छपास की प्यास

हरि लखेडा

आजकल मैं बड़ा ख़ुश हूँ। जो भी लिखूँ , जैसे भी लिखूँ  फ़टाक से छप जाता है। 

उन दिनों की याद आती है तो शर्म आती है। लिखते, काटते, फिर लिखते और कभी-कभी तो लिखे हुये कई पन्ने फाड़ देते। हर समय लगता, छपेगा नहीं। बड़ी हिम्मत से कुछ पत्रिकाओं में भेज भी देते तो यही लगता कि शायद छप जाय पर ढाक के वही तीन पात। हर आने वाले अंक की इंतज़ार में रहते और जब आता तो अपना लेख ना पा कर लगता कि एक बार फिर बस निकल गई। संपादक इतने ढीठ कि लेख वापस करना तो दूर रिजेक्शन का पत्र तक नहीं भेजते। ग़नीमत है कि टाइपिंग आती थी, सो एक कार्बन कापी रखी रहती थी।

संपादक के नाम पत्र में कोशिश की। दो-चार बार छप गये तो लगा बाज़ी मार ली। फिर दनादन पत्र भेजने शुरू कर दिये। वे भी समझ गये छपास की प्यास से ग्रसित है। उन्होंने भी मुँह मोड़ लिया। नौकरी के दौरान कंपनी की हाउस मेगज़ीन  में छपे तो पर वह भी कोई छपने में छपना है। 

पर लिखना बंद नहीं हुआ। काफ़ी रद्दी घर मे जमा हो गयी और एक दिन ख़ुद ही कबाड़ी को बेच दी। पर लिखने की लत जब लग जाती है तो छूटती नहीं। दोस्तों से पता चला कि जब तक प्रसिद्ध नहीं हो जाते कोई भी संपादक जोखिम नहीं लेगा। यह तो वही बात हुई, अनुभव नहीं तो नौकरी नहीं। अरे भाई काम दोगे तभी तो अनुभव होगा; पर नहीं, हमको तो अनुभवी ही चाहिये। नाम तो जब होगा जब आप छापोगे, लोग पढ़ेंगे। पर नहीं हमको तो नामधारी लेखक ही चाहिये। 

किसी ने कहा, मेल-जोल बढ़ाओ। संपादकों से मिलो। गिफ़्ट-शिफ़्ट दो। बस यही हम नहीं कर पाये। फिर जब रद्दी जमा हो गई तो किसी ने कहा, ख़ुद छपवा लो। सोचा शौक़ पूरा करने के लिये यह भी कर लें। एक प्रकाशक से मिले। सौदा तय हुआ। उसने साफ़ शब्दों मे बता दिया कि ओ छपाई के सारी क़ीमत अग्रिम लेगा और अपने स्टाल में लगा भी देगा पर बेचने की गारंटी उसकी नहीं है। सोचा हमको कौन सा किताब बेचकर महल खड़ा करना है। बस छप जाय और स्टाल पर चली जाय। दुनिया को पता चल जायेगा कि इस नाम का भी कोई लेखक है। दोस्त और जान-पहचान के लोग शर्मा-शर्मी ही सही, ख़रीद भी लेंगे। 

और किताब छप भी गई, स्टाल मे भी पहुँच गई। प्रकाशक ने २०० कॉपी के पैसे लिये थे। ५० कॉपी घर भिजवा दीं। कुछ हमने अपने नज़दीकी मित्रों को दे दीं और कह दिया कि और लगें तो स्टाल से ले सकते हैं। हफ़्ते में एक बार प्रकाशक से मालूम करते तो यही जबाब आता भैय्या, सब वैसे ही पड़ी हैं। जाने-माने लेखक नहीं बिक रहे हैं, आप तो अभी नये हो। एकदिन उसने बाकी १५० कॉपी भी घर भिजवा दीं। रिक्शे वाले का पेमेंट भी ख़ुद को ही करना पड़ा। जैसे-तैसे उनको निपटाया। जिससे थोड़ी सी भी पहचान थी, एक कॉपी पकड़ा दी। सबको पता था कि बिकी नहीं इसलिये बाँट रहा हूँ पर दोस्ती के नाते बोले कुछ नहीं। वैसे सारे शहर को पता लग गया था कि असफल लेखकों में एक नाम और जुड़ गया है। आज भी कुछ कॉपी कोने में पड़ी-पड़ी मुझे मुँह चिढ़ाती रहती हैं। 

फिर इंटरनेट का ज़माना आया। फ़ेसबुक ने तो कमाल ही कर दिया। पहले फ़ेसबुक एकाउंट खोला और फिर दनादन छपाई शुरू कर दी। फिर पता चला कि यहाँ कई ग्रुप और सब ग्रुप हैं। उनमें शामिल हो लिये। फिर दनादन छपाई। गूगल को टटोला तो पता चला फ़ेसबुक के बाहर भी दुनिया है। एक-एक को ढूँढ़ निकाला। और फिर दे दनादन छपाई। 

मुझे उन संपादकों और प्रकाशकों को इतना ही कहना है कि वे साथ देते तो उनका ही फ़ायदा था। आज मेरा नाम है। हर ग्रुप में मेरे लेख छपे हैं। और बहुत सारी लाइक्स भी मिलती हैं। कुछ तो पढ़कर कमेंट भी करते हैं। न तो मुझे किसी संपादक की सेवा करनी पड़ती है, न किसी प्रकाशक को पैसा देना पड़ता है और ना ही छपी हुई किताबें ख़ुशामदी तौर पर बाँटनी पड़ती हैं। ना ढूँढ़-ढूँढ़ के जान पहचान निकालने की ज़रूरत। न किसी को किताब का अनावरण करने के लिये हाथ जोड़ने पड़ते हैं, न सबसे गुज़ारिश करनी कि अमुक दिन मेरी किताब का अनावरण है, प्लीज़ आना ज़रूर। टीवी और इंटरनेट के ज़माने में किस को फ़ुरसत है कि किताब पढ़ेगा और वह भी ख़रीदकर! किताब महल, किताब घर बंद हो गये या होने की कगार पर हैं। अच्छे-अच्छे लेखकों की किताब इंटरनेट पर मिल जाती हैं ई-बुक के रूप में।

अब आप समझ ही गये होंगे कि मेरी ख़ुशी का क्या राज़ है! 

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