बिछिया : एक रुकी हुई माफ़ी

01-01-2020

बिछिया : एक रुकी हुई माफ़ी

अजय अमिताभ 'सुमन'

अनिमेश आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। बचपन से ही अनिमेश के पिताजी ने ये उसे ये शिक्षा प्रदान कर रखी थी कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए एक आदमी का योग्य होना बहुत ज़रूरी है। अनिमेश अपने पिता की सिखाई हुई बात का बड़ा सम्मान करता था। उसकी दैनिक दिनचर्या किताबों से शुरू होकर किताबों पे ही बंद होती थी। हालाँकि खेलने कूदने में भी अच्छा था। 

नवम्बर का महिना चल रहा था। आठवीं कक्षा की परीक्षा दिसम्बर में होने वाली थी। परीक्षा काफ़ी नजदीक थी। अनिमेश अपनी किताबों में मशगुल था। ठण्ड पड़नी शुरू हो गयी थी। वो रजाई में दुबक कर अपनी होने वाली वार्षिक परीक्षा की तैयारी कर रहा था। इसी बीच उसकी माँ बाज़ार जा रही थी। अनिमेश की माँ ने उसको 2000 रुपये दिए और बाज़ार चली गयी। वो रुपये अनिमेश को अपने चाचाजी को देने थे। 

अनिमेश के चाचाजी गाँव में किसान थे। कड़ाके की ठण्ड पड़ने के कारण फ़सल ख़राब हो रही थी। फ़सल में खाद और कीटनाशक डालना बहुत ज़रूरी था। अनिमेश के बड़े चाचाजी दिल्ली में प्राइवेट नौकरी कर रहे थे। उन्होंने ही वो 2000 रुपये गाँव की खेती के लिए भेजवाए थे। अनिमेश की माँ ने वो 2000 रुपये अनिमेश को दिए ताकि वो अपने गाँव के चाचाजी को दे सके। अनिमेश पढ़ने में मशग़ूल था। उसने रुपयों को किताबों में रखा और फिर परीक्षा की तैयारी में मशग़ूल हो गया। 

इसी बीच बिछिया आई और घर में झाड़ू-पोछा लगाकर चली गई। जब गाँव से चाचाजी पैसा लेने आये तो अनिमेश ने उन रुपयों को किताबों से निकालने की कोशिश की। पर वो ग़ायब हो चुके थे। अनिमेश के मम्मी-पापा ने भी लाख कोशिश की पर वो रुपये मिल नहीं पाए। या तो वो ज़मीं में चले गए थे या आसमां में ग़ायब हो गये थे। खोजने की सारी कोशिशें बेकार गयीं। ख़ैर अनिमेश के पापा ने 2000 रुपये ख़ुद ही निकाल कर गाँव के चाचाजी को दे दिए। रुपयों के ग़ायब होने पे सबको ग़ुस्सा था। अनिमेश पे शक करने का सवाल ही नही था। काफ़ी मेहनती, आज्ञाकारी और ईमानदार बच्चा था। स्कूल में दिए गए हर होम वर्क को पूरा करता। वो वैसे ही पढ़ाई-लिखाई में काफ़ी गंभीर था, तिस पर से उसकी परीक्षा नज़दीक थी। इस कारण अनिमेश के पिताजी ने अनिमेश ने ज़्यादा पूछताछ नहीं की।

बिछिया लगभग 50 वर्ष की मुसलमान अधेड़ महिला थी। उसका रंग काला था। बिच्छु की तरह काला होने के कारण सारे लोग उसे बिछिया ही कह के पुकारते थे। उसके नाम की तरह उसके चेहरे पे भी कोई आकर्षण नहीं था। साधारण सी साड़ी और बेतरतीब बाल और कोई साज शृंगार नहीं। तिस पर से साधारण नाक-नक़्श। इसी कारण से वो अपने पति का प्रेम पाने में अक्षम रही। उसकी शादी के दो साल बाद ही उसके पति ने दूसरी शादी कर ली। ज़ाहिर सी बात है, बिछिया को कोई बच्चा नहीं था। नई दुल्हन उसके साथ नौकरानी का व्यवहार करती। 

बिछिया बेचारी अकेली घुट-घुट कर जी रही थी। अकेलेपन में उसे बीड़ी का साथ मिला। बीड़ी पीकर अपने सारा ग़म भुला देती। जब बीड़ी के लिए रुपये कम पड़ते तो कभी-कभार अपने पति के जेब पर हाथ साफ़ कर देती। दो तीन बार उसकी चोरी पकड़ी गयी। अब सज़ा के तौर पर उसे अपनी जीविका ख़ुद ही चलानी थी। उसने झाड़ू-पोछा का काम करना शुरू कर दिया। इसी बीच उसका बीड़ी पीना जारी रहा।

पर आख़िर में रुपये गये कहाँ? अनिमेश चुरा नहीं सकता। घर में बिछिया के आलावा कोई और आया नहीं। हो ना हो, ज़रूर ये रुपये बिछिया ने ही चुराये हैं। सबकी शक की नज़र बिछिया पे गयी। किसी कौए को कोई बच्चा पकड़ कर छोड़ देता है तो बाक़ी सारे कौए उसे बिरादरी से बाहर कर देते हैं और उस कौए को सारे मिलकर मार डालते हैं। वो ही हाल बिछिया का हो गया था। सारे लोग उसके पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ गए। 

