01-04-2019

छायावाद के सौ वर्ष

डॉ. एम. वेंकटेश्वर

 आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में छायावादी काव्य युग, छायावादी काव्य आँदोलन अथवा छायावादी काव्य प्रवृत्ति का एक विशिष्ट अध्याय है। छायावादी प्रवृत्ति की कविता ने प्रेम और सौन्दर्य के विलक्षण युग्म को कवि की आत्मानुभूति के रूप में साहित्य फ़लक पर चित्रित किया। मनुष्य और प्रकृति, दोनों के अंत:संबंध की रहस्यात्मकता को जिस सूक्ष्म और सुकोमल धरातल पर छायावादी काव्य ने परिभाषित किया वह आज कालातीत होकर अमरत्व को प्राप्त हुआ। हिंदी में छायावादी काव्य-युग को बीते हुए सौ वर्ष हो रहे हैं किन्तु आज भी इस कविता की तेजोमय आभा में लेश मात्र भी धुँधलापन नहीं आया। भारतीय साहित्य में छायावाद के प्रणेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर माने जाते हैं। कवीन्द्र रवीन्द्र की भावमय प्रकृति में निहित रहस्यमय अज्ञात सत्ता के प्रति विस्मयपूर्ण आकर्षण और उस अनंत की खोज में लीन मनुष्य की उस जिज्ञासावस्था का चित्रण जिस तन्मयता के साथ रवीन्द्र ने अपनी कविताओं में व्यक्त किया है, ठीक उसी भावमय तन्मयता के साथ हिंदी काव्य साहित्य में भी ऐसे ही अभिव्यक्ति की पुनरावृत्ति कालांतर में हुई जिसे छायावादी काव्य युग के रूप में स्वीकृति मिली। हिंदी में एक शताब्दी पूर्व रचित छायावादी काव्य की लोकप्रियता और प्रासंगिकता आज भी वैसी ही बनी हुई है। भावप्रवणता, सौंदर्यबोध, प्रेमाभिव्यक्ति, आध्यात्मिक चेतना, प्रकृति के साथ एकात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए छायावादी कविता ही सर्वथा उपयुक्त है। छायावादी कविता हर भारतीय भाषा साहित्य में भिन्न-भिन्न कालावधियों में न केवल लोकप्रिय रही बल्कि इसने कविता के नए प्रतिमान स्थापित किए। छायावाद आधुनिक हिंदी कविता की उस धारा का नाम है, जो 1918 ई के आसपास द्विवेदी-युगीन नीरस, उपदेशात्मक, इतिवृत्तात्मक और स्थूल आदर्शवादी काव्यधारा के बीच से प्रमुखत: रीतिकालीन काव्य-प्रवृत्तियों के विरुद्ध विद्रोह के रूप में प्रवाहित हुई। यह नयी काव्यधारा अँग्रेज़ी के रोमांटिक कवियों तथा बँगला के कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की काव्यधारा के ढंग की या उससे प्रभावित थी। हिंदी भाषा के विकासशील युग में आधुनिक हिन्दी काव्यधारा को प्रांजलता और कलात्मकता प्रदान करने की कीर्ति छायावादी कविता को ही प्राप्त है। वह आत्मनिष्ठ कविता जिसमें प्रेम और सौन्दर्य की सूक्ष्म अभिव्यक्ति के साथ साथ कवि की प्रकृति के संग तादात्म्यता के भाव को कलात्मक स्वरूप प्रदान करने वाली कविता को ही छायावादी कविता के रूप में स्वीकार किया गया।

