सुखद सलोने बचपन का
बाँका रूप अनूप
हँसी-खुशी ज़िद्द उछल-कूद
हैं छुटपन के प्रतिरूप

सच बचपन का जीवन साथी
प्रति पल लिखता अपनी थाती
पोथी पतरा कहाँ बाँचता
निज बुद्धि से सदा जाँचता

सरल सहज कितना निश्छल है
संशय से कुछ ना मतलब है
प्रेम बाँटता प्रेम माँगता
बचपन तो इक स्वयं धर्म है

बालमना कोरे कागज़ पर
उचित ज्ञान का रंग भरें
भोला-भाला बड़ा लचीला
शुद्ध सोच ममता से गढ़ें।

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