भरी जवानी में

01-10-2013

भरी जवानी में

सुशील यादव

नाव को फेंक, पाँवों में, जो भँवर बाँध लेते हैं
नादां लोग, जीने का अजीब, हुनर बाँध लेते हैं

मेरे होने का, न कोई फ़र्क पड़ता ज़माने को
मेरे एवज़, लोग आजकल, जानवर बाँध लेते हैं

बारिश की संभावना देख के, समझदार परिंदे
तिनकों का आशियाना बना, शजर बाँध लेते हैं

एक निवाले के लिए, तरसता रह गया कोई बचपन
भरी जवानी अपने ख़ौफ़ वे, शहर बाँध लेते हैं

वो चुप हैं, उनकी ख़ामोशी का जाके सबब पूछो
एहतियातन लोग, गठरियों में पत्थर बाँध लेते हैं

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