बेचैन आवाज़

राहुलदेव गौतम

अफ़सोस किस बात का करूँ,
दिल तो मिला था पलभर,
लेकिन विचार नही मिले थे पल भर।

 

किसी से भी किसी तरह नहीं,
दुनिया की खब़र वो देकर चले गये,
उन्हें कानों-कान ख़बर नहीं चला,
हम उनके लिए कितने दर्द सह गये।

 

वो समभाव था या डर था,
एक को समझकर वो रुक गये,
एक को हम अपनाकर चलते-चले गये।

 

फूल भी नहीं थे तो अंगारे भी नहीं थे,
वो जो थे वो थे ही,
जो बचा इनमें से दूसरा,
उससे जल कर हम राख़ हो गये।

 

जीवन का झंझावत हमें दूर रखता है,
फिर से उनके हिसाब से जीने में,
जो मैं पहले था उसी तरह जीते चले गये।

 

न कल्पना में कुछ था,
न हक़ीक़त में कुछ हाथ लगा,
मैं खाली था हम खाली रह गये।

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