हिंदी में छायावादी कविता के उद्भव के सौ वर्षों (1918-2018) बाद भी छायावादी काव्य आज भी इतर काव्य विधाओं के मध्य अपनी कलात्मक और अलंकृत भावाभिव्यक्ति के लिए कालजयी काव्य साहित्य के रूप में विद्यमान है। विशेष भाववादी पद्यात्मक अभिव्यक्ति को ही छायावादी कविता की संज्ञा दी गई। कवि की आत्माभिव्यक्ति, प्रकृति को आलंबन मानकर जब-जब हुई उसे छायावादी अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया वैसे ही ईश्वर तत्व का निरूपण प्रकृति के पटल पर जब किया गया तो उसे रहस्यानुभूति माना गया। छायावादी कविता पूर्ण रूप से प्रेम भावना की स्वच्छंद अभिव्यक्ति का ही दूसरा नाम था। छायावादी कविता के आविर्भाव से पूर्व साहित्य में प्रेम और सौन्दर्य का चित्रण केवल उदात्त चरित पात्रों अथवा ऐतिहासिक एवं पौराणिक नायक, नायिका के ही क्रियाकलापों के चित्रण तक ही सीमित था। छायावादी भावाभिव्यक्ति ने इस पुरातन रूढ़िवादी परंपरा को भंग कर दिया। ऐतिहासिक और पौराणिक चरित नायकों के संयोग और वियोग की अनुभूतियों के चित्रण को सामान्य व्यक्ति के प्रेम की संयोग-वियोग प्रधान अवस्थाओं के चित्रण को पहली बार अभिव्यक्ति का साधन उपलब्ध हुआ। स्त्रियों के वियोगजन्य, करुण क्रंदन के स्थान पर पुरुष की वियोग दशा और तदजनित उपालंभों के चित्रण के लिए छायावादी काव्य अनुकूल सिद्ध हुआ। रीतिकालीन स्थूल और मांसल सौन्दर्य और प्रेम की अभिव्यक्ति को प्रतिस्थापित कर सौन्दर्य और प्रेम की सूक्ष्माभिव्यक्ति इस काव्य की विशेषता है। हिंदी कविता का भारतेन्दु-युग राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत था तो द्विवेदी युग पौराणिक आख्यान-प्रधान प्रवृत्ति धारण किए हुए नैतिकतावादी काव्य साहित्य का पोषक बना। द्विवेदी युगीन आख्यानात्मक काव्य परंपरा की पृष्ठभूमि में प्रकृति का आलंबन लिए कवि की आत्माभिव्यक्ति की एक नवीन परंपरा ने जन्म लिया। भारत में छायावादी कविता का आरंभ रवीन्द्रनाथ की भाववादी कविता से सिद्ध होता है। निस्संदेह भारत में छायावादी काव्य के विकास में  अँग्रेज़ी की रोमांटिक कविता का कमोबेश योगदान है।  अँग्रेज़ी के विलियम वर्ड्सवर्थ (1770-1850), कॉलरिज, कीट्स, शैली और बायरन की स्वच्छंद रोमांटिक आत्माभिव्यक्तियों का प्रभाव हिंदी की छायावादी कविताओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। किन्तु हिंदी एवं इतर भाषाओं में छायावादी कविता भारतीय साहित्यिक परिवेश से ही उद्भूत काव्य परंपरा के रूप में विकसित हुई। 

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के समय तक (1918-1920) आधुनिक हिंदी कविता में कुछ नई प्रवृत्तियों के लक्षण स्पष्ट होने लगे थे। इन प्रवृत्तियों को आधार मानते हुए इसे हिंदी कविता के विकास का (प्रथम उत्थान – भारतेन्दु युग और द्वितीय उत्थान – द्विवेदी युग के क्रम में) तृतीय उत्थान कहा गया जिसे ‘छायावाद युग‘ की संज्ञा दी गई। यह युग जयशंकर प्रसाद (1889-1937) के ‘झरना’ काव्य के प्रकाशन (1918) से आरंभ होकर उनके माहाकाव्य ‘कामायनी‘ (1937) तक अपनी चरम परिणति तक पहुँचा और उनकी मृत्यु (1937) के पश्चात क्षीण पड़ने लगा। 

छायावाद युग का आरंभ कब से माना जाए, इसे लेकर विद्वानों में परस्पर मतभेद हैं। रामचन्द्र शुक्ल इसका प्रारम्भ मैथिलीशरण गुप्त के काव्य से मानते हैं। उनके ‘झंकार’ संग्रह में इस प्रवृत्ति के दर्शन होने लगे थे। इलाचन्द्र जोशी, जयशंकर प्रसाद की कविताओं के ‘इन्दु‘ पत्रिका में प्रकाशन (1913-14 ई ) से छायावाद का प्रवर्तन स्वीकार करते हैं। नन्ददुलारे वाजापेयी का अभिमत है – “साहित्यिक दृष्टि से छायावादी काव्य-शैली का वास्तविक अभ्युदय सन् 1920 के पूर्व-पश्चात सुमित्रानंदन पंत की ‘उच्छ्वास‘ नाम की काव्य-पुस्तिका के साथ माना जा सकता है।" 

