भूख (सुरेंद्र मनन)

01-01-2020

भूख (सुरेंद्र मनन)

सुरेंद्र मनन 

वह एक सम्वेदनशील और असफल चित्रकार था। ललित कला महाविद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त किए उसे पाँच बरस हो चुके थे और वह घोर मुफ़लिसी में दिन गुज़ार रहा था। हालाँकि शहर की प्रतिष्ठित कला दीर्घा में उसके चित्रों की एकल प्रदर्शनी हो चुकी थी, जिन्हें ख़ूब सराहा भी गया था, फिर भी प्रसंशा अलावा अभी तक उसके हाथ और कुछ न लगा था। उसके साथी चित्रकारों के चित्र जहाँ राज्य स्तर की कला दीर्घाओं से लेकर राष्ट्रीय कला दीर्घाओं की दीवारों पर सुसज्जित थे और विदेशों में भी अच्छे दामों पर बिक रहे थे, वहीं उसके बनाए चित्र कमरे की परछत्ती पर पड़े धूल चाट रहे थे। कला दीर्घाओं के मालिकों और एजेंटों की पार्टियों में जुटे चित्रकारों के बीच उसके बनाये चित्रों की चर्चा कभी-कभार अब भी होती लेकिन उसके हाथ हमेशा ख़ाली ही रहे। दरअसल फ़ितरत से ही कलाकार होने के नाते वह अपने हाथों को ब्रश पकड़ने के अलावा और कुछ सिखा ही न पाया।

धीरे-धीरे स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि रंग और कैनवास ख़रीद पाना तो दूर उसे खाने के भी लाले पड़ गए। सिगरेट और चाय का ख़र्च निकाल कर वह दिन में अक्सर एक बार ही खाना खा पाता। कैनवास की बजाए अब वह साधारण शीट पर चित्र बनाने लगा और जब वह ख़रीद पाना भी मुश्किल हो गया तो रंग-बिरंगे चाक लेकर अपने कमरे की दीवारों पर ही चित्र उकेरने लगा। कई बार तो ऐसा होता कि खाना खाते हुए पैसों का हिसाब लगा कर वह एक रोटी कम खाता ताकि पेंसिल या चाक ख़रीद सके। 

फिर उसके साथ एक अजीब-सी बात हुई। अजीब तो नहीं कहना चाहिए, हाँ ध्यान आकर्षित करने वाली बात ज़रूर थी। वह यह कि जब भी वह कोई चित्र बनाने की सोचता या जब भी काग़ज़ या दीवार पर पेंसिल या चाक से कुछ चित्रित करना चाहता तो किसी न किसी रूप में रोटी का आकार बनने लगता। वह अपना हाथ रोक देता। चित्र दुबारा बनाना शुरू करता लेकिन कुछ देर बाद पाता कि चित्र में रोटी का आधा-अधूरा आकार फिर कहीं न कहीं से झाँक रहा है। इसका कारण तो वह समझ सकता था लेकिन उसका कलाकार मन इसे स्वीकार करने को इसलिए तैयार नहीं था क्योंकि उसे लगता था कि यह स्वीकृति दरअसल उसका समर्पण होगी।

तब उसने यह जानने की कोशिश की कि ऐसा कब होता है? जब उसने दिन भर खाना न खाया हो और चित्र बना रहा हो तब? या जब पैसों का हिसाब लगा रहा हो कि खाना खाया जा सकता है या नहीं, तब? या जब उसे खाने को रोटी मिल गई हो तब? या पेट भरा होने पर भी सोच रहा हो कि अगला खाना मिलेगा या नहीं, तब? 

