चुनावी कुकरहाव

01-02-2020

चुनावी कुकरहाव

संजीव शुक्ल

चाहे जितनी आचार संहिता लगाओ चुनावी मौसम में चुनावी कुकरहाव बढ़ ही जाता है। कुछ लोग आचार-संहिता को अचार समझ उसे उदरस्थ करने में देर नहीं लगाते। बड़ी तू-तू-मैं-मैं बढ़ जाती है।

ठीक वैसे ही जैसे एक टोले के कुत्ते दूसरे टोले के कुत्ते पर भोंकने लगते हैं, बस देख भर लें, मानो एक दूसरे पर शुरू। यही हाल पार्टियों के नेताओं और समर्थकों का है। यहाँ कुत्ता न होकर के भी कुत्तेपना को जीने की भरसक कोशिश की जाती है। बस शरीर ही इंसान का रहता है,आत्मा पूरी तरह से कुत्ते की हो चुकी होती है।

इस चुनावी मदमस्त बयार में कोई भी अपने में नहीं है, सभी दलीय वाला पव्वा चढ़ाये घूम रहे हैं। 'अपनो दल जीति रहो, दूसरों न कोई' की भावना से वशीभूत होकर। ऐसे में दूसरे दल उसी तरह फूटी आँख नहीं सुहाते जैसे इमरान खान की पूर्व पत्नियों को इमरान साहब। चुनाव में सब एक दूसरे पर कड़ी निगाह रखते हैं। मसाला मिलने भर की देर है मानो कुकरहाव शुरू। हमारे यहाँ एक कहावत है जो वेदवाक्य की तरह समादृत है वह यह कि "प्रेम और युद्ध मे सब जायज़ है"। अतः इस जायज़पना को पूरी तरह से जीने की ग़रज़ से हम चुनाव, जो कि एक युद्ध जैसा ही होता है, में कोई कसर नहीं उठा रखते। यहाँ दूसरे के हर जायज़ काम को नाजायज़ और अपने हर नाजायज़ काम को जायज़ ठहराने की होड़ रहती है।

अब ऐसे में यदि कोई नेता मतदाता से संपर्क करते-करते किसी ग़रीब की कुटिया को कृतार्थ करने पहुँच जाय, तो विरोधी पक्ष इस तरह बुरा मान जाता है जैसे वह नेता ईवीएम मशीन साथ में लेकर गया हो और उससे वहीं वोट डलवा लिया हो, तिस पर अगर कहीं वो नेता उस ग़रीब के घर खाना खा ले तब तो समझो पेट में दर्द बल्कि भीषण दर्द शुरू। हालाँकि इस योजनाबद्ध क्षुधा-शांति कार्यक्रम में कृष्ण तो निश्चित होता है पर विदुर कौन होगा यह अनिश्चित होता है। वैसे विदुर तो पूरी जनता होती है, अब विदुरों की टोली में जिस पर प्रभु की कृपा हो जाय। 'साग विदुर घर खायो' कार्यक्रम पर हमारा कहना है कि प्रायोजित ही सही, पर काम तो नेक है ही, सो इतना कुकरहाव ठीक नहीं। यह अघोषित तथ्य है कि नेक काम चुनाव के दौरान थोक भाव में होते हैं। दरअसल, ये दिन नेक कामों के लिये शुभ दिन होते हैं। एक हिसाब से ये सहालग वाले दिन हैं।

 इधर इन नेक कामों की शृंखला में एक और नेक काम दिख गया, वह यह कि एक चुनावी बसंती (उम्मीदवार) वोटरों से तादाम्य स्थापित करते-करते खेत जा पहुँची। वहाँ उन्हें कार्य के प्रति श्रद्धा जगी तो किसानों से उन्होंने आग्रह किया कि थोड़ा-सा उन्हें भी काम करने का मौक़ा दिया जाय। उनका बड़ा मन होता है काम करने का, पर संसदीय व्यस्तताओं के चलते वह अपने इस शौक़ को पूरा नहीं कर पाती हैं। आज ईश्वर ने मौक़ा दिया है!!!! हमें पूरा विश्वास है कि उनके विशेष आग्रह और यह समझाने के बाद ही कि 'कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता', किसानों ने उनको काम करने देने के लिये हामी भरी होगी। पर मीडिया और अन्य दलों को यह गतिविधि रास न आई। सबने एक मत से इसे चुनावी नौटंकी बताया। हमें लग रहा ये थोड़ी ज़्यादती है, एक भोले-भाले उम्मीदवार के साथ। भई, चुनाव के समय भी मानवीय संवेदनाएँ उछाल मार सकती हैं। ऐसा तो है नहीं कि चुनाव के समय संवेदनाएँ हाइबरनेशन में चली जाती हों। पर कुछ लोग अपनी फ़ितरत से मजबूर होते हैं सो सनातन विरोध की भावना से प्रेरित हो कथित आत्मघोषित बुद्धजीवी गहन विमर्श के बाद निष्कर्ष के तौर पर यह घोषित करते हैं - चूँकि प्रत्याशी ने सिर्फ़ तीन-चार मुट्ठी ही गेंहू काटे, अतः इसे गंभीरता से न लिया जाय। इनके मन से था कि आदरणीया को कम-से-कम पाँच बीघा गेहूँ तो काटना ही चाहिए था। इनका बस चले तो प्रत्याशी पूरे प्रचार में सिर्फ़ गेहूँ और धान की कटाई ही करता रहे। अब ऐसे मूढ़ों को कौन समझाए कि मुख्य चीज़ है भावना। यही भारतीय राजनीति की विडंबना है कि वह भावना से इतर मात्रात्मक परिणाम पर विमर्श करने लगती है। पर भारतीय राजनीति में यह भी उतना सत्य है कि दल के नेता इन सब चीज़ों से परे रहकर समाज-कल्याण में रात-दिन जुटे रहते हैं।