‘छायावाद‘ नाम को लेकर भी इसी प्रकार के मतभेद विद्वानों के बीच रहे। रामचन्द्र शुक्ल के विचार से “पुराने ईसाई संतों के छायाभास तथा यूरोपीय काव्यक्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (symbolism) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगाल में ऐसी कविताएँ छायावादी कही जाने लगी थीं।“ अत: हिंदी में भी इस तरह की कविताओं का नाम छायावाद चल पड़ा। हजारी प्रसाद द्विवेदी इस मत का खंडन करते हुए कहते हैं कि बँगला में ‘छायावाद‘ नाम कभी चला ही नहीं। सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित ‘श्री शारदा‘ पत्रिका के चार अंकों में ‘हिंदी में छायावाद‘ शीर्षक से मुकुटधर पाण्डेय के लेख प्रकाशित हुए थे जिसके आधार पर मुकुटधर पाण्डेय को ही ‘छायावाद‘ शब्द के प्रथम प्रयोक्ता के रूप- में स्वीकार किया जाता है। 

छायावाद को परिभाषित करने के भी बहुविध प्रयत्न हुए। एक तरफ़ यदि ‘छाया‘ शब्द को किसी कविता के भावों की छाया का कहीं अन्यत्र जाकर पड़ना कहकर समझा गया या उसे अस्पष्टता के अर्थ में ग्रहण किया गया तो दूसरी तरफ़ रामचन्द्र शुक्ल ने उसे स्वच्छंदतावाद से अलग करते हुए एक ओर रहस्यवाद के तो दूसरी ओर प्रतीकवाद या चित्तभाषावाद की अभिव्यंजना-प्रणाली या काव्य-शैली के अर्थ में ग्रहण किया। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने उसे अभिव्यंजनावाद मानते हुए पूर्व प्रचलित काव्य-शैली के प्रति विद्रोह की अभिव्यक्ति के रूप में देखा। नगेन्द्र ने ‘स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह‘ घोषित करते हुए उसे द्विवेदी युग की नैतिकता से उत्पन्न और कुंठायुक्त होने का आरोप लगाया – “स्वप्नों और निराशा के छायाचित्रों की काव्यागत समष्टि“। 

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने उसे रहस्यवाद या आध्यात्मिक काव्य से अलग मानते हुए धार्मिकता से भिन्न उसके मानवीय, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक पक्ष को उजागर किया और उसे बीसवीं शताब्दी की मानवीय प्रगति की प्रतिक्रिया के रूप में स्वीकार किया। छायावादी कविता उन्हें प्राकृतिक सौन्दर्य और सामयिक जीवन परिस्थितियों से अनुप्राणित समस्त मानव- अनुभूतियों की व्यापकता से पूर्ण प्रतीत हुई; उन्होंने उसकी मूल प्रवृत्ति को प्रतिक्रियात्मक बताया और उसे रहस्यवाद, अध्यात्मवाद, स्वच्छ्न्दतावाद, मानवतावाद, राष्ट्रीयता और सूक्ष्म सौंदर्य-बोधात्मक प्रवृत्तियों की समष्टि के रूप में स्वीकार किया। जयशंकर प्रसाद ने वेदना को आधार मानकर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्तियाँ कीं और यह स्वीकार किया कि आभ्यंतर सूक्ष्म भावों की प्रेरणा से बाह्य स्थूल आकार में भी विविधता उत्पन्न हो जाती है। उनकी दृष्टि से इस प्रकार की सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति ने नवीन पदविन्यास और नवीन शैली को भी प्रवर्तित किया। अत: छायावाद एकांत अभिव्यक्ति शैली ही नहीं है, प्रत्युत उसका अनुभूति और भाव पक्ष से भी उतना ही गहरा संबंध है। उन्हीं के शब्दों में, “छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है। ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौंदर्यमय प्रतीक-विधान तथा उपचार वक्रता के साथ अनुभूति की अभिव्यक्ति छायावाद की विशेषताएँ हैं।“ महादेवी वर्मा की दृष्टि में छायावाद द्विवेदीयुगीन कविता की इतिवृत्तात्मकता के प्रति कोमल और सूक्ष्म भावनाओं का विद्रोह है। वस्तुत: छायावाद जीवन के प्रति ऐसी भावात्मक दृष्टि लेकर उपस्थित हुआ कि उसके सामने द्विवेदी युगीन बुद्धिवाद और आदर्शवाद पीछे छूट गए। स्वानुभूतिपूर्ण आत्माभिव्यक्ति की प्रधानता के कारण उसमें स्वच्छंदतावाद के अनेक तत्व समाहित होते चले गए। आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति, कल्पना की अतिशयता, सौन्दर्य के प्रति अत्यधिक आकर्षण, विस्मय की भावना, सर्वात्मवादी चिंतन, सभी प्रकार की रूढ़ियों के प्रति विद्रोह तथा लौकिक और आध्यात्मिक प्रेम और उन्मुक्त प्रेम की प्रवृत्ति उसे स्वच्छंदतावाद से विरासत में मिली। 