इस गुंजलक को सुलझाते हुए उसने पाया कि रोटी का आकार दरअसल उसके मस्तिष्क में समा चुका था। स्थिति कैसी भी हो, रोटी उसकी सोच का ज़रूरी हिस्सा बन चुकी थी। उसके कलाकार मन का स्वच्छंद पक्षी खुले आसमान में जब तरह-तरह की उड़ानें भर रहा होता तब भी उसके पंजों में रोटी फँसी होती। अपनी इस हालत से उसे पहली बार डर लगा। क्या सचमुच उसका पतन हो रहा है? क्या भीतर के कलाकार को मरने से वह नहीं बचा पायेगा? अपनी बदहाली के सामने उसने अभी तक घुटने न टेके थे। बल्कि जितना वह दरिद्र होता गया उतना ही ज़िद्दी और जुझारू भी लेकिन अब उसे लग रहा था कि वही उसका साथ छोड़ रहा है जिसे बचाने के लिए इतने सालों तक वह मार सहता रहा। 

बात यहीं तक नहीं रुकी। चित्रकार के इस डर में और इज़ाफ़ा तब हुआ जब उसने पाया कि अब चित्र बनाते हुए ही नहीं, रोटी का आकार उसे हर कहीं, हर जगह दिखाई देने लगा है। वह जिस तरफ़ भी देखता, जिस किसी चीज़ पर उसकी नज़र टिकती, वह रोटी का आकार लेने लगती। चित्रकार बेचैन हो उठा। उसने ख़ुद को अजीब-सी बेबसी और बेकसी की हालत में पाया। मानो उसके भीतर से कुछ अलग होकर उड़ रहा हो और वह उसे पकड़ने के लिए अपने बँधे हाथ-पैरों से मुक्त होने को छटपटा रहा हो।

ऐसी ही हालत में वह एक दिन बाज़ार से गुज़र रहा था कि अचानक एक बेकरी के आगे ठिठक कर खड़ा हो गया। काउंटर के कोने में एक अधपकी पावरोटी पड़ी थी- टेड़ी-मेड़ी, एक तरफ़ से फूली, दूसरी तरफ़ से पिचकी, थोड़ी सी जली हुई। दुकानदार ने उसे बेकार समझ कर एक तरफ़ रख दिया था। चित्रकार की नज़र उसी पर गड़ी हुई थी। वह उसे ऐसी हथेली जैसी लग रही थी जिसकी उँगलियाँ कटी हुई हों। देर तक वह वहीं खड़ा जाने क्या-क्या सोचता रहा। दुकानदार ने जब उससे पूछा कि उसे क्या चाहिए तो वह कुछ न बोला, बस टकटकी लगाए उस बेढंगी पावरोटी को ही देखता रहा।

उस रात वह सो नहीं पाया। अपने कमरे के फ़र्श पर पड़ा बचैनी में देर तक वह करवटें बदलता रहा। फिर उठ कर उसने परछत्ती पर पड़े अपने चित्रों को उतारा। उन्हें झाड़-पोंछ कर उसने दीवार के साथ टिका कर रख दिया और चौकड़ी लगा कर उनके सामने बैठ गया। एक-एक करके उन्हें देखते हुए वह उन सब दृश्यों, घटनाओं, स्थितियों और विचारों को याद करने लगा जिनसे प्रेरित होकर उसने वे चित्र बनाए थे। वह फिर से उन आत्मीय और अन्तरंग मनस्थितियों में डुबकियाँ लगाने लगा जिनमें उसके ब्रश से भिन्न-भिन्न रंग कैनवास पर बिछल कर वह सब कुछ बयान करते थे जो अपनी कला के ज़रिये वह कहना चाहता था। चित्र अभी तक वे सब भाव, वे विचार और वृतांत नहीं भूले थे। परछत्ती से नीचे उतर कर वे अभी भी वही सब बोल रहे थे और चित्रकार बड़े ध्यान से उन्हें सुन रहा था।        

अचानक चित्रकार उठा। उसने सब चित्रों को इक्कठा करके कमरे के बीचों-बीच ढेर लगा दिया। कुछ ही देर बाद ढेर से धू-धू आग की लपटें उठ रही थीं और एक कोने में खड़ा चित्रकार चुपचाप अपने चित्रों को ऐंठ-ऐंठ कर राख होते देख रहा था।   

