भोलाराम की मुक्ति

15-01-2020

भोलाराम की मुक्ति

डॉ. अशोक गौतम

हर सरकार के देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के दावे सुन-सुन कर जब यमराज के कान पक गए, भोलाराम के जीव का इंतज़ार करते-करते आँखों में मोतिया आ गया तो उन्होंने एक पंथ दो काज सोचा कि क्यों ख़ुद ही चलकर अपने कानों का इलाज एम्स में करवाने के साथ ही साथ जैसे-कैसे बाबू को पटा, भोलाराम के जीव को मनाकर ले आएँ कि चल प्यारे! यहाँ फ़ाइल नहीं निकलने वाली तो नहीं निकलने वाली। फ़ाइल के चक्कर में पड़कर क्यों तू अपना अगला जनम भी लेट कर रहा है। देख तो, अगर जो तू समय रहते पेंशन का चक्कर छोड़ मेरे पास आ जाता तो अबकी फिर पचास का हो मरने की तैयारियाँ कर रहा होता। और यहाँ तू अभी भी बेसुध हो फ़ाइलों के नीचे दबा पड़ा अपनी फ़ाइल हर बाबू के पास क्लीयर करवाने की हर बार असफल कोशिश कर रहा है। अरे भोलराम, इस बीच तुझे भी पता नहीं कितने बाबू आए कितने चले गए। पर तू वहीं का वहीं। माना हे भोलाराम  के जीव! कोशिश हर बार मरने के बाद भी की जाए। इसका मतलब यह तो नहीं कि.…

और वे जेब में यात्रा का ख़र्च-पानी डाल उस दफ़्तर की ओर निकल पड़े जिस दफ़्तर की फ़ाइलों के नीचे फ़ैमिली पेंशन दिलवाने को हाथ पाँव मारता भोलाराम का फ़ैमिलीमाया से ग्रसित जीव दबा पड़ा था, बरसों से नहाए बिना, कुछ भी न खाए बिना। यह भोलाराम के ज़िंदा रहते अभावों के उपवासों का ही नतीजा था कि उसे मरने के बाद भी कई-कई महीने उपवास रखने का कुशल अभ्यास हो गया था। 

ज्यों ही यमराज मूँछों पर ताव देते उस दफ़्तर में पहुँचे जहाँ अपनी फ़ैमिली पैंशन की फ़ाइल क्लीयर करवाने के चक्कर में पिछले पचास सालों से आते-जाते बाबुओं के मुँह ताकता पड़ा था तो उन्हें भोलाराम के जीव पर बहुत दया आई। हाय बेचारा! देखो तो मरने के बाद भी इसका शरीर कितना दुर्बल हो गया है? मरने के बाद चेहरे पर इतनी झुर्रियाँ जितनी तब भी न थीं, जब भोलराम ज़िंदा था। आँखें किसी गुफा के भीतर धँसी हुईं। बेचारा, जब तक ज़िंदा था, तब तक घर गृहस्थी का बोझा ढोता-ढोता कुबड़ा होता रहा और जब मर गया तो परिवार वालों को किसी तरह का कोई कष्ट न हो, अपने मरने के बाद भी यह सोच फ़ाइल क्लीयर करवाने के चक्कर में ये हाल! आह री भोलारामी मोह माया!

यमराज ज्यों ही भोलाराम के जीव को फ़ाइल के नीचे से चुपके-चुपके निकालने लगे कि उन्हें बाबू के दिव्य चक्षुओं ने देख लिया। उन्हें तो विश्वास था कि सरकारी नौकरों के पास दिव्य चक्षु तो क्या, आँखें तक नहीं होतीं, ऐसे में मज़े में वे उनके चंगुल में फँसे भोलाराम के जीव को ले जाएँगे।