छायावादी काव्य में राष्ट्रवाद के तत्व कुछ अधिक सूक्ष्म और कलात्मक रूप में उभरे। वैयक्तिक और सामाजिक विषमताओं के प्रति संघर्ष और उसमें सफलता प्राप्त न होने की स्थिति से उत्पन्न वेदना, अंतर्मुखता तथा कर्म-जगत से पलायन, बौद्ध दर्शन का दुखवाद और करुणा, प्रकृति के प्रति विस्मय भाव, उसमें चेतन सत्ता का आरोप तथा परोक्ष सत्ता की अभिव्यक्ति का योग भी इस काव्य को मिला। नारी के प्रति रीतिकालीन घोर शृंगारिकता और द्विवेदीयुगीन घोर नैतिकता से अलग प्रवृत्ति के समान ही आदर, विस्मय, कौतूहल और अतींद्रिय शृंगार की मिली-जुली भावना ने इस काव्य को एक भिन्न गरिमामय सौन्दर्य से युक्त किया। नारी मात्र प्रेमिका और पत्नी के रूप से आगे बढ़कर ‘सहचरी‘ और ‘श्रद्धा‘ बनकर सामने आई। ऐसी भावनाओं को सहेजने की प्रवृत्ति छायावादी कवियों को  अँग्रेज़ी के रोमांटिक कवियों के साथ-साथ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं से मिली होगी। अँग्रेज़ी में छायावादी युग (रोमांटिक काव्य – age of romanticism) सन् 1770 से 1850 के मध्य का माना गया है। विलियम वर्ड्सवर्थ का जीवन काल सन् 1770 से 1850 ही है। अँग्रेज़ी में वर्ड्सवर्थ के साथ कॉलरिज दूसरे प्रमुख छायावादी कवि हैं। 

प्रकृति में व्याप्त अज्ञात सत्ता को निरूपित करने के प्रयास में छायावादी कविता में रहस्यवादी तत्व का भी प्रतिफलन हुआ जिसके अंतर्गत अज्ञात के प्रति जिज्ञासा और कुतूहल से लेकर प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति हुई। लौकिक प्रेम पर अलौकिक प्रेम का आवरण चढ़ाकर, प्रकृति के कण-कण में चेतना को आरोपित कर, सौंदर्यानुभूति और स्वानुभूति के सहारे आध्यात्मिक भावना को रहस्यवादी निरूपित किया गया। इस तरह छायावाद की व्याख्या मूलत: त्रिआयामी हो गई - ‘प्राचीन रूढ़ियों से मुक्ति का आकांक्षा, अज्ञात के प्रति जिज्ञासा और स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह‘। ये तीनों वैचारिक सिद्धान्त ही क्रमश: स्वच्छंदतावाद, रहस्यवाद और छायावाद के लिए रूढ़ हो गए। इस प्रकार छायावाद के साथ-साथ स्वच्छंदतावाद और रहस्यवाद के तत्व निरंतर अभिव्यक्ति पाते हैं। छायावाद-रहस्यवाद में भाव के स्तर पर अंतरजगत की आत्मनिष्ठ और वैयक्तिक अनुभूति, मानवीकरण, शृंगाकारिकता और प्रेम की प्रधानता, विरह-वेदना और रहस्यानुभूतिपूर्ण विस्मय और कुतूहल का भाव, पलायन की भावना, अतीत के प्रति आकर्षण, व्यक्तिगत सुख-दुखानुभूति, निराशा और मस्ती की विशेष रूप से अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। 

शैली के स्तर पर छायावाद ने पदलालित्य, चित्रमय भाषा, संगीतात्मकता, लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यार्थ व्यंजना, प्रदान कर पहली बार खड़ी बोली को काव्य भाषा के शिखर पर प्रतिष्ठित किया। इसी युग में कविता पहली बार छंदों से बंध से मुक्त हुई – “खुल गए छंद के बंध और परास के रजत पाश“। अब रूढ़ अलंकार प्रणाली के स्थान नई अभिव्यंजना का समादर हुआ। भाषा तत्सम प्रधान हुई। 