दूसरे दिन सुबह ही चित्रकार फिर उसी दुकान पर पहुँचा। दुकानदार से उसने कहा कि वह उसके यहाँ नौकरी करना चाहता है। दुकानदार उसे पहचान गया था लेकिन यह न समझ पाया कि आख़िर वह नौकरी क्यों करना चाहता है? चित्रकार ने बताया कि वह उससे पावरोटी और केक बनाने का काम सीखना चाहता है और बदले में वह दुकान के सब काम करने को तैयार है। और यह भी कि उसे खाने के लिए सिर्फ़ रोटी चाहिए, वह उससे और कुछ नहीं माँगेगा। दुकानदार और भी चकरा गया।

चित्रकार दुकान पर ग्राहकों को सामान देने के साथ-साथ खमीर बनाने, लुगदी तैयार करने से लेकर भट्टी में पावरोटियाँ पकाने और केक बनाने का काम सीखने लगा। सारा दिन वह चुपचाप एक से दूसरे काम में लगा रहता। खाने का समय होता तो दुकानदार जो कुछ भी खाने को देता उसे खा कर वह फिर से काम में जुट जाता। दुकानदार न सिर्फ़ उसके काम से ख़ुश था बल्कि कुछ दिन बाद चित्रकार के प्रति उसका रवैया भी बदल गया। वह उसके खाने-पीने का ध्यान रखता और ख़ुद ही उसे कुछ देर आराम कर लेने के लिए भी कह देता।   

चित्रकार जब पावरोटियाँ बनाने के काम में दक्ष हो गया तो एक दिन उसने दुकानदार से कहा कि वह कुछ नये क़िस्म की ब्रेड और केक बनाना चाहता है। दुकानदार को जिज्ञासा हुई। वह नहीं जानता था कि चित्रकार के मन में क्या चल रहा है लेकिन चूँकि अब तक वह उसका विश्वासपात्र बन चुका था और उसने यह आश्वासन भी दिया था कि इस काम में उसका कोई नुक़सान नहीं होगा, इसलिए कोई सवाल-जबाव किए बिना उसने इजाज़त दे दी।

चित्रकार दिन भर काम में लगा रहा। शाम को जब उसने अलग-अलग क़िस्म के रूप और आकार की तैयार की गई ब्रेड और कुछ केक दुकानदार को दिखाए तो वह बुरी तरह चौंक गया। उसे लगा कि चित्रकार सनक गया है। उसे यह भी अफ़सोस हुआ कि अपनी शराफ़त के चलते इतनी सामग्री ख़राब करवा कर उसने ख़ामख़ाह अपना नुक़सान करवा लिया है। ग़ुस्से से उसने चित्रकार को देखा जो दाढ़ी खुजलाता हुआ ब्रेड और केक के विभिन्न रूपाकारों को ख़ुद ही बड़े व्यंग्य से देख रहा था। इससे पहले कि दुकानदार कोई टिप्पणी करे चित्रकार ने उसे एक और झटका दिया। उसने कहा कि दुकान का काम अब वही सँभालेगा और कि उसे कुछ पैसे चाहिएँ जिनसे वह दुकान की रेनोवेशन करना चाहता है।

कुछ दिन की ठोका-पीटी और रंग-रोगन के बाद दुकान जब दुबारा खुली तो बाज़ार भर में खलबली मच गई। हर कोई हैरान-परेशान दिखाई दे रहा था। हर तरफ़ तरह-तरह की बातें हो रही थीं। जिस किसी को भी ख़बर लगती वह अपना काम छोड़ कर दुकान की ओर चल पड़ता। दुकान के आगे लोगों की भीड़ हुमहुमा रही थी।

