकर डरता है, अपने परिवार के भविष्य और सुरक्षा के लिए डरता है, अपनी कमाई के छिन जाने या डूब जाने के ख़तरे से डरता है। लेकिन डर बड़े-बड़ों को भी लगता है, आम आदमी ये देखकर हैरान है। किसान डरता है कि उसकी खेती पर जाड़े में पाला ना पड़ जाये लेकिन उसे ये नहीं पता कि इस देश में अब डर की कुछ लोगों ने दुकानें खोल रखी हैं, वे डर की खेतियाँ कराते हैं। डर अपने गोदामों में रखते हैं घी की तरह। सुबह-शाम थोड़ा सा डर ख़ुद खा लेते हैं च्यवनप्राश की तरह और बाक़ी का डर कुछ भोली-भाली जनता में बाँट देते हैं कि "डरो, डरते रहो, कहीं तुम्हारे साथ ऐसा ना हो, वैसा ना हो"। सरकारें समझा-समझा के हलकान हो जाती हैं कि "किसी को किसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। देश के सब नागरिक समान हैं, सभी निर्भय होकर रहें" लेकिन फिर भी लोग डरते हैं। 

डरना शौक़ है, डरना फ़ैशन है, डरना ट्रेंड है, डरना स्टेटस सिंबल है, जो लोग नहीं डरे हैं, निडर होकर देश में जी रहे हैं उन्हें टीवी, मीडिया में फ़ुटेज नहीं मिलता। क़दम-क़दम पर तख्ती लिये लोग कैमरों के सामने बता रहे हैं कि वो डरे हैं। प्रशासन पर चीख रहे, उसे अपशब्द कह रहे, हिंसा पर उतारू लोग भी ये कह रहे हैं कि वे डरे हुए हैं। वैसे वक़्त के साथ डर की सिर्फ़ परिभाषाएँ ही नहीं बदली हैं बल्कि लुक्स भी बदल गए हैं, परिधान तो बदले हैं। आमतौर पर पहले अस्त-व्यस्त कपड़ों वाला कमज़ोर प्राणी डरा-सहमा सा नज़र आता था और हाथ जोड़कर फ़रियाद करता हुआ कहता था कि उसे मदद की ज़रूरत है। अब डर भी ब्रांडेड है, ट्रेंडिंग कपड़ों वाला है, डरे हुए लोग मोबाईल का वीडियो कैमरा ऑन करके आते हैं जो ख़ासे कॉन्फ़िडेंट दिखते हैं मगर सिस्टम पर चढ़ जाने को आमादा दिखते हैं। फ़ैंसी स्लोगन बताते हैं, फ़िल्मी गाने गाते हैं और सबसे ख़ास बात संविधान के ढेर सारे अनुच्छेदों और उपबंधों का ज़िक्र करते हुए हमेशा यही बताते हैं कि संविधान में ये कहीं नहीं लिखा है कि ये करना ज़रूरी है। क्या बात है साहब आप वही वही सब बताएँगे जो संविधान में नहीं लिखा है, कभी उस पर भी तो ग़ौर करें कि संविधान में क्या लिखा है, जनता क्या चाहती है। इसे फ़ैशन आइकॉन बन कर सड़कों पर निकले लोग तवज्जो नहीं दे रहे हैं। देश बदलने के लिए ही लोकतंत्र में नए मैंडेट दिए जाते हैं। जब देश में पुरानी रवायतें बदली जाती हैं तब कुछ लोगों को ख़ासी तकलीफ़ होती है, सबको क़ायदा-क़ानून बताने लगते हैं -

"अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल मुरझाने लगे हैं
वो सलीबों के क़रीब आये तो
हमको क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं"

जब सड़कों पर बसे जलीं, तब कुछ लोग क़ायदा-क़ानून भूल गए थे, अब क़ानून उनकी चौखट पर पहुँचा तो क़ायदे-क़ानून की दुहाई दे रहे हैं। जो सड़कों पर नहीं हैं उनके मन में भी सवाल है, कि आख़िर सुधार क्यों ना हो, कब तक मामलों को लटकाये रखा जायेगा-