छायावादी कविताओं में कल्पना की प्रधानता, कोमल और मृदुल भावों की अभिव्यक्ति के साथ-साथ लोकमंगल की भावना से पूर्ण ओजस्वी और पौरुष से पूर्ण भावों की अभिव्यक्ति करने वाली रचनाओं की भी प्रचुरता है। इस क्रम में प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी की अनेक छोटी-बड़ी कविताओं को देखा जा सकता है। प्रसाद और निराला तो विशेष रूप से राष्ट्र-शक्ति को जगाए रखने और उसे प्रेरित करते रहने में समर्थ हुए। छायावाद की राष्ट्रीय भावना तथा मानवतावादी जीवन-दृष्टि ने ही प्रकारांतर से उस युग में लोकमंगल की भावना का संचार किया। ‘कामायनी‘ के साथ उस युग अनेक रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 

छायावादी काव्य की मूलभूत प्रवृत्तियों के संदर्भ में इसे पलायनवादी और अतिकाल्पनिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी कहा गया। किन्तु वास्तव में छायावाद महज संध्या सुंदरी, चाँदनी रात या नौका विहार का ही चित्र नहीं है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार वह मूलत: शक्ति काव्य है, पुनर्जागरण चेतना का व्यापक और सूक्ष्म स्वरूप है, और अपनी अर्थ प्रक्रिया में मानव व्यक्तित्व को गहरे स्तरों पर समृद्ध करता है। इस युग की प्रतिनिधि रचना जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी‘ में देव और असुर संस्कृतियों से भिन्न, और उनकी तुलना में अधिक सर्जनात्मक मानवीय संस्कृति के विकास का आख्यान है, उसके वर्तमान संकट की समझ है और इस संकट से बचाव की संभाव्य दिशा संकेतित है। थके और पराजित मनु के प्रति अपने उद्बोधन का समापन श्रद्धा इन शब्दों में करती है – 

“शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त 
`विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करे समस्त 
विजयनी मानवता हो जाय।“ 

यहाँ मूल संदेश शक्ति के नियोजन का है और संदर्भ राष्ट्रीय होते हुए भी चिंता समस्त मानवता की है। इसी के समानान्तर स्थिति निराला की लंबी कविता ‘राम की शक्ति पूजा‘ में है। रावण के पक्ष में शक्ति आ गई है, राम यह समझ कर स्तब्ध और हताश हैं – 

’अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति‘ कहते छल-छल 
हो गए नयन, कुछ बूँद पुन: ढलके दृगजल। 

प्रसाद के मनु और निराला के राम की हताश मन:स्थिति बहुत कुछ मिलती-जुलती है। मनुष्य मात्र के जीवन में कभी न कभी ऐसी मन:स्थिति आती है जब उसके मुँह से निकल जाता है – ‘अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति‘। पर मनुष्य का साहस और सर्जन क्षमता उसका अतिक्रमण करती है। जांबवान राम को परामर्श देते हैं – 

“शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन, 
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो रघुनन्दन!“

‘राम की शक्ति पूजा’,’तुलसीदा’, और ’कामायनी‘ में ही नहीं प्रसाद के ‘आँसू‘ में भी जिसे छायावादी परिदृश्य के अंतर्गत विरह काव्य के रूप में स्वीकार किया जाता है, सामान्य द्वंद्व और संघर्ष को अतिक्रमित कर जाने की प्रक्रिया अंकित हुई है। ‘कामायनी‘ में सुख-दुःख के द्वंद्व से ऊपर उठाकर आनंद की जो स्थिति है कुछ वैसी स्थिति ‘आँसू‘ में वेदना की है। इसीलिए वेदना को कवि ने कहा है – ‘जगद्वंद्वों के परिणय की है सुरभिमयी जयमाला।‘ ‘आँसू‘ के अंतिम अंशों में पहुँचकर कवि का विरह भाव सार्वभौम वेदना में रूपांतरित हो जाता है। यहाँ कवि का अनुभव इतना सघन हो उठता है कि उसे प्रकृति में और मानवता मे, जहाँ कहीं पीड़ा दिखती है, वह उसे अपनी वेदना का ही रूप लगती है। यह वेदना का अद्वैत है। इन सारी पीड़ाओं के तत्व में उसे रचना की उपलब्धि होती है –