बाज़ार में ऐसी दुकान सचमुच विलक्षण थी। उसका बाहरी हिस्सा दूर से ही ध्यान खींचता। रंग-बिरंगी दीवारें रोशनी में जगमगा रही थीं। लेकिन जो चीज़ सबके आकर्षण का केंद्र थी, वह थी काउंटर की जगह पर इस सिरे से उस सिरे तक कांच का बना एक बड़ा शो-केस। इस शो-केस में एक क़तार में टँगे हुकों से मानव शरीर के अलग-अलग अंग लटक रहे थे - झूलती हुई एक बाजू, फैली उँगलियों वाला एक हाथ, लटकते हुए कान, नन्हें-नन्हें पैर, बीच-बीच में लटकी छोटी-बड़ी उँगलियाँ और नीचे की स्लैब पर सजा कर रखी हुई तरह-तरह की खोपड़ियाँ. . . चित्रकार ने इन सब चीज़ों को तैयार करने में पूरी कलाकारी दिखाई थी। खोपड़ियों में उसने बादाम, किशमिश भर दिए थे, हाथ की उँगलियों में नाखूनों की जगह पर चेरी चिपका दी थी, बाजू पर चाकलेट का लेप कर दिया था और पैरों पर सफेद-काले तिल चिपका कर उन्हें सजाया हुआ था। 

दुकान के अंदर भी कांच की आलमारियों में मुंडियाँ क़तार में रखी थीं, शेल्फ़ों पर छोटी-बड़ी बाँहें पड़ी थीं और अन्य अंग इधर-उधर लटके थे। दीवारों पर भी अजीबो-ग़रीब चित्र बने हुए थे। एक चित्र में एक आदमी गले में नरमुडों की माला पहने अट्टहास कर रहा था, दूसरे चित्र में एक आदमी जाँघों पर चित्त पड़े आदमी का पेट फाड़ रहा था, एक चित्र में एक औरत रक्त से भरे कटोरे से अपने बाल धो रही थी तो एक अन्य चित्र में एक आदमी दूसरे पर सवार होकर उसका सिर कुचल रहा था और आस-पास घेरा बना कर खड़ी भीड़ आह्लाद से तालियाँ पीट रही थी. . .  समूची दुकान एक सजी-सँवरी क़त्लगाह जैसी दिखाई दे रही थी।  

लोग भकुआए-से इस नज़ारे को देख रहे थे। ना तो यह किसी कसाई की दुकान थी न ही कसाई की दुकान में यह सब चीज़ें हो सकती थीं। चित्रकार ने जब लोगों को बताया कि दरअसल ये चीज़ें ब्रेड और केक हैं कुछ और नहीं और इन्हें उनकी पसंद को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया है, तो वे सकते में आ गए। इससे पहले कि वे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करें, चित्रकार उन्हें ‘डेमो’ देने लगा। शोकेस में पड़े एक हाथ को उसने ललचाई नज़रों से देखा, उसे उठा कर बड़े प्यार से उसकी उँगलियाँ सहलाईं , फिर उन्हें मुँह में डाल कर कचर-कचर चबाने लगा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे कि ऐसा स्वाद उसने पहले कभी न चखा हो। फिर शो-केस में से एक खोपड़ी उठा कर वह मज़े ले ले कर उसे चाटने लगा। एकाएक उसने उसमें दाँत गड़ा दिए और एक टुकड़ा मुँह में भर कर बड़ी मस्ती से चुगलाने लगा। 

कुछ लोग यह दृश्य देख कर दहशतज़दा हुए, कुछ घृणित नज़रों से उसे देखने लगे, कुछ उसे विकृत मानसिकता का घोषित करके लानतें भेजने लगे और कुछ क्रोध में आकर पैर पटकते हुए वहाँ से चल दिए। दुकानदार, जो साँस रोके यह सारा तमाशा देख रहा था, बड़ा पछताया कि क्यों चित्रकार की बातों में आकर उसने अपना इतना नुक़सान करवा लिया।  

