भारतीय नववर्ष की महत्ता एवं कालगणना की वैज्ञानिकता

01-01-2020

भारतीय नववर्ष की महत्ता एवं कालगणना की वैज्ञानिकता

डॉ. गोपीराम शर्मा

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत् 2075 इस वर्ष 18 मार्च 2018 से प्रारम्भ हुआ। इस बार गत वर्षोें की अपेक्षा इसे मानने का उत्साह अधिक देखा गया। भारतीयता की पहचान वाली चीज़ें, गौरवमयी बातें, सांस्कृतिक प्रतिमान समय की धूल तले पड़े होने से हमारे मानस से निम्न चुके हैं। पर  इस बार भारतीय या हिन्दू नववर्ष के साथ रामनवमी का कार्यक्रम भी उत्साहपूर्वक मनाया गया।

भारतीय नववर्ष विक्रम संवत् चैत्र शुक्ला प्रतिपदा (एकम) से प्रारम्भ होता है। ईसा के 57 वर्ष इस वर्ष की स्थापना विक्रमादित्य ने शकों पर विजय पाकर इसके उपलक्ष्य में की थी। विक्रमादित्य मालव गणराज्य के प्रमुख थे, इनकी राजधानी उज्जैन रही थी। शक तामीर नदी के काठे की बर्बर, युद्धप्रिय जाति थी। यह तामीर नदी चीन के पास से निकलती थी। शकों ने मध्य ऐशिया में आतंक मचाते हुए भारत पर कई प्रहार किए। विक्रमादित्य ने इस आफ़त से नजात दिलाते हुए शकों को पश्चिम में हिन्दूकुश से एवं पूर्व में आराकांत बर्मा से पार खदेड़ दिया। शकों से मुक्ति दिलाकर विक्रमादित्य ने भारतीय जनता को भयमुक्त, आपदामुक्त एवं ऋणमुक्त करने में सफलता पाई। सम्पन्नता व सुरक्षा की इस स्मृति में उन्होंने ’कृत संवत’ की स्थापना की, जो ईसा की तीसरी-चौथी शताब्दी तक ’मालव संवत’ के नाम से जाना जाता रहा। इस समय यशोधर्मा ने हूणों को पराजित कर भारत से बाहर खदेड़ा। हूणों पर शकों जैसी विजय की याद में ’मालव संवत’ की पुनर्प्रतिष्ठा करते हुए यशोधर्मा ने इनका नाम ’विक्रम संवत्’ कर दिया। आज सभी इसे ’विक्रम संवत्’ के नाम से ही जाते हैं।

चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से केवल विक्रम संवत् ही प्रारम्भ नहीं होता और न ही यह संवत भारत का एक मात्र संवत् है। इसी दिन को अर्थात् 18 मार्च 2018 को शंकराचार्य संवत् 2297, महावीर संवत् 2544 भी प्रारम्भ हुआ है। इसी दिन के आस-पास अर्थात् 22 मार्च को राष्ट्रीय शाके 1940, 14 मार्च को बंगला संवत 1425 एवं 18 मार्च से युगवद 5120 प्रारम्भ हुआ है। 18 मार्च से ही सृष्टिसंवत भी प्रारम्भ हुआ है। इसके अनुसार सृष्टि को एक अरब 96 करोड़, 58 लाख, 85 हज़ार एक सौ अठारह वर्ष पूरे हो गए हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन अर्थात् चैत्रमास की शुक्ल पक्ष की एकम, रविवार को सूर्योदय के समय सृष्टि सर्जना की। ऐसा ज्योतिष ग्रंथ ’हिमाद्रि’ में भी आया है-

”चैत्र मासे जगद्ब्रह्मा संसर्ज प्रथमे हवि।
शुक्ल पक्षे समग्रंतु तहा सूर्योदय सति।।”

ये सृष्टि स्थायिता ’ब्रह्मा’ परम ऊर्जा का ही नाम है, जिसे प्रदषियों ने तय किया है। ’ऋषि’ शब्द से ही अंग्रेज़ी में ’रिसर्चर’ शब्द बना है। ब्रह्मा को ईश्वर कहना अवैज्ञानिक नहीं। अभी सन् 2008 में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के संबंध में दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों ने ’रमार्ज हेड्रोन कोलाइडर’ मशीन द्वारा प्रयोग किया और सृष्टि उत्पत्ति के सबसे सूक्ष्म तत्त्व को ’गॉड पार्टिकल’ नाम दिया। वैज्ञानिकों द्वारा 21वीं शताब्दी में गॉड या ईश्वरीय तत्त्व की मान्यता हमारी प्राचीन मान्यताओं पर मुहर लगाती है कि हमने अपने विज्ञान को अपनाने के लिए आम जनता को उसे ’ईश्वरीय शक्ति’ के रूप में प्रस्तुत किया था। चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से सृष्टि उत्पत्ति के बाद इसी दिन से सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग व कलियुग का प्रारम्भ हुआ। भारतीय मतानुसार यह जो सृष्टि चल रही है उसका दो अरब 33 करोड़ 32 लाख 26 हजार 865 वर्ष का समय शेष बचा है। वैज्ञानिक भी दो अरब साल बाद सब कुछ समाप्त हो जाने की बात कहते हैं।