“सब का निचोड़ लेकर तुम 
सुख के सूखे जीवन में 
बरसो प्रभात हिमकन-सा 
आँसू इस विश्व-सदन में!“

‘आँसू‘ की सघन वेदना में से निराशा का स्वर नहीं उपजता, उसमें से विराट रचना-आस्था फूटती है। वेदना के आलोक का सर्वव्यापी प्रसार महादेवी वर्मा ने एक दूसरे स्तर पर आत्मीयता से चित्रित किया है – 

‘सब आँखों के आँसू उजाले, सब के सपनों में सत्य पला।‘ 

छायावाद के विशिष्ट काव्यों और लंबी कविताओं के अतिरिक्त छोटे गीतों और स्फुट कविताओं में भी मूलत: पुनर्जागरण की चेतना अतर्व्याप्त दिखाई देती है। छायावादी कविता मध्यकालीन हिंदी मानसिकता का जैसे कायाकल्प कर देती है। संन्यास, वैराग्य, तपस्या और परलोकवाद में आस्था जैसे मूल्यों के स्थान अब ऐहिक जीवन, इहलोक और मानव शरीर के आकरशन का महत्व प्रतिपादित होता है। निष्काम कर्म की जगह प्रसाद की ‘कामायनी‘ में कर्म और भोग के सामंजस्य का गुण-गान हुआ है । कबीर, सूर, जायसी, तुलसी भक्ति काल के अंतर्गत संसार का निषेध करके परम तत्व की ओर मन को ले जाने का उपक्रम करते हैं। छायावाद के कवि इस संसार को पूरी तरह साकार के उस परम तत्व से अभिन्न देखते हैं। 

छायावादी काव्य में शक्ति के आवाहन का एक और रूप इस युग के जागरण गीतों में मिलता है। पुनर्जागरण चेतना की बड़ी सूक्ष्म और प्रीतिकर अभिव्यक्ति इन गीतों में हुई है। मनुष्य की और प्रकृति की भी सुप्त चेतना को जगाने का उपक्रम यहाँ कवि ने सामान्यत: प्रशमित और कभी-कभी ओज की मुद्रा में किया है। छायावादी काव्य में एक बड़ी संख्या इन प्रभाती और जागरण गीतों की है, जिनमें एक और शक्ति और चैतन्य का आवाहन है, और एक दूसरे तथा समकालीन संदर्भ में वे राष्ट्रीय स्वाधीनता के संघर्ष से जुड़े हैं। ‘प्रथम प्रभात, आँखों से अलख जगाने को, अब जागो जीवन के प्रभात!, बीती विभावरी जाग री!, (प्रसाद), ‘जागो फिर एक बार, प्रिय, मुद्रित दृग खोलो!, जागा दिशा ज्ञान, जागो जीवन धनिके! (निराला), ‘जाग बेसुध जाग, जाग तुझको दूर जाना!‘ (महादेवी), ‘प्रथम रश्मि, ज्योति भारत’ (सुमित्रानंदन पंत) जैसी अनेक जागरण की कविताएँ स्मरण हो आती हैं। इनमें से कुछ गीतों में व्यक्तिगत प्रणय और राष्ट्र-जागरण के भाव एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं। मानवीय प्रणय और देश-प्रेम का संश्लिष्ट रूप वस्तुत: छायावादी काव्य से पहले ही श्रीधर पाठक, नरेश त्रिपाठी आदि स्वच्छंदतावादी कवियों की रचनाओं में मिलने लगता है, रामनरेश त्रिपाठी के खंड काव्य ‘पथिक‘ और ‘स्वप्न‘ का विधान मुख्यत: इसी वस्तु पर विकसित हुआ है। मुख्य बात यह है कि छायावादी काव्य के इस बहुत बड़े अंश में पुनर्जागरण की चेतना सीधे प्रकट होती है। गीतों के अतिरिक्त लंबी कविताओं के खंडों में जागरण का यह स्वर गूँजता है। ‘आँसू‘ के परवर्ती हिस्से में एक पूरे का पूरा खंड प्रात:कालीन बिंबों के बीच जागरण-बेला का चित्रण करता है –

वह मेरे प्रेम विहँसते
 जागो, मेरे मधुवन में 
फिर मधुर भावनाओं का 
कलरव हो इस जीवन में! 
मेरी आहों में जागो 
सुस्मित में सोने वाले!