लेकिन चित्रकार आश्वस्त था। दूसरे दिन उसने समय पर दुकान खोली। दुकानदार को घोर आश्चर्य तब हुआ जब उसने देखा कि दुकान खुलते ही भीड़ वहाँ फिर जुटने लगी। बल्कि कई लोग तो दुकान खुलने का इंतज़ार कर रहे थे। यह भीड़ कल की भीड़ से अलग क़िस्म की थी। सबकी आँखे शोकेस में सजा कर रखी चीज़ों पर टिकी थीं और वे बड़ी उत्सुकता से हाथ, उँगलियों, बाजू, खोपड़ी के आकार की ब्रेड और केक देख रहे थे। उनके पैर स्थिर न थे, बार-बार जगह बदल रहे थे। अपनी आँखों को वहाँ से हटाने की कोशिश करने के बावजूद वे हटा न पा रहे थे। उनके चेहरों पर न वितृष्णा का भाव था न घृणा का बल्कि इससे अलग अजीब-सा मिला-जुला भाव था जिसमें कभी खूंखारता झलकने लगती तो कभी लिप्सा लपलपा उठती। 

जो पहला ग्राहक दुकान में घुसा उसने थोड़ा खिसियाते और थोड़ा हँसते हुए चित्रकार को बताया कि वह कुछ ब्रेड और केक सिर्फ़ इसलिए ख़रीदना चाहता है ताकि पार्टी में अपने मित्रों को सरप्राइज़ दे सके। दूसरे ग्राहक ने भी सफ़ाई-सी देते हुए कहा कि अपनी शादी की सालगिरह पर वह अपनी पत्नी को एक ऐसी रोमांचकारी पार्टी देना चाहता है जिसे वह आने वाले कई दिनों तक याद करती रहे। इसलिए उसे खोपड़ी वाला केक चाहिए। तीसरा इन नये क़िस्म के केक का सिर्फ़ स्वाद चखना चाहता था। चौथा ग्राहक किसी दुविधा में नहीं था। उसने साफ़ कहा कि वह ख़ुद विभिन्न तरह की ब्रेड्स का शौक़ीन है और चूँकि दिन में उसे कई बार भूख लगती है इसलिए उँगलियों वाली ब्रेड का डिज़ाइन उसे ख़ास तौर पर पसंद आया है। एक के बाद एक ग्राहक आने लगे. . . और फिर दुकान पर भीड़ टूट पड़ी। आश्चर्यचकित दुकानदार व्यस्तता से इधर-उधर भागता खोपड़ियाँ, बाजू, हाथ, पैर लिफ़ाफ़ों में पैक कर कर के देने लगा। चित्रकार चुपचाप एक कोने में खड़ा होकर उन ग्राहकों को देखता रहा जो सामान लेने के लिए ऐसे मारामारी कर रहे थे मानो सदियों से भूखे हों।   

पहले ही सप्ताह में हालत यह थी कि सुबह सामान तैयार होता और दोपहर तक शो-केस और कंटेनर खाली हो जाते। भारी माँग को देखते हुए दुकानदार ने कुछ और लड़के काम पर लगा दिए थे। दोपहर को तैयार किया गया सामान भी शाम होते-होते निबट जाता लेकिन लार टपकाते ग्राहकों की क़तार ख़त्म न होती। दुकानदार को पैसे गिनने से फ़ुर्सत नहीं थी और एडवांस बुकिंग से उसकी डायरी के पन्ने भरते जा रहे थे।  

दुकानदार की नजर में चित्रकार जैसे कोई फ़रिश्ता था जिसने उसके लिए सोने की खान खोल दी थी। उसकी बस एक ही चिंता थी। चित्रकार पिछले हफ़्ते से ही ग़ायब था। बहुत खोजने पर भी उसका कुछ अता-पता न चला था।

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