"क्योंकि मेरे सवाल तुम्हारी मान्यताओं
का उल्लंघन करते हैं, 
नया जीवन बोध संतुष्ट नहीं होता
ऐसे सवालों से जिनका सम्बन्ध
आज से नहीं अतीत से है
तर्क से नहीं रीत से है"

तो “कूल डूड” और “डूडनियों” को अपने फ़ेसबुक की स्टेटस बढ़ाने के लिए डर का सहारा लेना ज़रूरी नहीं है। डरे तो वो माँ-बाप भी हैं जिन्होंने अपना तन-पेट काटकर आपको दिल्ली पढ़ने भेजा और आप पढ़ाई-लिखाई ना करके जंतर-मंतर की शोभा बढ़ा रहे हैं। आपको डर है कि देश का भविष्य ख़तरे में है, वाक़ई देश ख़तरे में है जब आप जैसे देश के टॉप माइंड बड़े संस्थानों की प्रयोगशालाओं से निकल कर डफली बजा रहे हैं और देश को दिशा देने के बजाय आपकी वजह से ट्रैफ़िक की दिशा बदलनी पड़ रही है। अगर डफली ही बजानी थी तो कहीं बजा लेते इतनी महँगी सब्सिडी वाली शिक्षा लेने की ज़रूरत ही क्या थी? वैसे भी देश के वो तमाम माँ-बाप डरे हैं कि बेटे-बेटियों को जंतर-मंतर पर देखकर, क्योंकि जिन कुछ लोगों के साथ ये जश्न-ए-डर चल रहा है, उनमें से कुछ तो कोई सामजिक अध्ययन की ग्रांट पा जाएँगे या और कुछ हासिल कर लेंगे। ये टोपियाँ, ये तख्तियाँ, ये डफलियाँ बाँट कर उनके कई काम सध जाएँगे। उनको डर है कि उनकी रबड़ी, मलाई, चाशनी इसी टोपी, तख्ती, डफली के बलबूते बहाल ना हो तो उन्हें विदेश में भी जाकर बताना पड़ेगा अपने डर के बारे में। 

डर की क़ीमत होती है। एक बार आमिर खान को देश में डर लगने लगा अचानक इस देश में। उनके डर से आजिज़ होकर लोगों ने स्नैपडील पर उनके द्वारा प्रचार किये जाने वाले सामानों से डरना शुरू कर दिया। मार्किट वैल्यू डाउन हुई तो उन्होंने डरना छोड़ दिया। आजकल लोग उनसे फोन करके पूछ रहे हैं कि आप डर रहे हैं या नहीं, उन्होंने कहा है कि हमें डरना चाहिए और पानी बचाना चाहिये। हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफ़र होता है, डर भी पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफ़र होता है। ये ना सिर्फ़ डरने की बात है बल्कि अचंभे की बात है। जैसे सदैव डरे रहने वाले हुनरमंद जावेद अख्तर का क़ाबिल बेटा फ़रहान अख्तर भी अचानक डरने लगा। ढेर सारे बॉडीगार्ड के साथ आज़ाद मैदान में जब पहुँचा और लोगों ने उससे पूछा कि "आप यहाँ क्यों आये हैं, क्या आप भी डरे हुए हैं।” तो बॉडीगार्डस के घेरे में घिरे फ़रहान ने कहा, "इतने सारे डरे हुए लोग यहाँ आये हैं, ज़ाहिर है कोई वजह होगी डरने की। सो मैं भी इनकी देखा-देखी डर रहा हूँ।" इसे कहते हैं पापा का प्यारा बच्चा। इधर ढेर सारे डरे हुए लोगों के कॉन्फ़िडेंट एक्सप्रेशन को देखकर एक प्रौढ़ युवा नेता ने अपनी मम्मी से पूछा है कि "मम्मी, टीवी पर मुझे बाइट देते वक़्त डरपोक दिखना है या निडर।" 

नेपथ्य में कहीं गुरदास मान साहब का एक गाना बज रहा है “दिल दा मामला है।" कुछ मसखरे इसकी पैरोडी गा रहे हैं "डर दा मामला है।" 
सच बताएँ ये झूठ-मूठ वाला डर आपको भी लगता है क्या?

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