जागरण गीतों के साथ साथ छायावाद के सांध्य गीतों की भी अपनी विशेषता है। कवि के रचनात्मक एकांत को निपट सन्नाटे में खोलने वाले इन गीतों की अपनी विशिष्ट स्थिति है। संध्या का एकांत और अवसाद रचनाकारों के लिए निरंतर आकर्षक रहा है। छायावाद के सांध्य गीतों में सहज स्मरणीय हैं – ‘विषाद‘ (प्रसाद), ‘संध्या सूदनरी’ (निराला), ‘एक तारा‘ (सुमित्रानंदन पंत), ‘प्रिय! सांध्य गगन, मेरा जीवन!‘ (महादेवी)। महादेवी ने तो अपने एक संकलन का नाम ही रखा है – ‘सांध्यगीत‘। जागरण गान और सांध्य गीतों के इस अंतर्विरोध में छायावाद का मूल स्वभाव ग्राह्य है। छायावाद के रोमांटिक स्वरूप में एक ओर उसका विद्रोह-भाव उभरता है तो दूसरी ओर उसका अंतर्विरोधी चरित्र। 

आधुनिक हिंदी साहित्य में स्त्रीवादी चिंतन को स्वरूप प्रदान करने में छायावादी कविता की भूमिका महत्वपूर्ण है। स्त्री को पति की अनुगामिनी की स्थिति से उबारकर उसे सहगामिनी और उससे से भी आगे पथ प्रदर्शक की भूमिका में स्थापित करने का श्रेय जयशंकर प्रसाद को ही है। ‘कामायनी‘ में श्रद्धा, मनु की अनुगामिनी नहीं बल्कि उसकी मार्गदर्शक बनकर उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाने का कर्तव्य निर्वाह करती है। ‘कामायनी’ में प्रसाद ने समरसता का दर्शन स्वीकार किया है तथा मनु की कथा के द्वारा जीवन के विविध क्षेत्रों में सामंजस्य की आवश्यकता पर बल दिया है। सामंजस्य और संतुलन के अभाव में ही मनु जीवन में अनेक कष्टों और विघ्नबाधाओं से गुज़रते हैं। श्रद्धा, मनु के प्रति अपने को समर्पित करती है पर मनु उसे छोड़कर पलायन कर जाते हैं। वे ‘इड़ा’ को भी समझने में असफल होते हैं। वे नारी सत्ता को समझने में भूल करते हैं – 

“तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में 
कुछ सत्ता है नारी की 
समरसता ही संबंध बनी 
अधिकार और अधिकारी की।“     (कामायनी)

अंत में श्रद्धा का अनुसरण कर ही मनु आनंद लोक पहुँचते हैं। प्रसाद के अनुसार नारी और पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के सामंजस्य के बिना आनंद की प्राप्त संभव नहीं। कामायनी में मनु और श्रद्धा का मिलन दो प्रवृत्तियों का भी सामंजस्य है। मनु व्यक्तिवादी, अहंकारी, स्वेच्छाचारी और निरंकुश है। श्रद्धा विश्वमंगल की कामना करने वाली एक कोमल, उदार, सात्विक, आदर्शमयी नारी है – दया, माया, ममता, विश्वास और प्रेम से युक्त। प्रसाद के काव्य में प्रकृति और मानव का सौन्दर्य अपने पूरे वैभव के साथ छितरित हुआ है जो कि छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषता है। नारी को उन्होंने असाधारण स्थान दिया है। वे उसे पुरुष से भी महान और विशिष्ट मानते हैं। छायावादी काव्य की यह सबसे बड़ी विशेषता है। नारी प्रसाद की दृष्टि में श्रद्धारूपिणी है।         

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो 
विश्वास रजत नाग पग तल में 
पीयूष स्रोत सी बहा करो 
जीवन के सुंदर समतल में।“  (कामायनी) 

छायावादी कविता ने नारी के प्रति विशेष श्रद्धा का भाव जगाया है। वांछित स्त्री का वरण करने के लिए जयशंकर प्रसाद ने पुरुष (मनु) को नारी (श्रद्धा) के योग्य बनने का संदेश ‘कामायनी ‘ में ‘काम‘ के माध्यम से दिया है। यह छायावादी कविता की सार्वकालिक प्रासंगिकता को पुष्ट करता है। 

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