चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौटे

15-05-2020

चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौटे

तरुण आनंद

जब से ई मुआ कोरोना आया है तब से चौबाइन बड़ी परेशान है। चौबाइन अपने घर के अंदर से कोरोना को गरियाते हुये बाहर निकली तो कुछ लौंडे लपाड़िए निहायत ही निठल्ले से उसके घर के सामने मटरगश्ती करते नज़र आए। अब चौबाइन का माथा गरम हो गया, तन-बदन में आग भभक उठी। उसने उन लौंडों की जम कर ख़बर ली, ख़ूब गरियाने लगी, खरी-खोटी सुनाने लगी। चौबाइन के इस अप्रत्याशित हमले और कोरोनो के बीच अचानक आए इस आपदा से उन लौंडों की तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, घिग्घी बँध गई। वे सब लौंडे चौबाइन के हमले से बच-बचाकर गिरते-पड़ते उस गली से भाग निकले। अब चौबाइन फिर से कोरोना को गरियाने लगी। "ई मुआ कोरोना तो कहीं बैठने लायक़ भी नहीं छोड़ा, न घर से निकल सकते हैं, न किसी के यहाँ जा सकते हैं, न किसी से गप्पे लड़ा सकते हैं, न किसी से जी भर के लड़ सकते हैं और न ही किसी की चुगली कर सकते हैं।" अब चौबाइन के पेट में आदतन दर्द उठने लगा और जी भर के चीन को गरियाने लगी। सत्यानाश हो जाए इन चीन वालों का जो कीड़ा-पिल्लू, साँप-छुछुंदर, ऑक्टोपस –चमगादड़ सब को ज़िंदा गटक जाते हैं। इसी से कोरोना आया और चौबाइन को अपनी सारी अरमानों की तिलांजलि देनी पड़ी। भुनभुनाती हुई मन मसोस कर चौबाइन घर के भीतर गई। 

घर के अंदर चौबे जी टाँग पसार कर अख़बार में कोई ख़ास ख़बर ढूँढ़ रहे थे। जैसे ही चौबाइन ने ये दृश्य देखा तो उसका पारा तुरंत गरम हो गया, ग़ुस्सा सातवें आसमान पे जा पहुँचा। बाज़ की फ़ुर्ती से अख़बार पर झपट्टा मारते हुये चौबाइन ज़ोर से चिल्लाई- “बर्तन कौन साफ़ करेगा, घर की साफ़-सफ़ाई भी अभी बाक़ी है, कपड़े भी धोने हैं, गेहूँ भी छत पर सुखानी है, पौधों में पानी कौन देगा? मेरे तो करम ही फूटे हैं जो इनसे पाला पड़ा।“ अचानक आई इस विपदा से चौबे जी हक्के-बक्के रह गए, अंदर तक हिल गए। चाय और खैनी की तलब को तिलांजलि देते हुए चौबाइन को मन में ही भला बुरा कहने लगे और चौबाइन की तुलना रामायण की ताड़का व शूर्पनखा एवं श्रीकृष्ण के पूतना से करने लगे; क्यूँकि चौबाइन के आगे उनकी एक न चलती थी। मन का भड़ास निकालने के लिए वे चौबाइन को कुछ बोलने ही वाले थे कि मिसाईल की तरह दनदनाती हुई झाड़ू ठीक उनके सामने आ कर गिरी। वे चौबाइन को मन ही मन कोसते हुये अश्रुपूरित नेत्रों के साथ मन मसोस कर उठे और अपनी सभी इच्छाओं को तिलांजलि देते हुये कोरोना को दिल की गहराइयों से गरियाते हुए आधे मन से घर की साफ़-सफ़ाई में जुट गए। उनकी आँखों के आगे उनके ऑफ़िस में उनके रुतबे का सम्पूर्ण चक्र घूमने लगा। वो शान से चाय पीते हुए गप्पें हाँकना, वो शहंशाह की तरह कुर्सी पर पैर फैला कर बैठना, वो चपरासी का उनके सामने थर्राना, बॉस का इज़्ज़त के साथ पेश आना, सारे सहयोगियों द्वारा इज़्ज़त देना। सारे दृश्य एक-एक कर चलचित्र की भाँति उनके मन में चलने लगा। चौबे जी लगभग रोने-रोने को आ गए परंतु चौबाइन के आगे उनकी एक न चलती थी। वे सोचने लगे, सारी दुनिया उनकी इज़्ज़त करती है पर घर में ही इज़्ज़त की वाट लगी रहती है। 
   