“मेरी परमिशन के बिना फ़ाइलों को कौन हाथ लगा रहा है? सिक्योरिटि बुलवाऊँ या. . . साला बिन कुछ दिए फ़ाइलों को हाथ लगा रहा है, शर्म नहीं आती क्या?” पर यमराज ने समझा कि उन्हें बाबू ने देखा नहीं है सो वे भोलाराम के जीव को फ़ाइलों के नीचे से निकालने की कोशिश करते रहे। पर एक भोलाराम का जीव था कि यमराज उसे फ़ाइलों के नीचे से निकालने की जितनी कोशिश करते, वह फ़ाइलों के ढेर के नीचे उतना ही अधिक छिप जाता, दीमक की तरह। 

"अरे, बड़े बेशर्म बंदे हो तुम? आख़िर ये ग़ैर क़ानूनी क्यों, क्या कर रहे हो? ऐसा बंदा तो मैंने अपनी पूरी लाइफ़ में पहली बार देखा। तस्वीर वाले यमराज का भेष बना मुझे डराने आए हो क्या? अरे! तुम मुझे क्या डराओगे? जिसे मैंने एकबार डरा दिया न! वह सात जनमों तक हर क़िस्म के बाबू से डरता ही रहा। जब तक मैं इस सीट पर हूँ, तब तक मैं तो असली के असली यमराज से भी नहीं डरता। जानते नहीं कि सरकारी फ़ाइलों को बाबुओं के सिवाय किसी और को हाथ लगाना पाप ही नहीं, महापाप होता है। जो बाबू की इजाज़त के बिना फ़ाइलों पर कुछ रखे बिना फ़ाइलों को हाथ लगाता है, वह नरक का अधिकारी होता है," फ़ाइलों के इंचार्ज बाबू ने कहा तो यमराज को बड़ा अचरज हुआ। यार! बंदा बड़ा ज्ञानी-ध्यानी लगता है जो उन्हें तुरंत पहचान गया। वर्ना यहाँ तो हज़ारों साल तपस्या करने वाले भी उन्हें नहीं पहचान पाते। अब उन्हें लगा कि उन्हें बाबू के सामने अपने को प्रगट कर ही देना चाहिए, उनकी भलाई इसी में है तो वे अपने को यर्थाथ रूप में बाबू के सामने प्रस्तुत करते बाबू के आगे हाथ जोड़ते बोले, "मान गया बंधु तुम्हें और तुम्हारे दिव्य चक्षुओं को! आख़िर किसीकी उपासना करते हो?"

"नोटों की! तो तुम मेरी नज़रें बचाकर फ़ाइल के नीचे से भोलाराम को ले जाने की कुचेष्टा कर रहे थे? फ़ाइल के नीचे. . . भीतर का, भगवान की नज़रों से बच सकता है पर मुझ बाबू की नज़रों से नहीं," सीट बाबू ने ठहाका लगाया तो उन्हें अपने आज तक लगाए ठहाकों पर हँसी आई। यार! ठहाका हो तो ऐसा! तू तो आज तक ठहाकों के नाम पर मिमियाता ही रहा। 

"बंधु! भोलाराम की फ़ाइल करवा उसे ले जाने आया था। बेचारा कितने सालों से. . . अब तो इसकी फ़ाइल क्लीयर कर उसे मोक्ष दो बाबू साहब!"

"ऐसे कैसे मोक्ष दे दूँ इसे? कितनी बार कहा कि फ़ाइल पर दक्षिणा के नाम पर कुछ भी रख परंपरा का निर्वाह भर कर दे बस, और इस संसार से पार हो जा। पर नहीं मानता। अरे, इसका ज़माना रहा होगा ईमानदारी का। अब वह ज़माना नहीं है, तो नहीं है। पंडों को बिन दक्षिणा दिए न तो जीव की मुक्ति संभव है और न फ़ाइलों की बिन चढ़ावा चढ़ाए सरकारी संडों से," कह बाबू यों ही हर किसी फ़ाइल पर दिखावे को काम करने लगे, जबकि उनके सामने वाली कुर्सी पर हाथ जोड़े अपनी फ़ाइल क्लीयर करवाने को कोई न बैठा था।

"तो कितने लगेंगे भोलाराम की फ़ाइल मुक्ति के?

