चित्रा मुद्गल की कहानियों का सांगोपांग अध्ययन

01-11-2019

चित्रा मुद्गल की कहानियों का सांगोपांग अध्ययन

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

समीक्षित पुस्तक : चित्रा मुद्गल की कहानियों में यथार्थ और कथाभाषा 
लेखिका : डॉ. संगीता शर्मा 
संस्करण    : 2019 
मूल्य : रु. 350 
प्रकाशक : सृजलोक प्रकाशन, बी-1, दुग्गल कॉलोनी, खानपुर, नई दिल्ली - 110062 

 

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों और इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों के लगभग पचास वर्ष के काल खंड में अपनी रचनाधर्मिता की अलग पहचान बनाने वाली लेखिका चित्रा मुद्गल कथासाहित्य के अध्येताओं के लिए एक चुनौतीपूर्ण रचनाकार रही हैं। वे एकांत अध्ययन कक्ष में बैठकर काल्पनिक संसार बुनने वाली लेखिका नहीं हैं। बल्कि एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता की तरह यथार्थ जगत में उपस्थित रहने वाली लेखिका हैं। वास्तविक जीवन से सजीव और सक्रिय रिश्ते के कारण उनके अनुभव बहुत गहरे, सूक्ष्म, विराट और व्यापक हैं। अनुभव की यह सच्चाई उनकी अभिव्यक्ति को भी धार प्रदान करती है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ विषयवस्तु और भाषाशैली जैसे दोनों धरातलों पर यथार्थ से अनुप्राणित दिखाई पड़ती हैं। 

चित्रा मुद्गल की कहानियों की इसी मूलभूत विशेषता को डॉ.संगीता शर्मा (1969) ने अपनी ताज़ा शोधपूर्ण कृति ‘चित्रा मुद्गल की कहानियों में यथार्थ एवं कथाभाषा’ (2019) में अत्यंत पैनीदृष्टि से प्रतिपादित, विवेचित और विश्लेषित किया है। यही कारण है कि स्वयं लेखिका चित्रा मुद्गल ने उन्हें साधुवाद और आशीर्वाद देते हुए 5 सितंबर, 2019 को लिखे पत्र में यह स्वीकार किया है कि “यह तो सच है कि कहानियाँ जीवन यथार्थ की ही अभिव्यक्ति होती हैं। कुछ अपने जिए-भोगे का यथार्थ होते हैं कुछ नज़दीक से देखे जीवन के अनुभव जनित संसार का हिस्सा। तुमने अपने अध्यवसाय और गहन विश्लेषण विवेचन के माध्यम से इन कहानियों में मानव जीवन के यथार्थ और उसकी प्रासंगिकता को उसके पात्रों, घटनाओं और परिस्थितियों के आधार पर रेखांकित किया है, यह सराहनीय है।” 

लेखिका डॉ. संगीता शर्मा ने ‘आदि-अनादी’ शीर्षक से तीन खंडों में प्रकाशित चित्रा मुद्गल की समस्त कहानियों का विहंगम परिचय कराने के बाद विस्तार से व्यक्तिपरक यथार्थ की दृष्टि से उनका विश्लेषण किया है। और दिखाया है कि अहं, द्वंद्व, घुटन, संत्रास, अकेलापन और आत्मनिर्वासन जैसी आधुनिक जीवन शैली से जुड़ी मनोविकृतियाँ आधुनिक मनुष्य के जीवन को नारकीय बनाए रही हैं। 

इसके अलावा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक यथार्थ के विविध पहलुओं की अभिव्यक्ति की दृष्टि से इन कहानियों का विवेचन-विश्लेषण करते हुए लेखिका ने यह प्रतिपादित किया है कि आधुनिक जीवन का कोई भी मार्मिक कोण चित्रा मुद्गल की कलम की नोक से अछूता नहीं रह सका है। कहना न होगा कि जीवन और जगत के यथार्थ के इस गहरी पहचान ने ही चित्रा मुद्गल को हमारे समय की महान लेखिका बनाया है। 

इस पुस्तक का भाषा विश्लेषण विषयक अंश अपने आप में विशिष्ट ही नहीं स्वतःपूर्ण भी है। यथार्थपरक भाषा प्रयोग की पड़ताल करते हुए जहाँ परिवार और समाज में अलग-अलग स्तरों पर बदलती भाषा के रंग देखे और दिखाए गए हैं वहीं शैली के स्तर पर शब्दों के चुनाव और उक्तियों के गठन में निहित समाजशास्त्रीय दृष्टि और बुनावट के सौंदर्य को उजागर किया गया है। विश्वास और बुनावट के सौंदर्य को उजागर किया गया है। विश्वास किया जाना चाहिए कि विशेष रूप से कथाभाषा और शैलीविज्ञान को आधार बनाकर अनुसंधान करने वाले शोधर्थियों के लिए यह पुस्तक बड़े काम की चीज साबित होगी। साधारण पाठक भी चित्रा मुद्गल के कथाकार व्यक्तित्व के अलग-अलग आयामों से परिकित होने के लिए इस पुस्तक को उपयोगी पाएँगे। 

    • डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
असिस्टेंट प्रोफेसर 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
खैराताबाद, हैदराबाद - 500004  
                  
 

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