किसी तरह चौबे जी सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम की। परंतु आज चौबे जी का खैनी का स्टॉक लॉक-डाउन के समय के बढ़ने के कारण समाप्त हो चुका था। उन्हें बड़े ज़ोरों से खैनी की तलब हो रही थी, मन बेचैन था, दिल घबरा रहा था, साँसें मानो थम सी रही थीं, पाँव लड़खड़ा रहे थे, आँखों की पुतलियाँ कत्थक कर रही थीं। इससे पहले कि दिमाग़ सुन्न होने की अवस्था में पहुँच पाता, चौबे जी ने एक कठोर निर्णय लिया। लॉक-डाउन में घर से बाहर निकलने का। क़ानून का उल्लंघन तो था और पुलिस से पीटे जाने का ख़तरा भी था और सबसे ज़्यादा ख़तरा तो कोरोना से था। शाम का वक़्त था, मन को कठोर कर भुनभुनाए कि आज तो हर हाल में किसी न किसी तरह खैनी का जुगाड़ कर ही लेना है। वे चौबाइन को बिना बताए चुपके से निकल आए घर से और लक्ष्य प्राप्ति हेतु ख़ुद को बचते-बचाते आशंकित मन से चल पड़े चौक की तरफ़। अभी वो चौक की तरफ़ सधे व सतर्क क़दमों से कुछ ही दूर बढ़े थे कि सामने का दृश्य देख उनके रोंगटे खड़े हो गए, उनका पूरा शरीर डर से सिहर उठा। सामने कुछ पुलिस वाले बेवज़ह घूमने आए लौंडे-लपाड़ियों को ज़बरदस्त सोंट रहे थे। किसी से उठक-बैठक करवा रहे थे तो किसी को मुर्गा बनाए हुये थे। ये दृश्य देख वो बच के निकलने हेतु वापस मुड़ने ही वाले थे कि एक पुलिस वाला उनके सामने यमदूत की तरह अचानक प्रकट हो गया। उसकी मोटर साइकल साक्षात भैंसा और हाथ में पकड़ी लाठी साक्षात गदा प्रतीत हो रही थी। अचानक आई इस विपदा से चौबे जी हड़बड़ा गए, उनकी घिग्घी बँध गई, आवाज़ हलक में ही अटक गई। टीवी पर उन्होंंने पिटाई देख व सुन रखी थी, वे दबी ज़ुबान से कुछ बोलना चाह ही रहे थे कि मिसाइल की गति से भी तेज़ दनदनाती हुयी लाठियाँ उनकी तशरीफ़ पर बरसने लगी। वे जब तक कुछ सोच पाते, कुछ बोल पाते, कुछ कर पाते तब तक तो आठ दस डंडे उनकी तशरीफ़ की सेवा में समर्पित हो उन्हे लाल कर चुकी थी। उनके होशो हवास गुम हो गए थे, दिमाग़ लगभग अचेतन अवस्था में जाने ही वाला था की वो अपनी सारी शक्ति को समेट दर्द की बिना परवाह किए आव न देखा ताव, बिना पीछे देखे सरपट घर की तरफ़ दौड़ लगा दी। 

घर पहुँच उन्होंने राहत की साँस ली, अपनी तशरीफ़ को सहलाते उन पर हाथों को फेरते हुये घर के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे की सामने दरवाज़े पर भृकुटी ताने चौबाइन खड़ी मिली। चौबाइन अपने पूरे रौद्र रूप में अवतरित माँ चंडी प्रतीत हो रही थी, आँखों में अग्नि की ज्वाला, चेहरे पर क्रोध का तांडव, जिह्वा पर साक्षात शेषनाग एवं पूरा शरीर ग़ुस्से से काँप रहा था। इस अकल्पनीय दृश्य को देख चौबे जी की आत्मा तक सिहर उठी। उनकी ज़बान को जैसे ताला लग गया हो, बोलना चाह रहे थे परंतु जिह्वा साथ नहीं दे रही थी। भूखी शेरनी जैसी चौबाइन दहाड़ते हुये चौबे जी से पूछी - "कहाँ गए थे बिना पूछे, बिना बताए। कहीं कोरोना लाने तो नहीं गए थे बाहर?" चौबे जी घोर असमंजस में पड़ गए, सोचने लगे – कैसे बताऊँ, किस मुँह से बताऊँ। चौबे जी को न उगलते बन रहा था न निगलते बन रहा था। चौबाइन के ताबड़तोड़ प्रश्नों की बौछार के बीच वो अपनी तशरीफ़ के दर्द को भूल गए थे। उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी थी, चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। 

उनकी इस मनोदशा को चौबाइन झट से भाँप गई। भौंहें टेढ़ी कर गरजते हुये पूछा – :बाहर खैनी लाने के लिए ही गए थे न? क्या हुआ, कुछ बताओगे भी?"

अब चौबे जी को तो जैसे काटो तो खून ही नहीं, उनकी चोरी जो पकड़ी गई। चौबे जी ने शरम से सारी आपबीती चौबाइन को सुनाई। सारी बातों को सुन कर मानो चौबाइन का ग़ुस्सा काफूर ही हो गया। वो बड़ी ज़ोरों से हँस पड़ी, चौबे जी झेंप गए। हँसते हुये चौबाइन उनसे बोली – "अच्छा हुआ, और निकलो लॉक डाउन में घर से बाहर, जनाब को खैनी की तलब लगी थी, कम से कम पचास लाठियाँ पड़नी चाहिएँ थीं तुम पर। बड़े चले थे शेर बनने, आ गए न औक़ात में।"

चौबाइन ने चौबे जी की जम कर फटकार लगाई। चौबे जी अपनी तशरीफ़ को सहलाये जा रहे थे, वे अत्यंत ही पीड़ा में थे, अब उन्हें दर्द महसूस होने लगा था। 

चौबे जी लुटे-पिटे युद्ध में पराजित किसी रियासत के राजा की तरह व्यथित और कुंठित मन से घर के अंदर गए और सोचने लगे कि अब पूरे लॉक डाउन के दौरान अपनी गृहस्वामिनी यानि चौबाइन की बातों का अनुसरण करूँगा क्यूँकि ये भी तो मेरी बॉस ही है – घर की। ये प्रण कर वो अपनी सूजी हुयी तशरीफ़ को गरम पानी से सेंकने लगे। दर्द की अनुभूति तो हो रही थी पर शर्म के मारे बयां नहीं कर पा रहे थे। 

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