"इन दिनों यही कोई दो हज़ार। आपको ही बता रहा हूँ कि इसे बहुत समझाया! बीस हज़ार फ़ैमिली पेंशन लगेगी। दो हज़ार दे दे। पर नहीं माना तो नहीं माना। इसी फ़ैमिली पेंशन हेतु दो हज़ार न देने की इसकी ज़िद के चलते देखो तो इसकी बीवी भी बिन फ़ैमिली पेंशन लिए ही सिधार गई। और फिर सारा दोष मेरी शरीफ़ बिरादरी पर कि मेरी फ़ैमिली फ़ाइल फ़ाइनल नहीं कर रहे। अरे साहब! हम तो इस हाथ काम देने को तैयार हैं, पर उस हाथ भी तो कोई देने को तैयार होना चाहिए कि नहीं?"

"चलो, ग़लती हो गई इससे। कुछ लोग होते हैं कि मरने के बाद भी नहीं सुधरते। उन्हीं में से एक ये भी है गधा," कह उन्होंने अपनी जेब से दो हज़ार निकाले और बाबू साहब के टेबल पर रखे तो बाबू चौंके, "ये क्या?"

"फ़ाइल फ़ाइनल करने की फ़ीस।"

"अरे ये चूर्ण वाले काग़ज़ कहाँ से ले आए? हमें उल्लू समझ रखा है क्या? दिन में बीसियों बार असली नोटों को देखते हैं साहब? मज़ाक और आर.के. बाबू से?" 

बाबू बिदके तो यमराज बोले, "बिदको मत बंधु! ये हमारे लोक की करंसी है। एक की क़ीमत यहाँ के हज़ार के बराबर है।"

"मतलब?? बाबू अपने मोबाइल के कैलकुलेटर पर उनके दो हज़ार बदल अपनी कंरसी में गिनने लगे। कुछ देर तक मोबाइल के कैलकुलेटर पर टकटक करने के बाद उसने यमराज से कहा, "पर यह यहाँ चलेगी क्या?"

"तो एक्सचेंज करवा लेना। नहीं तो जब ऊपर आओगे तो वहाँ काम आ जाएगी," यमराज ने डर से गिरी मूँछों को खड़ा करते कहा तो बाबू साहब बोले, "पर सर! पैसे की ज़रूरत तो मुझे अभी है। इस महीने दसों किस्तें भरने को पैंडिंग पड़ी हैं। पता नहीं कब जैसे मौत की तरह बैंकों के नोटिस आ जाएँ। धन्य हो आप जो ऐसे में मेरे तारणहार बनकर आए। आपके चरण कहाँ हैं यमराज?" फिर कुछ शंकित से होते बोले, “पर जो किसीने पूछ लिया कि यमपुरी की करंसी तेरे पास आई कहाँ से तो?? तो ऐसा करो, सामने बैंक है, वहाँ से इसके बदले रुपए ले आओ। तय मानिए, जितने को आप वहाँ से करंसी बदलवा कर आएँगे उतने को मैं भोलाराम की तो भोलाराम की, उसकी बीवी तक की फ़ाइल भी क्लीयर करके रखूँगा। आपको मेरी वर्क एफ़िशिएंसी का पता नहीं है सर! मुझे मेरे वर्क कल्चर को लेकर पूरा शहर मुझे पूजता है," हँसते हुए कहने के बाद बाबू साहब ने फ़ाइलों के ढेर में सँभाल कर छुपाकर रखी भोलाराम की फ़ाइल झटके से निकाली और आँखें मूँदे उसके हर पन्ने पर टकाटक टिकटिक करने लगे तो भोलाराम से अधिक यमराज के जीव ने राहत की साँस ली।  

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