किसी को पड़ोसी से नफ़रत थी। कोई मकान मालिक से परेशान था। कोई अपनी ग़रीबी से परेशान था। किसी की प्रोमोशन काफ़ी समय से रुकी हुई थी। सबको अपना ग़ुस्सा निकालने का बहाना मिल गया था। बिछिया मंदिर का घंटा बन गयी थी। जिसकी जैसी इच्छा हुई, घंटी बजाने चला आया। काफ़ी पूछताछ की गई उससे। काफ़ी जलील किया गया। उसके कपड़े तक उतार लिए गए। कुछ नहीं पता चला। हाँ बीड़ी के 8-10 पैकेट ज़रूर मिले। शक पक्का हो गया। चोर बिछिया ही थी। रुपये न मिलने थे, न मिले।

दिसम्बर आया। परीक्षा आयी और चली गई। जनवरी में रिज़ल्ट भी आ गया। अनिमेश स्कूल में फ़र्स्ट आया था। अनिमेश के पिताजी ने ख़ुश होकर अनिमेश को साईकिल ख़रीद दी। स्कूल में 26 जनवरी मनाने की तैयारी चल रही थी। अनिमेश के मम्मी-पापा गाँव गए थे। परीक्षा के कारण अनिमेश अपने कमरे की सफ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाया था। अब छुट्टियाँ आ रहीं थीं। वो अपनी किताबों को साफ़ करने में गया। सफ़ाई के दौरान अनिमेश को वो 2000 रुपये किताबों के नीचे पड़े मिले। अनिमेश की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। तुरंत साईकिल उठा कर गाँव गया और 2000 रुपये अपनी माँ को दे दिए।

बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला वो आजकल काम पे नहीं आ रही थी। परीक्षा के कारण अनिमेश को ये बात ख़्याल में आई ही नहीं कि जाने कबसे बिछिया ने काम करना बंद कर रखा था। अनिमेश जल्दी से जल्दी बिछिया से मिलकर माफ़ी माँगना चाह रहा था। वो साईकिल उठाकर बिछिया के घर पर जल्दी-जल्दी पहुँचने की कोशिश कर रहा था। और उसके घर का पता ऐसा हो गया जैसे की सुरसा का मुँह। जितनी जल्दी पहुँचने की कोशिश करता, उतना ही अटपटे रास्तों के बीच उसकी मंज़िल दूर होती जाती। ख़ैर उसका सफ़र आख़िरकार ख़त्म हुआ। उसकी साईकिल बीछिया के घर के सामने रुक गई। उसका सीना आत्म ग्लानि से भरा हुआ था। उसकी धड़कन तेज़ थी। वो सोच रहा था कि वो बिछिया का सामना कैसे करेगा। बिछिया उसे माफ़ करेगी भी या नहीं। उसने मन ही मन सोचा कि बिछिया अगर माफ़ नहीं करेगी तो पैर पकड़ लेगा। उसकी माँ ने तो अनिमेश को कितनी ही बार माफ़ किया है। फिर बिछिया माफ़ क्यों नहीं करेगी? और उसने कोई ग़लती भी तो नहीं की। 

तभी एक कड़कती आवाज़ ने उसकी विचारों की शृंखला को तोड़ दिया। अच्छा ही हुआ, उस चोर को ख़ुदा ने अपने पास बुला लिया। ये आवाज़ बिछिया के पति की थी। उसके पति ने कहा, ख़ुदा ने उसके पापों की सज़ा दे दी। हुक्का पीते हुए उसने कहा 2000 रुपये कम थोड़े न होते हैं बाबूजी। इतना रुपया चुराकर कहाँ जाती? अल्लाह को सब मालूम है। बिछिया को टीबी, हो गया था। उस चोर को बचा कर भी मैं क्या कर लेता? और ऊपर से मुझे परिवार भी तो चलाना होता है। अनिमेश सीने में पश्चाताप की अग्नि लिए घर लौट आया। उसके पिताजी ने पूछा, “अरे ये साईकिल चला के क्यों नहीं आ रहे हो? ये साईकिल को डुगरा के क्यों आ रहे हो?” 

दरअसल अनिमेश अपने भाव में इतना खो गया था कि उसे याद ही नहीं रहा कि को साईकिल लेकर पैदल ही चला आ रहा है। उसने बिछिया के बारे में तहक़ीक़ात की। 

अधेड़ थी बिछिया। कितना अपमान बर्दाश्त करती? मन पे किए गये वार तन पर असर दिखाने लगे। ऊपर से बीड़ी की बुरी लत। बिछिया बार-बा बीमार पड़ने लगी। खाँसी के दौरे पड़ने लगे। काम करना मुश्किल हो गया। घर पे ही रहने लगी। हालाँकि उसके पति ने अपनी हैसियत के हिसाब से उसका इलाज कराया। पर ज़माने की ज़िल्लत ने बिछिया में जीने की इच्छा को मार दिया था। तिस पर से उसके पति की खीज और बच्चों का उपहास। बिछिया अपने सीने पे चोरी का इल्ज़ा लिए हुए इस संसार से गुज़र गई थी।

अनिमेश के हृअदय की पश्चाताप की अग्नि शांत नहीं हुई है। चालीस साल गुज़र गए हैं बिछिया को गुज़रे हुए। आज तक रुकी हुई है वो माफ़ी।

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