वैसे, तुम्हें ’याद हो कि न याद हो' इससे पहले भी एक बड़े नेता ने 'किसान का खाओ और उसकी खटिया पर रात बिताओ' अभियान चलाया था। यह अलग बात है उसके बहुत अच्छे परिणाम नहीं आये पर प्रोग्राम अच्छा था। बिल्कुल मनरेगा की तरह. . . लोगों ने सवाल खड़े किए, जैसा कि आमतौर पर अच्छे कामों पर होता ही है। अरे भाई वह लेटने ही तो गये थे, कोई उनकी खटिया उठाकर अपने घर तो ले नहीं आये। ख़ैर! 'देखि न सकइ पराइ विभूती' टाइप वाले लोगों को दूसरे की लोकप्रियता कहाँ हज़म होती है, सो बवाल होना ही था।

इधर चुनावी राजनीति के कुकरहाव में एक नया ट्रेंड आया है वह यह कि लोग-बाग घोषणापत्र और हलफ़नामा की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करने लगे हैं, जो कि निहायत ग़लत है। कुछ लोग हलफ़नामे में प्रत्याशी द्वारा उपलब्ध करायी गयी नितांत वैयक्तिक जानकारी को सरेआम उछालकर उसकी प्रामाणिकता का पोस्टमार्टम करने लगते हैं। वैसे इस मामले में निर्वाचन आयोग की भूमिका भी सन्देहास्पद है। भाई आप पारदर्शिता के नाम पर ऐसे सवाल क्यों रखते हैं कि आदमी की बची-खुची सरेआम नीलाम हो जाये। अब फ़लानी मंत्री को ही ले लीजिये जिनके कुछ समय पूर्व नाज़ुक कंधों पर देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का भार था, कि हलफ़नामों के अनुसार पहले वे ग्रेजुएट थीं, फिर ग्रेजुएशन में अध्ययनरत हुईं और अब अंततः इंटर पर आ गयीं। लोग चिल्लाने लगे कि देश से झूठ बोला गया। ये एक बेहूदा आरोप है। देश कभी अपने नागरिकों की इज़्ज़त उतारने को नहीं कहता। और फिर जब पूरी बात न पता हो तो ऐसे नहीं कहना चाहिए। हो सकता है मैडम ने उल्टे क्रम में अर्थात ऊपर से नीचे की ओर पढ़ाई की हो। वैसे अपना तो मानना है कि शैक्षिक मानकों को थोड़ा उदार रखना चाहिए, ताकि विश्व शैक्षिक सूचकांक में भारत के शैक्षिक स्तर को थोड़ा ऊपर की ओर धकेला जा सके। इसके अतिरिक्त सुधार के तौर पर अगर कोई होनहार विद्यार्थी एक ही क्लास में कई सालों से नींव मज़बूत कर रहा है; जोंक की तरह चिपटा हो, तो उसकी समर्पण भावना की क़दर करते हुए अनुभव के आधार पर उसे यूँ ही अगली कक्षा में प्रोन्नत कर दिया जाना चाहिए। इससे बच्चों में शिक्षा के प्रति पैदाइशी नफ़रत को कम करने में मदद मिलेगी। सूचकांक ऊपर उठेगा सो अलग।

ख़ैर चलते-चलते एक और कुकरहाव के बिंदु पर बात कर लेते हैं। वह बिंदु है घोषणापत्र। प्रायः सारा कुकरहाव इसी को लेकर होता है। विपक्षी, जनता को बरगलाते हैं कि इनके घोषणापत्र में नया कुछ भी नहीं है, पुराना वाला ही निकाल लाये हैं और कोई भी वायदा पूरा नही किये हैं। इस पर जटिल राजनीतिज्ञ डंके की चोट पर कहते हैं कि हमने यह थोड़े ही कहा था कि घोषणापत्र के सारे वायदे पूरे कर देंगे। बात में दम है, भाई कुछ अगले चुनाव के लिये भी तो बचा के रखना है, अगर सारी घोषणाएँ पूरी हो जाएँगी तो अगले चुनाव में क्या बग़ैर घोषणापत्र के जनता के बीच जाया जाएगा। विकास का वायदा करने के लिए आपका अविकसित होना ज़रूरी है। अगर आप विकसित हो चुके हैं तो क्या पड़ोसियों के विकास को लेकर चुनाव में उतरेंगे, और वह भी पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के लिये जिनके नाम से ही हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद बंदूक के ट्रिगर पर चला जाता है। इसके अलावा जो यह कहते हैं कि यह वही पुराना वाला घोषणापत्र है, उनको शायद यह पता नहीं है कि यह घोषणापत्र अभी भी नया है क्योंकि इसे हमारे कुशल रणनीतिकारों ने अपने राजनीतिक कौशल से पुराना ही होने नहीं दिया। अतः यह कुकरहाव बेमानी है .......
 

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