इसाइयों का नववर्ष भी कुछ सौ वर्षोें पहले 25 मार्च को ही प्रारम्भ होता था और उस वर्ष में दस महीने और 304 दिन हुआ करते थे। सितम्बर सातवां, अक्टूबर आठवां, नवम्बर नौवां और दिसम्बर दसवां और अन्तिम महीना होता था। बाद में पादरी ग्रेगरी ने उसे व्यवस्थित करते हुए दो महीने और जोड़ दिए और एक जनवरी से उसकी शुरूआत मानी। ग्रेग्रेरियन कैलेंडर सरल है और सूर्य के चक्र के साथ जुड़ा है। इसी विशेषता के अलावा न यह वैज्ञानिक है और न ही इसका खगोलीय आधार है। महीनों के नाम, महीनों के दिन का कम ज़्यादा होना, भयंकर शीत में शुरूआत और आधी रात से प्रारम्भ आदि किसी वैज्ञानिकता को सूचित नहीं करते। इसके विपरीत भारतीय नववर्ष पूर्णतः शोध के बाद प्रारम्भ किया गया वर्ष है। इसका प्रारम्भ बहुत ही ख़ुशनुमा माहौल में होता है। यह समय बसंत के आगमन का है। यहाँ ऋतुओं का परिवर्तन बिन्दु है। खेतों में फसलें पक कर तैयार होती हैं। वृक्षों पर नयीं कोंपलें, नवतंतु, किसलय जन्म लेते हैं। चहुँ ओर उत्साह, ऊर्जा, प्रसन्नता का नाद तरंगित होता महसूस होता है। सूर्य की पहली किरण के साथ प्रारम्भ होना भी तार्किक है। इस समय की विशेषताओं के कारण ही नववर्ष के प्रारम्भ के साथ कालांतर में अनेक घटनाएँ जुड़ती गईं और इसी महत्ता को स्थापित करती रहीं। राम का राज्याभिषेक, नवरात्रों का प्रारम्भ, सिक्ख गुरू अंगद देव जी का जन्म दिन, आर्य समाज की स्थापना, झूलेलाल जी का जन्मदिन, चेटीचंड, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी का जन्म दिन जैसी अनेक घटनाएं नववर्ष के प्रारम्भ के दिन से जुड़ी हुई हैं।

भारतीय नववर्ष का वैज्ञानिक और खगोलीय आधार मज़बूत है। इस कैलेण्डर में गणना सूर्य और चन्द्रमा की गतियों को आधार मानकर की जाती है। एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को एक दिन माना जाता है। इसी प्रकार, सर्दी, गर्मी और वर्षोें के चक्र को एक वर्ष माना गया है। चन्द्र, नक्षत्र आदि की चाल से समय गणना करते हैं। 27 नक्षत्र और 12 राशियाँ भचक्र (गोलाकार अंतरिक्ष) दूरी मापने का कार्य करते हैं। बारह राशियों को पार करने में 365 दिन हो जाते हैं। पृथ्वी सूर्य का चक्र लगाकर पुनः मेष राशि के प्रथम बिन्दु पर आती है, यहीं से नववर्ष शुरू होता है। यह दिन चैत्र शुक्ला प्रतिपदा का होता है। समय गणना में चान्द्रवर्ष का भी उपयोग होता है। चन्द्रमा पृथ्वी का चक्र 29 दिन में पूरा करता है। इस समय में एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा आ जाती है, इसे ही चान्द्रमास कहा जाता है। दक्षिण भारत में अमावस्या से अमावस्या को एक महीना कहते हैं। चन्द्रमा 12 राशियों एवं 27 नक्षत्रों को पार करने में पृथ्वी की 12 परिक्रमा कर लेता है, यही चान्द्र वर्ष है। चान्द्रवर्ष सौर वर्ष से 11 दिन कम होता है इस कारण तीन वर्ष में एक अधिमास (चान्द्र मास) माना जाता है। अर्थात् उस वर्ष 13 चान्द्र महीने हो जाते हैं।
        
अधि मास या क्षय मास का हिसाब यह है कि इसमें संक्रांति कार्य करती है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि से संक्रमण संक्रांति कहलाता है। यदि सूर्य मेष राशि में आता है तो यह मेष सक्रांति या मकर राशि में आता है तो मकर संक्रांति मानी जाती है। वैसे तो पृथ्वी चलती है पर ज्योतिष के हिसाब से सूर्य को राशियों में गति करता कहा जाता है। दो संक्रातियों के बीच एक अमावस्या ज़रूरी है। यदि दो संक्रांतियों के मध्य दो अमावस्या आ जाए तो इसे अधिमास की सर्जना हो जाती है। इसके विपरीत एक भी अमावस्या नहीं आए तो क्षय मास मानी जाती है। क्षय मास कम ही सामने आता है केवल संवत 2020 (1963 ई.) में एक बार क्षय मास हुआ था।
        
तिथियाँ भी घटती-बढ़ती रहती हैं पर इनका भी हिसाब है। चन्द्र चलता है और साथ पृथ्वी भी गतिमान है इसलिए तिथियों में घटाव-बढ़ाव पर संतलुन दिया जाता है। सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है वही पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। माना यदि सूर्योदय के आधे घंटे पश्चात् चतुर्थी प्रारम्भ हई और सूर्यास्त के आधे घंटे पूर्व समाप्त हो गई तो दिन की तिथि तृतीया मानी जाएगी तथा अगले दिन की पंचमी। यहाँ चतुर्थी का क्षय हो गया। इसी तरह दो सूर्योदय के समय एक ही तिथि रहे तो यहाँ तिथि बढ़ी हुई मानी जाती है।
        
दिनों और महीनों के नामकरण भी उचित आधार पर है। ग्रेग्रेरियन कैलेण्डर के महीनों के नाम किसी देवता, देवी, ऋतु, राजा या किसी संख्या के आधार पर बिना किसी तार्किकता से लिए हैं। भारतीय कैलेंडर में महीनों के नाम राशियों के आधार पर है। 12 राशियों के आधार 12 महीने हैं। चित्रा राशि के कारण चैत्रमास, विशखा राशि के कारण वैशाख मास। इसी प्रकार अन्य नाम रखे गए। दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर आधारित है।
        
समय की इकाइयों की कल्पना भारतीय कैलेण्डर में बहुत ज़बरदस्त है। समय इकाई ’परमाणु’ से लेकर ’महाकल्प’ तक का विधान है। परमाणु से प्रारम्भ होकर आगे अणु, तृसरेणु, त्रुटि, लावा, निमेष, क्षण, काण्ठा, लप्पु, दंड, मुहूर्त, प्रहर, दिवस, पक्ष, माह, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प, ब्रह्म दिवस, ब्रह्मामानस, ब्रह्मचार्य, पराध और महाकल्प तक की काल इकाइयों की कल्पना कर रखी है। छोटी इकाई ’त्रुटि’ एक सैकण्ड का 1/1687.5वां भाग होती है। इसी प्रकार एक बड़ी इकाई ’महाकल्प’ का मान 31 शंख 10 खरब 40 अरब मानव वर्ष होता है। इसी तरह ब्रह्मा का दिन चार खरब बत्तीस अरब वर्ष का समय होता है। इसे ही सूर्य की आयु माना है। चतुर्युगों का समय चार लाख बत्तीस हज़ार वर्ष माना गया। 71 चतुर्युगी को एक मन्वंतर, 14 मन्वंतर को एक कल्प माना है। एक कल्प में चार अरब 33 करोड़ का समय होता है और इसे मनु की आयु कहा जाता है। अब तक छह मनु बीत चुके हैं। विस्ववान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु 7वें मनु हैं जिनकी 28वीं चतुर्युगी द्वापर को पार कर अब कलियुग में आई है। कलियुग को 5120वां वर्ष इस नववर्ष से प्रारम्भ हुआ है। कलियुग की आयु 43200 वर्ष तय है।

भारतीय कालगणना के बारे में बहुत कुछ और कहा-समझा जा सकता है। इसकी वैज्ञानिकता, तार्किकता और व्यावहारिकता सिद्ध की जा सकती है। भारतीय कैलेंडर द्वारा बताई पृथ्वी की आयु वैज्ञानिकों की गणना के आस-पास अर्थात् दो अरब वर्ष के लगभग बैठती है जबकि इसाइल की पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बंधी आयु केवल 6000 वर्ष पुरानी कही गई है। भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता को समझते हुए ही इस ज्ञान को पहले यूनान और फिर रोम तथा अरबों ने अपनाया। आज आवश्यकता है कि हम हमारे श्रेष्ठ ज्ञान को जानें। हम हमारे ज्ञान पर गर्व करें, केवल इसलिए नहीं कि यह हमारा है, बल्कि इसलिए कि यह सबसे श्रेष्ठ है। 

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